होर्मुज पर तनाव, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल

Story by  अनिल निगम | Published by  [email protected] | Date 14-03-2026
Tensions over Hormuz: Clouds of Crisis Over the Global Economy
Tensions over Hormuz: Clouds of Crisis Over the Global Economy

 

 

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डॉ. अनिल कुमार निगम

ईरान से जुड़े पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष का असर अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहा। इसका असर अब भारत समेत दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। भारत में कुकिंग गैस की किल्लत और बाजार में अफवाहें इसके शुरुआती संकेत हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही महामारी, आपूर्ति शृंखला संकट और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही थी। ऐसे समय में पश्चिम एशिया में बढ़ता युद्ध नई आर्थिक अनिश्चितता को जन्म दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसके परिणाम और गंभीर होंगे। युद्ध का सबसे तात्कालिक असर ऊर्जा क्षेत्र पर दिख रहा है। फिलहाल भारत सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं की है। लेकिन अगर यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो कीमतों में बढ़ोतरी अवश्य होगी।

ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी सिर्फ ईंधन महंगा होना नहीं है। इसका व्यापक असर उत्पादन, बिजली, परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ता है। परिणामस्वरूप रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं और महंगाई बढ़ जाती है। इसके अलावा सरकारों का वित्तीय घाटा भी बढ़ता है, क्योंकि उन्हें सब्सिडी और सामाजिक योजनाओं पर अधिक खर्च करना पड़ता है।

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किसी भी युद्ध या सैन्य तनाव का सबसे तात्कालिक प्रभाव उन देशों पर पड़ता है जो संघर्ष के केंद्र में हैं। ईरान, इस्रायल और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं इस संकट से अछूती नहीं हैं। इन देशों में रक्षा व्यय तेजी से बढ़ रहा है। निवेश, पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों में अस्थिरता स्वाभाविक है।

खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्ग सभी पर असर पड़ रहा है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और ओमान में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। ईरान इन पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के माध्यम से दबाव बनाने की रणनीति अपना रहा है।

दुनिया के बड़े तेल आयातक देश जैसे भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, इंडोनेशिया और तुर्की इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इन देशों की आर्थिक संरचना ऊर्जा आयात पर निर्भर है। तेल की कीमतों में वृद्धि इनके व्यापार घाटे को बढ़ाएगी और आर्थिक विकास की गति धीमी होगी।

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इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय कानून से भी जुड़ा है। किसी संप्रभु देश पर हमला करना आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के खिलाफ माना जाता है। केवल सुरक्षा परिषद ही ऐसे मामलों में अनुमति दे सकती है। ईरान पर हुए हालिया हमलों के संदर्भ में सुरक्षा परिषद ने कोई स्पष्ट अनुमति नहीं दी है। अमेरिका और इस्रायल अपने कदम को आत्मरक्षा के अधिकार के तहत उचित ठहरा रहे हैं।

समुद्री व्यापार भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। खाड़ी क्षेत्र से दुनिया के कई देशों तक तेल पहुंचाने वाले जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते हैं। यह मार्ग अत्यंत संकरा और रणनीतिक है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन इसी मार्ग से होता है। हाल के हमलों के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को रणनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कई जहाजों को चेतावनी दी है कि वे इस मार्ग से गुजरने का जोखिम न उठाएं। उनका उद्देश्य अमेरिका, इस्रायल और उनके सहयोगियों पर दबाव बनाना है। साथ ही तेल बाजार में अनिश्चितता पैदा करना भी इसका लक्ष्य है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा चलता है और होर्मुज में यातायात बाधित होता है तो वैश्विक ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है। कच्चे तेल की कीमत 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।

भारत के लिए यह संकट और भी संवेदनशील है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। वर्तमान में भारत के कई जहाज फारस खाड़ी में फंसे हुए हैं। खाड़ी देशों से आने वाला यह तेल मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। यदि मार्ग में बाधा आती है, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। इससे परिवहन, विमानन, खाद्य आपूर्ति और औद्योगिक उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी। महंगाई बढ़ने के साथ ही आम जनता पर भारी असर पड़ेगा।

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एक अन्य अहम पहलू भारतीय प्रवासी समुदाय से जुड़ा है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम कर रहे हैं। भारत को मिलने वाली विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से आता है। युद्ध का विस्तार और क्षेत्रीय अस्थिरता इस समुदाय की नौकरियों को खतरे में डाल सकती है। इससे भारत में विदेशी मुद्रा में कमी आएगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।

ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए आवश्यक है कि अमेरिका, इस्रायल और ईरान सहित सभी पक्ष संयम बरतें। कूटनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास जरूरी हैं। इतिहास यह बताता है कि लंबे युद्ध किसी भी पक्ष के लिए लाभकारी नहीं होते। वियतनाम और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं।

आज वैश्विक शक्तियों विशेषकर भारत, जापान और यूरोपीय देशों को संयम और संवाद के माध्यम से शांति स्थापित करने का दबाव बनाना होगा। भारत जैसी संतुलित विदेश नीति वाली देश इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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एआई के माध्यम से प्राप्त  इन उपग्रह चित्रों से होर्मुज की वर्तमान स्थिति का आकलन किया जा सकता है।

यदि भारत सक्रिय कूटनीतिक पहल करता है और वैश्विक समुदाय को साथ लेकर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो संभव है कि बढ़ते संकट को समय रहते नियंत्रित किया जा सके। इससे न केवल आर्थिक नुकसान से बचाव होगा बल्कि मानवीय संकट भी टाला जा सकेगा।इस समय संयम, संवाद और रणनीतिक कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है जो इस क्षेत्र को स्थिर और सुरक्षित रख सकता है।

लेखक: डॉ. अनिल कुमार निगम (स्वतंत्र टिप्पणीकार)