रुबैया, कोलकाता
पश्चिम बंगाल के अलिपुरदुआर जिले में बॉक्सा पहाड़ की हरियाली में छुपा है इतिहास का एक नीरव गवाह-बॉक्सा किला ( Buxa Fort)। घने जंगल और ऊँचे पहाड़ों की छाँव में यह किला आज भी अपने अतीत की कहानियाँ फुसफुसाता है। चारों ओर शाल, सागौन, ओक, बर्च और पाइन्स के विशाल वृक्ष फैले हैं। इन पेड़ों के बीच झुरमुट में अनेक प्रकार के फूल और रंग-बिरंगे तितलियाँ उड़ती हैं। हवा में झिंगुरों की आवाज़ गूँजती है और कहीं-कहीं से मरे हुए पुराने धुंए जैसी धुंधलकी वादियों में छितरी हुई नजर आती है। इस प्राकृतिक मोहक वातावरण के बीच छुपा है उस किले का इतिहास, जिसने कई स्वतंत्रता संग्रामियों की हिम्मत और जुझारूपन को सीखा।

बॉक्सा किला ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एक कुख्यात कारागार था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी यहाँ बंद रहे। पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा यह किला समुद्र तल से लगभग 2700 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इसकी शुरुआती इमारत प्राचीन काल में भूटानी राजाओं ने लकड़ी और बांस से बनाई थी। इसका उपयोग सिल्क रूट की सुरक्षा के लिए किया जाता था, जो तिब्बत से होकर भारत तक जाती थी।
समय के साथ कोचबीहार के राजा ने इसे ब्रिटिशों के हाथ में सौंप दिया। 1865 में सिंचुला संधि के बाद ब्रिटिशों ने पुरानी लकड़ी और बांस की संरचना तोड़कर इसे पथर की मजबूत इमारत में बदल दिया। तभी से यह किला ब्रिटिश अधिकारियों के लिए एक डिटेंशन कैम्प बन गया। यहाँ बंदिशों के लिए किसी प्रकार की सहूलियत नहीं थी। छोटे-छोटे अंधेरे कमरे, कठोर सुरक्षा और घने जंगलों में बाघ और चीते जैसी जंगली प्रजातियों का डर, इसे एक कठिन और अप्रतिरोध्य जेल बनाता था।

इस किले में अनेक स्वतंत्रता सेनानी बंद रहे। अनिल राय, प्रफुल्ल गुप्ता, जितीन दास, सनील लाहिड़ी, देशबंधु चित्तरंजन दास और पुलिन दास जैसे कई वीरों ने यहाँ अपने साहस और धैर्य की परीक्षा दी। कहा जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी यहाँ कुछ समय के लिए बंद किया गया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, नेताजी छह दिन में लामा के भेष में किले से भाग निकले। हालांकि इसकी पुष्टि के लिए प्रमाण मिलना कठिन है।
बॉक्सा किले के बंदियों ने सिर्फ अत्याचार सहा नहीं, बल्कि प्रतिरोध भी किया। हिजली जेल में गोलीकांड के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। कभी-कभी वे वहाँ कवि और साहित्यिक कार्यक्रम भी आयोजित करते थे। ऐसा ही एक अवसर था जब बक्सा किले के बंदियों ने रबींद्र जयंती मनाई। उस समय रबींद्रनाथ ठाकुर दार्जिलिंग में थे और उन्होंने बंदियों को एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने लिखा, “अमृत के पुत्र मोरा कहारा सुनाल विश्वमय, आत्मविसर्जन करें आत्मारे के जानिल अक्षय।” यह पत्र पहले बक्सा डाकघर में पहुँचा और बाद में किले के बंदियों के हाथों में गया। आज भी किले के प्रवेश द्वार पर इस पत्र की स्मृति संरक्षित है।
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बॉक्सा नाम को लेकर कई मत हैं। कुछ का कहना है कि यह भूटानी शब्द ‘बॉक्सार’ से आया है, जिसका अर्थ करिडोर होता है। कुछ का मानना है कि यह बॉक्साइट खदान से निकला। इतिहास में यह क्षेत्र भूटान और कोचबीहार के राजाओं के बीच विवाद का केंद्र रहा। यह स्थान एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग और रणनीतिक कनेक्शन का हिस्सा था।
बॉक्सा किला ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारियों के लिए कठोर कारावास केंद्र था। छोटे, अंधेरे कमरे, कम संसाधन और कठोर पहरे, इसे एक डरावनी जगह बनाते थे। इसकी ऊँचाई और जंगली इलाके के कारण यहाँ से भाग पाना लगभग असंभव था। 1930 के दशक में कृष्णपद चक्रवर्ती जैसे कई क्रांतिकारी बंद थे। स्वतंत्रता के बाद भी यह किला बंदियों के लिए इस्तेमाल होता रहा। कवि और मार्क्सवादी आंदोलन के कई कार्यकर्ता यहाँ रखे गए।
1959 में तिब्बत की स्वतंत्रता आंदोलन असफल होने के बाद कई तिब्बती संन्यासी भारत आए। इस समय बक्सा किला परित्यक्त जेल से शरणार्थी केंद्र और पढ़ाई का केंद्र बन गया। 1971 तक संन्यासियों ने यह स्थान छोड़ दिया।
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आज बक्सा किला अलिपुरदुआर का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। हालांकि पहुँचना आसान नहीं है। स्थानीय लोग आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं। ऊँचाई और कठिन रास्तों के बीच छोटे खेत और पर्यटन गाइडिंग उनके जीविकोपार्जन का साधन है। कई लोग चाय और कॉफी के छोटे स्टॉल लगाते हैं, लेकिन पूरे दिन बहुत अधिक पर्यटक नहीं आते।
वर्तमान में किला लगभग खंडहर में है। राष्ट्रीय स्मारक घोषित होने के बावजूद, इसका उचित संरक्षण नहीं हुआ। भारत के अन्य ऐतिहासिक कारागार, जैसे अलिपुर जेल और सेलुलर जेल, संरक्षित और सुरक्षित हैं। इसके विपरीत बक्सा किला अब भी उपेक्षित है।
बॉक्सा किला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह स्वतंत्रता संग्रामियों की हिम्मत, संघर्ष और ब्रिटिश अत्याचार की याद दिलाता है। इसके अंधेरे कमरे, ऊँचे पहाड़ और घने जंगल उस समय के इतिहास को जीवित रखते हैं। यह किला इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए अब भी एक आकर्षक गंतव्य है।
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बॉक्सा किला आज भी हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता आसान नहीं थी। यह हमें उन वीरों की याद दिलाता है जिन्होंने अपने साहस और धैर्य से अत्याचार का सामना किया। इस किले के हर कोने में कहानी छुपी है—कहानी संघर्ष की, धैर्य की और असली आज़ादी की।