400 भाषाओं का ज्ञाता: मह्मूद अकरम, जो शब्दों से दुनिया जोड़ता है

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 10-01-2026
A master of 400 languages: Mahmood Akram, who connects the world through words.
A master of 400 languages: Mahmood Akram, who connects the world through words.

 

dभारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहाँ हर कुछ सौ किलोमीटर पर भाषा, बोली और लहजा बदल जाता है, भाषाई विविधता को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। कुछ लोग इसे अव्यवस्था मानते हैं, तो कुछ इसे सांस्कृतिक संपदा। लेकिन तमिलनाडु के 19 वर्षीय मह्मूद अकरम के लिए यह सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है। उनके लिए भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम है, न कि विवाद का कारण।"आवाज द वाॅयस की विशेष सीरिज द चेंज मेकर्स केलिए हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने तमिलनाडु के चेन्नई के मह्मूद अकरम पर यह विशेष रिपोर्ट तैयार की हैI

fमह्मूद अकरम एक असाधारण भाषाविद् हैं। वे लगभग 400 भाषाओं को पढ़ और लिख सकते हैं और 46 भाषाओं को समझते हैं। इनमें से वे 10 भाषाओं में पूरी तरह धाराप्रवाह हैं-तमिल, अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, अरबी, जर्मन, फ़्रेंच, स्पैनिश, चीनी, जापानी और कोरियाई। इतनी कम उम्र में इतनी भाषाओं का ज्ञान उन्हें दुनिया से अलग बनाता है।

उनकी भाषाई यात्रा बहुत कम उम्र में शुरू हो गई थी। जब वे सिर्फ चार साल के थे, तब उन्होंने अंग्रेज़ी की वर्णमाला और तमिल भाषा के सभी 299 अक्षर कुछ ही हफ्तों में सीख लिए। आठ साल की उम्र तक वे लगभग 50 भाषाओं में पढ़ने, लिखने और टाइप करने लगे थे। यह क्षमता सामान्य नहीं थी, इसलिए जल्द ही दुनिया का ध्यान उनकी ओर गया।

कम उम्र में ही उन्होंने कई विश्व रिकॉर्ड बनाए। दस साल की उम्र में उन्होंने भारत का राष्ट्रगान 20 अलग-अलग लिपियों में एक घंटे से भी कम समय में लिखकर रिकॉर्ड बनाया। बारह साल की उम्र में उन्होंने तीन मिनट के भीतर एक वाक्य का अनुवाद 70 अन्य भाषाविदों से ज़्यादा भाषाओं में करके सबको चौंका दिया।

dमह्मूद का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ भाषाओं का माहौल पहले से मौजूद था। उनके पिता स्वयं एक बहुभाषी व्यक्ति हैं, जिन्होंने तमिलनाडु से बाहर काम करते हुए 16 भाषाएँ सीखी थीं। बचपन से ही मह्मूद अलग-अलग भाषाओं की ध्वनियों, लिपियों और उच्चारणों के बीच पले-बढ़े। हालांकि, वे यह स्पष्ट करते हैं कि भाषा पढ़-लिख लेने और उसे वास्तव में समझने में फर्क होता है। उनके शब्दों में, “मैं 400 भाषाएँ पढ़ और लिख सकता हूँ, लेकिन उनमें से केवल 46 ही वास्तव में समझता हूँ।”

भाषा को लेकर उनका दृष्टिकोण बहुत व्यावहारिक है। उनके लिए भाषा भावनाओं या यादों का भंडार नहीं, बल्कि विचारों को एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँचाने का साधन है। वे मानते हैं कि विचार और इंसान, भाषा से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

ww

भारत और चीन की तुलना करते हुए मह्मूद कहते हैं कि दोनों ही भाषाई विविधता के मामले में महाद्वीप जैसे हैं। चीन में हर क्षेत्र में मंदारिन अनिवार्य है, जिसके कारण वहाँ की स्थानीय भाषाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। वे मानते हैं कि यदि भारत भी सभी राज्यों में एक ही भाषा को अनिवार्य कर दे, तो यहाँ की कई भाषाएँ भी खत्म हो सकती हैं। उनके अनुसार, एक समान भाषा से एकता तो बढ़ सकती है, लेकिन इसकी कीमत भाषाई विविधता के नुकसान के रूप में चुकानी पड़ेगी।

वे कहते हैं, “भाषा तो सिर्फ भाषा है।” उनका मानना है कि दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान है, इसलिए उसे सीखना व्यावहारिक रूप से फायदेमंद है। हालांकि, वे इस बहस में नहीं पड़ते कि भाषाओं को कैसे बचाया जाए या कौन-सी भाषा अधिक महत्वपूर्ण है।

भाषाएँ सीखना उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि अनुशासन से भरा जीवन तरीका है। जहाँ आम लोग समय को महीनों या सालों में बाँटते हैं, मह्मूद अपने जीवन को हफ्तों में बाँटते हैं। हर हफ्ता एक भाषा के लिए तय होता है। जिस भाषा का सप्ताह होता है, उसी भाषा में वे पूरी तरह डूब जाते हैं। जब उनसे बातचीत हुई, तब उनके लिए अरबी भाषा का सप्ताह चल रहा था।

