अब्दुल्लाह मंसूर
मध्य-पूर्व की राजनीति को समझने के लिए सबसे पहले एक कड़वी हकीकत को स्वीकार करना जरूरी है कि यह पूरा खित्ता जितना 'मुस्लिम उम्मत' के नारों से गूंजता दिखाई देता है, असल में उतना ही कठोर राष्ट्रीय हितों और सत्ता की राजनीति से संचालित होता है। सार्वजनिक मंचों पर अक्सर इस्लामी एकजुटता और भाईचारे की दुहाई दी जाती है, लेकिन जब वास्तविक निर्णय लेने का समय आता है, तो हर मुल्क अपनी सरहद की हिफाजत, अपनी मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था और अपने राजनीतिक रसूख को ही प्राथमिकता देता है।

खाड़ी देशों का सुरक्षा ढांचा इसका सबसे जीता-जागता सबूत है। इन देशों ने अपनी हिफाजत के लिए लंबे समय तक खुद को मजबूत करने के बजाय पश्चिमी ताकतों, खासकर अमेरिका और ब्रिटेन पर भरोसा किया। विडंबना यह है कि अमेरिका की पहली प्राथमिकता हमेशा इजरायल की सुरक्षा रही है, जबकि अरब देशों की चिंताएं अक्सर दूसरे दर्जे पर रखी गईं।
इसके बावजूद, खाड़ी के मुल्क इसी ढांचे में बंधे रहे। जब भी इलाके में तनाव बढ़ता है, तो वे अपनी सुरक्षा के नाम पर अरबों डॉलर के पश्चिमी हथियार खरीदते हैं, जिससे उनकी निर्भरता और बढ़ जाती है। इसी खेल में पाकिस्तान की भूमिका एक किराए के सिपाही जैसी उभरती है।
पाकिस्तान ने लंबे समय से खुद को खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब के लिए एक सैन्य विकल्प के तौर पर पेश किया है। जब भी पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था डूबने लगती है, वह सऊदी अरब से वित्तीय इमदाद मांगता है और बदले में अपनी फौज और सुरक्षा का आश्वासन देता है। यह रिश्ता किसी धार्मिक जज्बे पर नहीं, बल्कि एक व्यापारिक लेन-देन पर टिका है, जहां पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता को एक 'रणनीतिक संपत्ति' की तरह बेचता है।
हाल के वर्षों में हुआ सामरिक रक्षा समझौता (SMDA) इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जिसे सऊदी अरब ने अपनी 'बीमा पॉलिसी' के तौर पर देखा है। लेकिन इस सहयोग की वास्तविकता उतनी आदर्शवादी नहीं है जितनी उसे प्रस्तुत किया जाता है, खासकर जब अमेरिका-इजरायल के फरवरी 2026 से ईरान पर संयुक्त हमलों के जवाब में ईरान ने ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस IV के तहत सऊदी अरब सहित खाड़ी मुस्लिम देशों (UAE, कतर, बहरीन, कुवैत) पर सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें व ड्रोन दागे हैं, जिनमें रियाद, दुबई, अबू धाबी जैसे शहरों को निशाना बनाया गया।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से संकट में रही है और उसे बार-बार बाहरी आर्थिक मदद की जरूरत पड़ती है। ऐसे में खाड़ी देशों के साथ सैन्य सहयोग उसके लिए आर्थिक सहारे का माध्यम बन जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान कई बार अपनी सेना और अपनी भौगोलिक स्थिति को एक रणनीतिक संपत्ति की तरह इस्तेमाल करता है। इस पूरी प्रक्रिया में “उम्मत” का नारा अक्सर केवल एक भावनात्मक आवरण बनकर रह जाता है।
ईरान के खिलाफ युद्ध की स्थिति और पाकिस्तान की मुश्किलें
