शिक्षा, ईमानदारी और कौशल से बनाएं लोकतंत्र मजबूत : सैयद महमूद अख्तर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 14-03-2026
Strengthen democracy through education, honesty and skills: Syed Mahmood Akhtar
Strengthen democracy through education, honesty and skills: Syed Mahmood Akhtar

 

आवाज द वाॅयस /नई दिल्ली

लोकतंत्र को लेकर निराशा का माहौल कई बार चर्चा में आता है। खासकर युवाओं के बीच यह सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र वास्तव में सबके लिए बराबर अवसर देता है। इसी विषय पर एक गंभीर और विचारपूर्ण बातचीत में सेवानिवृत्त आईआरएस अधिकारी और पूर्व राजनयिक Syed Mahmood Akhtar ने कहा कि लोकतंत्र को लेकर पूरी तरह निराश होना सही नहीं है। उनके अनुसार इस्लाम और लोकतंत्र के बीच कोई बुनियादी टकराव नहीं है।

यह बातचीत एक विशेष पॉडकास्ट में हुई। इसका संचालन युवा इतिहासकार Saqib Saleem ने किया। चर्चा में भारतीय मुसलमानों की बदलती सोच, सोशल मीडिया का प्रभाव, शिक्षा की भूमिका और समाज में बढ़ते सामाजिक फासलों जैसे कई विषय सामने आए।

बातचीत की शुरुआत एक अहम सवाल से हुई। क्या भारत के मुस्लिम युवा लोकतंत्र से निराश हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई बार ऐसे विचार सामने आते हैं जिनमें कहा जाता है कि लोकतंत्र इस्लामी व्यवस्था नहीं है या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा मुसलमानों के खिलाफ है।

सैयद महमूद अख्तर ने इस धारणा को सही नहीं माना। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों में अस्थायी निराशा हो सकती है। लेकिन इसे पूरी समुदाय की सोच कहना उचित नहीं है। उनके अनुसार लोकतंत्र एक व्यापक व्यवस्था है। इसे केवल चुनावी नतीजों से नहीं परखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि अगर इस्लामी इतिहास पर नजर डालें तो शुरुआती दौर में शासन का आधार परामर्श और सामूहिक निर्णय था। पैगंबर के दौर में और बाद में खलीफाओं के समय भी फैसले मशवरे से होते थे। इस व्यवस्था में लोगों की राय को महत्व दिया जाता था। इसलिए यह कहना कि लोकतंत्र इस्लाम के सिद्धांतों से टकराता है, सही नहीं है।

चर्चा के दौरान सोशल मीडिया के प्रभाव पर भी विस्तार से बात हुई। सैयद महमूद अख्तर ने कहा कि आज सोशल मीडिया एक बड़ी लाइब्रेरी की तरह है। यहां हर तरह की जानकारी और विचार मिल जाते हैं। लेकिन इसके साथ एक समस्या भी है। डर और संदेह पैदा करने वाली बातें भी तेजी से फैलती हैं।

उन्होंने कहा कि कई युवा जब लगातार नकारात्मक संदेश देखते हैं तो उनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा हो जाता है। इससे लोकतंत्र के बारे में गलत धारणाएं बनती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि युवाओं को इतिहास और वर्तमान दोनों को संतुलित नजर से देखना चाहिए।

इस संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता Maulana Abul Kalam Azad का उदाहरण दिया। मौलाना आजाद ने हमेशा भारत की साझा राष्ट्रीयता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा जताया था। उनका मानना था कि भारत की एकता अटूट है और मुसलमान इस राष्ट्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी था कि लोकतंत्र को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। अक्सर युवा संसद या विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या देखकर ही लोकतंत्र का मूल्यांकन करते हैं।

सैयद महमूद अख्तर ने कहा कि लोकतंत्र कई संस्थाओं पर टिका होता है। इसमें न्यायपालिका, प्रशासन, स्थानीय निकाय और नागरिक समाज की बड़ी भूमिका होती है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने सिविल सेवा में प्रवेश किया था तब मुसलमानों की संख्या काफी कम थी। अब स्थिति बदली है। पहले के मुकाबले ज्यादा मुस्लिम युवा सिविल सेवा में आ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और प्रशासन में भी धीरे धीरे प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है। मुस्लिम युवतियां भी अब इन क्षेत्रों में आगे आ रही हैं। यह बदलाव उम्मीद जगाता है। शिक्षा के विषय पर उन्होंने खास जोर दिया। उनके अनुसार शिक्षा और योग्यता ही किसी भी समाज की असली ताकत होती है। केवल शिकायत करने से परिस्थितियां नहीं बदलतीं। समुदाय को अपनी कमियों को भी पहचानना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ साथ कौशल और तकनीकी प्रशिक्षण भी बहुत जरूरी है। मुस्लिम समाज में हस्तशिल्प और कारीगरी की समृद्ध परंपरा रही है। अगर इन हुनरों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए तो आर्थिक प्रगति के नए रास्ते खुल सकते हैं।