उस दौरान उन्होंने अपने मोबाइल फ़ोन, सोशल मीडिया अकाउंट और अन्य डिजिटल उपकरणों की भाषा अरबी कर रखी थी। वे अरबी में समाचार देखते थे, फ़िल्में और वीडियो देखते थे, संगीत सुनते थे और पढ़ते-लिखते भी अरबी में ही थे। अगले सप्ताह वे यही प्रक्रिया किसी दूसरी भाषा के साथ दोहराते हैं।

संस्कृत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने इसे सीखने की कोशिश की थी, लेकिन अच्छे आधुनिक संसाधनों की कमी के कारण छोड़ दिया। उन्हें पारंपरिक कक्षा में शिक्षक द्वारा पढ़ाया जाना उबाऊ लगता है। वे स्वयं सीखना अधिक पसंद करते हैं। उनका मानना है कि संस्कृत आज के समय में व्यवहार में नहीं है और वे भविष्य पर ध्यान देना चाहते हैं, न कि अतीत पर। इसी कारण उन्होंने लैटिन भाषा भी सीखना शुरू तो किया, लेकिन आगे नहीं बढ़ाया।

मह्मूद का लक्ष्य है कि जिन 46 भाषाओं को वे समझते हैं, उनमें सभी में कम से कम B1 स्तर की दक्षता हासिल करें। अभी उनके पास कुछ ही भाषाओं में यह प्रमाणपत्र है, लेकिन वे धीरे-धीरे सभी में यह स्तर प्राप्त करना चाहते हैं।

वे मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए 100 दिनों में किसी भाषा के शुरुआती या मध्यम स्तर तक पहुँचना संभव है, यदि उसमें ध्यान, स्मरण शक्ति और अनुशासन हो। उनकी सीखने की पद्धति बहुत स्पष्ट है—पहले तीन हफ्ते पढ़ना और लिखना, फिर सरल पाठ पढ़ना, सोशल मीडिया और ऑडियो सामग्री सुनना, फ़िल्में और संगीत देखना-सुनना, और अंत में पूरी तरह उस भाषा में जीवन जीना।

भाषाओं के प्रति उनके जुनून के कारण पारंपरिक स्कूल व्यवस्था उनके लिए कठिन साबित हुई। स्कूल की सख़्त प्रणाली में उनकी रुचि के लिए जगह नहीं थी। अंततः उन्होंने भारत में ओपन स्कूलिंग अपनाई। इसके बाद वे चार साल के लिए ऑस्ट्रिया गए, जहाँ उन्होंने अपनी पसंद के विषय पढ़े और जर्मन भाषा में दक्षता हासिल की। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग से अपनी मैट्रिक पूरी की।

वर्तमान में वे चेन्नई में रहते हैं और एक साथ तीन डिग्रियाँ कर रहे हैं—इंग्लैंड की एक ओपन यूनिवर्सिटी से भाषाविज्ञान, मद्रास विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातक, और अलागप्पा विश्वविद्यालय से एनीमेशन। वे नियमित रूप से केवल एनीमेशन की कक्षाओं में जाते हैं और बाकी विषयों की परीक्षाएँ देते हैं।

उनका दीर्घकालिक सपना शिक्षक बनने का है। वे चाहते हैं कि विदेशी भाषाएँ सीखने वाले छात्रों को उनकी मातृभाषा में ही पढ़ाया जाए। उनका कहना है, “अगर मैं जर्मन भाषा में बात करते हुए किसी जर्मन को हिंदी सिखा सकूँ, तभी ज्ञान के असली दरवाज़े खुलते हैं।” वे अपने पिता के अकरम ग्लोबल लैंग्वेजेज़ इंस्टिट्यूट में पढ़ाते भी हैं।

एक बाल प्रतिभा के रूप में उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। दस साल की उम्र में उन्हें दक्षिण अफ़्रीका की नागरिकता का प्रस्ताव मिला था। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई स्कूलों ने उन्हें अतिथि शिक्षक के रूप में आमंत्रित किया।

भारत में एक मुसलमान के रूप में बड़े होने के अनुभव पर वे बहुत संतुलित ढंग से बात करते हैं। वे बताते हैं कि दस साल पहले उन्हें और उनके परिवार को पर्याप्त सहयोग नहीं मिला। उनकी शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं था। हालांकि, उनका मानना है कि हाल के वर्षों में स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है।

आज उनकी सबसे बड़ी इच्छा तिरुक्कुरल का कई भाषाओं में अनुवाद करना है, ताकि इसकी शिक्षाएँ दुनिया के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सकें। साथ ही वे नई भाषाएँ सीखते रहना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिए भाषा लोगों के दिल तक पहुँचने का सबसे सीधा रास्ता है।

बातचीत के अंत में वे कुछ अरबी शब्द सिखाते हैं-मरहबा (नमस्ते), शुक्रान (धन्यवाद), कैफ़ अल-हाल? (आप कैसे हैं?) और अल्हम्दुलिल्लाह (ईश्वर की कृपा से सब ठीक है)। उनके लिए ये शब्द सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़ने की कुंजी हैं।