यदि पाकिस्तान अपने स्वार्थों की खातिर ईरान के साथ सीधे टकराव में उतरता है, तो इसके नतीजे केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया को दहला सकते हैं। ईरान के पास आधुनिक मिसाइल तकनीक और ड्रोन का बड़ा जखीरा है, जिसकी जद में पाकिस्तान के लगभग सभी बड़े शहर और नौसैनिक अड्डे आते हैं।
900किलोमीटर लंबी ईरान-पाकिस्तान सीमा, जो बलूचिस्तान के रेगिस्तानी इलाकों से गुजरती है, पहले से ही अलगाववाद और असंतोष की आग में झुलस रही है। युद्ध की स्थिति में यह पूरा इलाका एक सक्रिय रणक्षेत्र बन जाएगा।
ईरान अक्सर सीधे युद्ध के बजाय अपने सहयोगी समूहों के जरिए जवाब देने में माहिर है, जो पाकिस्तान के आंतरिक ढांचे को भीतर से खोखला कर सकते हैं। विशेष रूप से बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बन जाएगा। ईरान और पाकिस्तान दोनों तरफ बलूच आबादी का असंतोष मौजूद है।
युद्ध छिड़ने पर ईरान पाकिस्तान के भीतर सक्रिय असंतुष्ट समूहों को हवा दे सकता है, जिससे न केवल बलूचिस्तान में विद्रोह भड़केगा, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और ग्वादर पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स भी मलबे के ढेर में तब्दील हो सकते हैं। पाकिस्तान की यह 'धार्मिक ठेकेदारी' वास्तव में उसके अपने विनाश का रास्ता तैयार कर रही है।
आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान पहले से ही वेंटिलेटर पर है। युद्ध की शुरुआत होते ही ऊर्जा संकट गहरा जाएगा, तेल की कीमतें आसमान छुएंगी और विदेशी निवेशक अपना बोरिया-बिस्तर समेट लेंगे। किसी भी युद्ध को लड़ने के लिए जिस भारी रकम, ईंधन और रसद की जरूरत होती है, उसे मुहैया कराने की कूवत आज के पाकिस्तान में नहीं है।
इसके अलावा, पाकिस्तान की सेना पहले से ही कई मोर्चों पर फंसी हुई है। अफगानिस्तान की 2600किलोमीटर लंबी सीमा पर तालिबान के साथ उसकी आए दिन झड़पें होती हैं और मुल्क के अंदर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे संगठन उसकी जड़ों को काट रहे हैं।
ऐसे में ईरान के साथ एक और मोर्चा खोलना सैन्य खुदकुशी से कम नहीं होगा। सबसे संवेदनशील पहलू पाकिस्तान की घरेलू स्थिति है। ईरान एक शिया बहुल देश है और पाकिस्तान की शिया आबादी का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक रूप से वहां से जुड़ाव महसूस करता है।
अगर पाकिस्तान की हुकूमत ईरान पर हमला करती है, तो देश के भीतर शिया-सुन्नी हिंसा का ऐसा दौर शुरू हो सकता है जिसे संभालना फौज के बस की बात नहीं होगी। पाकिस्तान की विदेश नीति का यह दोहरापन जहां वह एक तरफ खुद को उम्मत का रहनुमा कहता है और दूसरी तरफ अपने ही पड़ोसी मुस्लिम मुल्क के खिलाफ साजिशें रचता है यह साबित करता है कि उसके लिए मजहब सिर्फ एक सियासी हथियार है।

पाकिस्तान की नीति और भारत के लिए संभावित अवसर
पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि उसने हमेशा वैश्विक संघर्षों का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए किया है। चाहे वह शीत युद्ध के दौरान अमेरिका का पिछलग्गू बनना हो या अफगान युद्ध में मुजाहिदीन को तैयार करना, पाकिस्तान ने धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल करके न केवल अपने पड़ोसियों को जख्म दिए, बल्कि खुद को भी अस्थिरता की खाई में धकेल दिया।
