
अब्दुल्लाह मंसूर
हर साल 14 फरवरी का दिन आता है और पूरी दुनिया लाल गुलाबों, कीमती तोहफों और इज़हार-ए-मोहब्बत के शोर में डूब जाती है। मुमकिन है कि वैलेंटाइन डे पूँजीवाद के गर्भ से जन्मा एक बाजारी त्योहार हो, जहाँ भावनाएं समझी कम और बेची ज्यादा जाती हैं। लेकिन भारत जैसे देश के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में, मैं वैलेंटाइन डे का समर्थन करता हूँ। मेरा समर्थन बाज़ार के लिए नहीं, बल्कि उस वैचारिक हथियार के लिए है जो हमारी उन दकियानूसी परंपराओं और संस्कृति से लड़ने की ताकत देता है जो राधा-कृष्ण, राम-सीता और श......Read more