जमील अहमद
अर्जुन सोमवार को अपनी तिमाही रिपोर्ट पूरी करने ही वाला था कि उसे अचानक दस मिनट की मीटिंग में बुलाया गया। उसके मैनेजर ने बताया कि नए एआई सॉफ्टवेयर की वजह से अब उसकी जरूरत नहीं रही। वहां उसके काम की कोई बात नहीं हुई। सिर्फ मशीनी दक्षता का तर्क दिया गया। दोपहर तक अर्जुन अपना सामान समेटकर घर की ओर निकल चुका था। दस साल का अनुभव अचानक बेकार हो गया था।
पिछले सौ सालों में दुनिया का काम कई बार टूट चुका है और फिर नए सिरे से खड़ा हुआ है। 1930 की मंदी से लेकर 2020 के एआई के डर तक बड़े संकट आए। लेकिन इंसान सिर्फ झेलता नहीं है। वह खुद को नए सांचे में ढाल लेता है। नई नीतियों और हिम्मत के दम पर हर चुनौती को अवसर में बदला गया है।

1929 के शेयर बाजार क्रैश ने अमेरिका में बेरोज़गारी 25 प्रतिशत तक बढ़ा दी। भारत में खेती की कीमतें गिर गईं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। लोग शहरों की ओर चले गए। इसी समय 'सोशल सेफ्टी नेट' का जन्म हुआ। अमेरिका ने सार्वजनिक काम देकर लाखों लोगों को रोजगार दिया। भारत में इस तंगी ने स्वदेशी आंदोलन को बल दिया। इससे हमें यह सिखने को मिला कि जब बाजार फेल हो जाए तो समाज और सरकार आगे आए।
बीसवीं सदी के मध्य में जब सैनिक युद्ध से लौटे तो बाजार में बड़ी उथल-पुथल हुई। 1970 और 80 के दशक में तेल संकट ने दिखा दिया कि जीवन भर की नौकरी का दौर खत्म हो गया। फैक्ट्रियां वहां चली गईं जहां मजदूरी कम थी। भारत उस समय लाइसेंस राज से जूझ रहा था। लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों ने सब बदल दिया। पश्चिम में सेवा क्षेत्र बढ़ा और भारत दुनिया का बैक ऑफिस बन गया। यह सिर्फ नौकरियों के जाने का नहीं था, बल्कि शारीरिक काम से दिमागी कौशल की ओर बढ़ने का दौर था। भारतीय इंजीनियरिंग डिग्री की मांग पूरी दुनिया में बढ़ गई।
2007 से 2009 के वित्तीय संकट ने व्यापार ठप कर दिया। अमेरिका में बेरोज़गारी 10 प्रतिशत तक पहुंच गई। भारत में विकास धीमा पड़ गया लेकिन देश बचा रहा। इसका समाधान डिजिटल था। गिग इकोनॉमी सामने आई। उबर और फ्रीलांस मार्केट जैसी चीजें बढ़ी। भारत में नए प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स आए। डिलीवरी पार्टनर से लेकर स्वतंत्र सॉफ्टवेयर सलाहकार तक लोगों ने अब एक ही नौकरी पर भरोसा नहीं किया। कई रास्तों से कमाई शुरू हुई।
मौजूदा दशक सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। पहले वैश्विक महामारी और अब जनरेटिव एआई। कोविड-19 ने बेरोज़गारी का रिकॉर्ड बढ़ा दिया। लेकिन वर्क फ्रॉम होम ने सब सीमाओं को पार कर दिया। बेंगलुरु और हैदराबाद के आईटी हब रातों-रात क्लाउड पर चले गए। सरकार ने सीधे बैंक खातों में पैसे भेजने की तकनीक अपनाई। अब नई चुनौती एआई है। यह पहली ऐसी तकनीक है जो इंसान की सोच और रचनात्मकता को चुनौती दे रही है।
काम का स्वरूप बदल रहा है। अब इंसान 'निर्माता' नहीं, 'संभालने वाला' बन रहा है। भविष्य में इंसान की जरूरत तीन जगह सबसे ज्यादा रहेगी। पहला, सहानुभूति की अर्थव्यवस्था। जिन कामों में भावनाओं और शारीरिक कुशलता की जरूरत है, वे बचे रहेंगे। नर्सिंग और समाज सेवा जैसे काम। म
शीन कविता लिख सकती है लेकिन मोहल्ले के विवाद को नहीं सुलझा सकती। दूसरा, रणनीतिक निगरानी। सफलता अब एआई की समझ पर निर्भर करेगी। हम कैलकुलेटर से स्प्रेडशीट की तरफ बढ़े और अब प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग सीख रहे हैं। इंसान की भूमिका उच्च स्तर की रणनीति और निर्णय लेने की होगी। तीसरा, लगातार सीखना। अब सिर्फ एक डिग्री से काम नहीं चलेगा। भारत में युवाओं की संख्या ज्यादा है। लगातार सीखना और खुद को अपडेट रखना जरूरी है।
इतिहास सिखाता है कि हम हमेशा नए संस्थान और सुरक्षा कवच बनाकर संकट से उभरे हैं। आज रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं लेकिन जिम्मेदारी और सूझ-बूझ वाले कामों में इंसान की जरूरत बढ़ रही है। पिछले सौ साल यह दिखाते हैं कि नौकरी खो सकती है, लेकिन इंसान होने का असली काम खत्म नहीं होता। प्रबंधन करना और दूसरों की देखभाल करना हमारी असली कीमत है।
अर्जुन को एक हफ्ते बाद समझ आया कि एआई डेटा निकाल सकता है लेकिन कंपनी की जरूरत के हिसाब से उसे समझा नहीं सकता। छह महीने बाद उसने खुद को 'रणनीतिक एआई ऑडिटर' बना लिया। अब वह एआई से मुकाबला नहीं करता। मशीन से डेटा आता है और अर्जुन उसमें अपनी समझ और फैसले जोड़ता है। वही चीज़ है जो कोई मशीन नहीं कर सकती।