गुलाम कादिर
दुनिया की नजरें इन दिनों खाड़ी देशों के आसमान पर टिकी हैं। इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। सुर्खियां जंग की खबरों से भरी हैं। मिसाइलों के हमले और जवाबी कार्रवाई की चर्चा ने आम लोगों के मन में एक डर पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म है। कई लोग यह मान बैठे हैं कि युद्ध के इस साये में हज और उमराह की यात्राएं थम गई होंगी। लोगों को लग रहा है कि शायद मक्का और मदीना जाने वाले रास्ते अब बंद हो चुके हैं। लेकिन हकीकत इन तमाम दावों और डर से बिल्कुल जुदा है। जमीन पर मंजर कुछ और ही गवाही दे रहा है।
जब आप सऊदी अरब की पवित्र धरती पर कदम रखते हैं, तो वहां युद्ध का खौफ नहीं बल्कि इबादत का सुकून नजर आता है। हवाई उड़ानों पर कुछ पाबंदियां और बदलाव जरूर हुए हैं, लेकिन अल्लाह के घर पहुंचने वालों का जज्बा कम नहीं हुआ। इस साल रमजान के शुरुआती बीस दिनों के आंकड़े किसी को भी हैरान कर सकते हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि जब आस्था गहरी होती है, तो बारूद की गंध भी उसके सामने फीकी पड़ जाती है।

रमजान 1447 हिजरी यानी साल 2026 के पहले दो अशरों (20 दिन) में मक्का की मस्जिद अल-हरम और मदीना की मस्जिद-अन-नबवी में जायरीन की संख्या ने पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। जनरल अथॉरिटी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इन 20 दिनों में कुल 9 करोड़ 66 लाख से ज्यादा लोग इबादत के लिए पहुंचे। यह संख्या दुनिया के कई देशों की कुल आबादी से भी कहीं ज्यादा है। यह बताता है कि दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इन मुकद्दस जगहों की अहमियत क्या है।
मक्का की भव्य मस्जिद अल-हरम में इस बार जो भीड़ उमड़ी, उसे संभालना किसी चुनौती से कम नहीं था। आंकड़ों पर गौर करें तो अकेले मक्का में 5 करोड़ 75 लाख से ज्यादा लोगों ने पांच वक्त की नमाज और कयामुल-लैल (रात की विशेष नमाज) अदा की।
इसके अलावा करीब 1 करोड़ 56 लाख लोगों ने उमराह मुकम्मल किया। काबा के चारों तरफ तवाफ करते लोगों का सफेद सैलाब यह बता रहा था कि उन्हें दुनिया के सियासी हालात से ज्यादा अपनी रूहानी शांति की फिक्र है। हरम शरीफ के चप्पे-चप्पे पर जायरीन की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि रमजान का यह महीना इबादत गुजारों के लिए किसी भी डर से बड़ा है।
वहीं दूसरी ओर, मदीना मुनव्वरा में भी पैगंबर साहब की मस्जिद (मस्जिद-अन-नबवी) में रौनक देखते ही बन रही है। यहां 2 करोड़ 11 लाख से ज्यादा नमाजियों ने सजदा किया। मदीना की ठंडी हवाओं में दरूद और सलाम की गूंज वैसी ही है, जैसी हमेशा रहती आई है।
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जन्नत के बाग कहे जाने वाले 'रियाजुल जन्नत' (अल-रौजा अल-शरीफा) में नमाज पढ़ने की चाहत हर दिल में थी। प्रशासन के मुताबिक, 5 लाख 79 हजार से ज्यादा खुशनसीब लोगों ने रौजा शरीफ में नमाज अदा की। साथ ही 17 लाख से ज्यादा जायरीन ने पैगंबर मोहम्मद साहब और उनके साथियों की बारगाह में हाजिरी दी और सलाम पेश किया।
इन आंकड़ों का गणित समझा जाए तो हर दिन औसतन 48 लाख लोग इन दोनों पवित्र मस्जिदों में मौजूद रहे। युद्ध की आशंकाओं के बीच इतनी बड़ी तादाद में लोगों का इकट्ठा होना सुरक्षा और प्रबंधन के नजरिए से एक चमत्कार जैसा है। सऊदी प्रशासन ने इसके लिए अभूतपूर्व इंतजाम किए हैं।
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक तकनीक और हजारों स्वयंसेवकों की मदद ली जा रही है। हर जायरीन की सुरक्षा और उसकी सहूलियत का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद कहीं कोई अफरा-तफरी नहीं दिखी। लोग कतारों में लगकर अपनी बारी का इंतजार करते दिखे और इबादत के हर पल को जी रहे हैं।
यह स्थिति उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो यह सोच रहे थे कि जंग की वजह से उमराह बंद हो जाएगा। यात्रियों का कहना है कि हवाई रास्तों में कुछ बदलाव जरूर हुए हैं और सफर थोड़ा लंबा हुआ है, लेकिन मक्का और मदीना पहुंचने के बाद सारा डर खत्म हो जाता है। यहां का आध्यात्मिक माहौल इंसान को दुनिया की परेशानियों से काट देता है। कई जायरीन ऐसे भी हैं जो पहली बार उमराह पर आए हैं। उनके लिए यह अनुभव किसी सपने जैसा है। वे कहते हैं कि उन्होंने घर पर सुना था कि हालात खराब हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें जो शांति मिली है, वह बेमिसाल है।

मस्जिद अल-हरम और मस्जिद-अन-नबवी के प्रशासन ने साफ किया है कि वे हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं। उनकी ऑपरेशनल तैयारी इतनी पुख्ता है कि करोड़ों की भीड़ को भी सुचारू रूप से संभाला जा रहा है। सफाई से लेकर जमजम के पानी के वितरण तक, हर चीज एक तय सिस्टम के तहत चल रही है। यह महज एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्रबंधन है जो दुनिया के किसी भी बड़े आयोजन को मात दे सकता है।
अंत में, यह रिकॉर्ड संख्या यह संदेश देती है कि इंसान की आस्था किसी भी राजनीतिक अस्थिरता से ऊपर है। खाड़ी के आसमान में मिसाइलें गुजर रही होंगी, लेकिन जमीन पर बिछे नमाज के मुसल्लों पर सिर्फ अमन और भाईचारे की दुआएं मांगी जा रही हैं। मक्का और मदीना की ये तस्वीरें दुनिया को सुकून का पैगाम दे रही हैं। रमजान का आखिरी अशरा अभी बाकी है। उम्मीद है कि आने वाले दस दिनों में यह संख्या 10 करोड़ के पार चली जाएगी। यह साल इतिहास में केवल युद्ध के तनाव के लिए नहीं, बल्कि इबादत के इस महाकुंभ के लिए भी याद रखा जाएगा।