नौशाद अख्तर /पटना
क्या आप जानते हैं कि शैंपू या चंपी की शुरुआत किसकी देन है? नहीं, तो हम बताते हैं। यह अभिनव आइडिया पटना के शख्स शेख दीन मोहम्मद की है। उन्होंने बालों की देखभाल के लिए पहले इसे विकसित किया और धीरे-धीरे इसके आधार पर आधुनिक शैंपू उत्पाद बनाए गए। हालांकि, आज इसकी लोकप्रियता के बावजूद, शेख दीन मोहम्मद का नाम लगभग भुला सा गया है, और उनके योगदान को बिहार में भी बहुत लोग याद नहीं रखते। यह गौरवपूर्ण इतिहास हमें याद दिलाता है कि साधारण विचार भी कैसे वैश्विक बदलाव ला सकते हैं।
बात साल 1759 की है। पटना का दीवान मोहल्ला तब अपनी रौनक के लिए जाना जाता था। यहीं शेख दीन मोहम्मद का जन्म हुआ। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महज 11साल की उम्र में दीन मोहम्मद ने अपने पिता को खो दिया। इसके बाद उनकी किस्मत उन्हें कैप्टन इवान बेकर नाम के एक ब्रिटिश अधिकारी के पास ले गई। बेकर ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला और सेना में ट्रेनिंग दिलवाई। यहीं से दीन मोहम्मद ने सर्जिकल स्किल्स और अनुशासन सीखा।
जब बेकर ने इस्तीफा दिया तो वह दीन मोहम्मद को अपने साथ आयरलैंड ले गए। एक बिहारी लड़के के लिए 18वीं सदी में यूरोप जाना किसी दूसरी दुनिया के सफर जैसा था। वहां का माहौल अलग था और भाषा भी। लेकिन दीन मोहम्मद के पास सीखने का गजब का जुनून था। उन्होंने वहां के स्कूल में पढ़ाई की और अंग्रेजी पर ऐसी पकड़ बनाई कि आगे चलकर उन्होंने इतिहास रच दिया।
आयरलैंड में रहते हुए उन्हें जेन डेली नाम की एक स्थानीय लड़की से प्यार हो गया। उस दौर में एक भारतीय और एक गोरी लड़की का रिश्ता समाज के मुंह पर तमाचे जैसा था। मजहब की दीवारें बहुत ऊंची थीं। लेकिन दीन मोहम्मद ने हार नहीं मानी। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाकर अपना नाम 'साके डीन महोमेद' रख लिया और जेन से शादी की।
यहीं से उनके लेखक बनने का सफर शुरू हुआ। साल 1794में उन्होंने 'द ट्रैवल्स ऑफ डीन महोमेट' नाम की किताब लिखी। यह किसी भी भारतीय द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई पहली किताब थी। उन्होंने गोरे लोगों को बताया कि भारत सिर्फ सपेरों का देश नहीं है बल्कि वहां की संस्कृति और शहर बहुत समृद्ध हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि तब तक अंग्रेजों को लगता था कि भारतीय लोग अंग्रेजी लिखना नहीं जानते।
1810 के आसपास दीन मोहम्मद लंदन शिफ्ट हो गए। उन्होंने देखा कि ब्रिटिश लोग भारतीय खाने और रहन-सहन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने लंदन के पॉश इलाके में 'हिंदुस्तानी कॉफी हाउस' खोला। यह ब्रिटेन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट था। वहां उन्होंने चिलम और हुक्का का इंतजाम किया। चपाती और मसालेदार करी का स्वाद लंदन वालों की जुबान पर चढ़ने लगा। हालांकि यह बिजनेस ज्यादा नहीं चला और वे दिवालिया हो गए। लेकिन इस असफलता ने उनके लिए एक और बड़ा
Mahomed’s Baths, opened in Brighton in 1814 by the remarkable Sake Dean Mahomed (born in Patna in 1759). He wrote perhaps the first book by an Indian person in English, opened the UK's first Indian restaurant & became the ‘shampooing surgeon’ to King George IV. Quite the résumé! pic.twitter.com/SS44VSIhNF
