
मलिक असगर हाशमी
मुंबई की सड़कों पर कोई शेखी बघारे तो सुनने वाला हंसकर कह देता है,“क्या छपरी बात कर रहा है!” हरियाणा के खेतों में गपबाज़ी को “उरले-परले की” कह दिया जाता है, कोलकाता की गलियों में “जा बेटा” से बात टलती है, तो बिहार में “मारम न” की धमकी में ही एक अपनापन छुपा होता है। हर शहर की अपनी ज़बान है, अपने मुहावरे हैं।
लेकिन अगर आप पुरानी दिल्ली की तंग और ...Read more
डॉ. अनिल कुमार निगम
एक समय था जब किसी युवा की शैक्षिक योग्यता उसके करियर की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। स्नातक, परास्नातक या किसी पेशेवर पाठ्यक्रम की डिग्री रोजगार के दरवाजे खोलने के लिए पर्याप्त होती थी। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते कदमों ने रोजगार की तस्वीर बदल दी है।
आज सवाल केवल यह नहीं है कि युवा ने क्या पढ़ा है, बल्कि यह भी है कि वह क्या कर सकता है, कितना तेजी से सीख सकता है और बदलती तकनीक तथा परिस्थितियों के साथ स......Read more