'मुस्लिम उम्मत' का नारा उसके लिए केवल एक आवरण है, जिसके पीछे वह अपनी सैन्य तानाशाही और आर्थिक विफलताओं को छिपाता है। हकीकत में, सऊदी अरब, ईरान या तुर्की हर कोई अपनी चाल चल रहा है और पाकिस्तान इस बिसात पर केवल एक प्यादा बना हुआ है, जिसका खामियाजा भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को अपनी छवि और सुरक्षा के संदर्भ में भुगतना पड़ता है।
पाकिस्तान की इस बढ़ती अस्थिरता और उसकी गलत प्राथमिकताओं के बीच भारत के पास एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरने का बड़ा अवसर है। जब पाकिस्तान मध्य-पूर्व के झगड़ों और अपनी आंतरिक गुत्थियों में उलझा होगा, तब भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी पोल और भी मजबूती से खोल सकता है।
भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन और वहां के अल्पसंख्यकों, विशेषकर शिया और बलूच समुदायों पर होने वाले अत्याचारों को दुनिया के सामने लाए। पाकिस्तान जिस आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है, उसके खिलाफ वैश्विक राय बनाने का यह सबसे सही समय है।
जब पाकिस्तान की फौज ईरान और अफगानिस्तान की सरहदों पर उलझी होगी, तब भारत की सीमाओं पर घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों में स्वाभाविक रूप से कमी आने की संभावना बढ़ेगी। भारत इस समय का उपयोग अपनी सीमा सुरक्षा को अभेद्य बनाने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कर सकता है। आर्थिक दबाव के चलते जब पाकिस्तान को अपने रक्षा बजट में कटौती करनी पड़ेगी, तब भारत अपनी सैन्य आधुनिकिकरण की गति को बढ़ाकर एक निर्णायक बढ़त हासिल कर सकता है।
मध्य-पूर्व के तनाव से ऊर्जा सुरक्षा को जो खतरा पैदा होगा, उसे भारत अपनी कूटनीतिक दूरदर्शिता से एक अवसर में बदल सकता है। भारत एक बड़ी और स्थिर अर्थव्यवस्था है, जो दुनिया के लिए भरोसेमंद साझेदार है। हम अपने रणनीतिक तेल भंडारों का विस्तार कर सकते हैं और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के लिए नए वैश्विक गठबंधन बना सकते हैं।
जहां पाकिस्तान की छवि एक अस्थिर और युद्धप्रिय देश की बन रही है, वहीं भारत खुद को एक स्थिर लोकतंत्र और जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में पेश कर सकता है। हालांकि, रणनीतिक अवसर का मतलब सीधे सैन्य टकराव नहीं होता, बल्कि यह कूटनीतिक बिसात पर दी जाने वाली वह मात है जिससे दुश्मन बिना लड़े ही कमजोर हो जाए। भारत की मजबूती उसकी शांतिप्रिय नीति और विकास में निहित है।
पाकिस्तान का धर्म आधारित राष्ट्रवाद पूरी तरह विफल हो चुका है और उसका हश्र यह है कि वह आज अपनों के ही खून का प्यासा है। भारत की पंथनिरपेक्ष और समावेशी पहचान ही वह ताकत है जो उसे इस पूरे क्षेत्र में एक मार्गदर्शक की भूमिका में खड़ा करती है।
पाकिस्तान की बर्बादी उसके अपने ही बोए हुए नफरत के बीजों का फल है, जबकि भारत अपनी स्थिरता से पूरी दुनिया को यह संदेश दे सकता है कि प्रगति का रास्ता मजहबी जुनून से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और राष्ट्रीय अखंडता से होकर गुजरता है। पाकिस्तान की नीति भी इसी कठोर यथार्थ को दिखाती है, जहाँ “उम्मत” का नारा मौजूद तो है, लेकिन वास्तविक राजनीति में हमेशा राष्ट्रीय हित ही सबसे ऊपर रहता है।
(अब्दुल्लाह मंसूरएक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)