उन्होंने सरकारी पहल का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मंच भी बनाए गए हैं जहां कारीगर अपने काम को प्रदर्शित कर सकते हैं और बेहतर अवसर पा सकते हैं। इन अवसरों का उपयोग करना जरूरी है। शहरी समाज में बढ़ते सामाजिक फासलों पर भी चर्चा हुई। कई बड़े शहरों में मुस्लिम आबादी खास इलाकों में केंद्रित रहती है। इन इलाकों को अक्सर पिछड़ा माना जाता है।

इस सवाल पर सैयद महमूद अख्तर ने कहा कि इसके पीछे कई कारण हैं। एक कारण असुरक्षा की भावना है। लोग अपने समुदाय के बीच रहना सुरक्षित समझते हैं। दूसरा कारण यह है कि कई बार बहुसंख्यक समाज भी उन्हें अपने इलाकों में स्वीकार करने में हिचकिचाता है।उन्होंने कहा कि इसका समाधान सामाजिक भरोसे को मजबूत करने में है। जब सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे और आपसी संवाद बढ़ेगा तो दूरी कम होगी।

बातचीत के दौरान सफाई और सामाजिक व्यवहार का मुद्दा भी उठा। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मुस्लिम बस्तियों में स्वच्छता का स्तर कम होता है। इस पर सैयद महमूद अख्तर ने स्पष्ट कहा कि इस्लाम में स्वच्छता को बहुत महत्व दिया गया है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षाएं शरीर, कपड़ों और आसपास के वातावरण की सफाई पर जोर देती हैं। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने मोहल्लों और सामाजिक परिवेश को बेहतर बनाने के लिए जागरूक रहें। इससे गलत धारणाएं भी दूर होंगी।

आर्थिक अवसरों पर चर्चा करते हुए एक सवाल यह भी था कि क्या मुसलमानों को व्यापार के लिए बैंक ऋण लेने में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। सैयद महमूद अख्तर ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि बैंक सामान्यतः धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते। बैंक मुख्य रूप से योजना, दस्तावेज और आर्थिक क्षमता को देखते हैं। अगर किसी व्यक्ति के पास ठोस योजना और सही कागजात हों तो ऋण मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

सोशल मीडिया में प्रचलित एक शब्द पर भी चर्चा हुई। कई बार कुछ लोग सरकारी संस्थानों में काम करने वाले मुसलमानों को तंज के रूप में सरकारी मुसलमान कहते हैं। इस पर सैयद महमूद अख्तर ने कहा कि अपने लंबे सरकारी करियर में उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल कभी नहीं सुना। उनका मानना है कि अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है और सबके साथ न्याय करता है तो ऐसे आरोप मायने नहीं रखते।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पहले भी समाज में तनाव के दौर आते थे। फर्क यह है कि आज सोशल मीडिया के कारण छोटी घटनाएं भी बहुत तेजी से फैल जाती हैं। इससे लोगों के मन में अविश्वास बढ़ता है।

बातचीत के अंत में धर्म और दुनियावी जीवन के संतुलन पर चर्चा हुई। सैयद महमूद अख्तर ने कहा कि उनके अनुसार धर्म और दुनिया के बीच कोई टकराव नहीं है। उन्होंने कहा कि इबादत इंसान और ईश्वर के बीच संबंध को मजबूत करती है। लेकिन सामाजिक जीवन में असली पहचान इंसान के व्यवहार से बनती है।

अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी, सहनशीलता और अच्छे व्यवहार के साथ समाज में रहता है तो उसका असर अपने आप दिखाई देता है। यही वह मूल्य हैं जो समाज में सम्मान दिलाते हैं। उन्होंने अंत में कहा कि समाज में सकारात्मक सोच और आपसी सम्मान को बढ़ाना जरूरी है। जब लोग एक दूसरे की अच्छाइयों को पहचानेंगे तो कई गलतफहमियां अपने आप दूर हो जाएंगी। यह बातचीत इसी उम्मीद के साथ समाप्त हुई कि भारत जैसे विविध समाज में साझा विकास और परस्पर सम्मान के जरिए लोकतंत्र को और मजबूत बनाया जा सकता है।