— Edward Anderson (@edanderson101) January 17, 2022
चंपी से बना 'शैम्पू' और दुनिया हुई मुरीद
दीन मोहम्मद ने गौर किया कि अंग्रेज साफ-सफाई के मामले में काफी पीछे थे। वे बस साबुन से शरीर रगड़ लेते थे। दीन मोहम्मद ने उन्हें भारतीय 'चंपी' का स्वाद चखाया। उन्होंने इंग्लैंड के ब्राइटन में एक शानदार बाथहाउस खोला। वहां उन्होंने जड़ी-बूटियों के तेल से सिर की मालिश और भाप स्नान की शुरुआत की।
हिंदी का शब्द था 'चांपो' या 'चंपी'। इसे ही उन्होंने अंग्रेजी में 'Shampooing' का नाम दिया। शुरुआत में वहां के डॉक्टरों ने उनका बहुत मजाक उड़ाया। उन्हें 'जादूगर' और 'धोखेबाज' तक कहा गया। लेकिन जब गठिया और शरीर के दर्द से परेशान लोग उनके पास आकर ठीक होने लगे तो विरोधियों की बोलती बंद हो गई। देखते ही देखते उनकी ख्याति इतनी फैली कि ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज चतुर्थ खुद उनसे मालिश करवाने पहुंचे।
Dean Mahomed - looking pretty dashing in his portraits below - wrote a number of books:
— Edward Anderson (@edanderson101) January 17, 2022
- The Travels of Dean Mahomed (1794)
- Cases Cured by Sake Dean Mahomed, Shampooing Surgeon (1820)
- Shampooing, or Benefits Resulting from the use of the Indian Medicated Vapour Bath (1822) pic.twitter.com/ErkdvjMD99
राजा के 'शाही शैम्पू सर्जन'
राजा उनकी मालिश के ऐसे दीवाने हुए कि उन्होंने दीन मोहम्मद को अपना 'रॉयल शैम्पू सर्जन' नियुक्त कर दिया। यह किसी भारतीय के लिए उस दौर का सबसे बड़ा सम्मान था। वे दो-दो ब्रिटिश राजाओं के निजी सर्जन रहे। उन्होंने ब्राइटन को एक मेडिकल हब बना दिया। लोग दूर-दूर से अपनी सेहत सुधारने उनके बाथहाउस आने लगे। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में भारतीय आयुर्वेद और मालिश को एक नई पहचान दिलाई।

डीन के रेस्टोरेंट को उसकी असली जगह पर सेलिब्रेट करने वाली पट्टिका। फोटो साइमन हैरियट द्वारा यूक्फील्ड, इंग्लैंड से
बिहार का वह गुमनाम सितारा
1851में ब्राइटन में इस महान शख्सियत का निधन हो गया। आज पूरी दुनिया में अरबों डॉलर का शैम्पू उद्योग फल-फूल रहा है। गूगल ने भी उन पर डूडल बनाया है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस बिहार की मिट्टी ने उन्हें जन्म दिया वहां उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। दीन मोहम्मद की कहानी केवल एक कारोबारी की कहानी नहीं है। यह एक बिहारी की उस जिद की कहानी है जिसने दुनिया को स्वच्छता का नया तरीका सिखाया।
वे एक ऐसे पुल थे जिन्होंने पूर्व की सादगी और पश्चिम की आधुनिकता को जोड़ा। उन्होंने साबित किया कि अगर आपमें हुनर है तो आप सात समंदर पार जाकर भी अपना झंडा गाड़ सकते हैं। आज जब हम बिहार के गौरव की बात करते हैं तो हमें शेख दीन मोहम्मद जैसे नायकों को भी याद करना चाहिए। उन्होंने किसी सियासी अखाड़े में नहीं बल्कि अपनी बुद्धि और मेहनत से दुनिया को जीता था।
वे एक लेखक थे एक उद्यमी थे और सबसे बढ़कर एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने सीमाओं को कभी नहीं माना। आज हर भारतीय के बाथरूम में मौजूद शैम्पू की बोतल उस बिहारी दिमाग की याद दिलाती है जिसने दुनिया को नहाना सिखाया। हमें जरूरत है कि हम राजनीति और विवादों से ऊपर उठकर अपनी ऐसी जड़ों को पहचानें और उन पर गर्व करें।