महिला दिवस विशेष: UPSC में मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती सफलता
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 08-03-2026
Women's Day Special: Rising success of Muslim women in UPSC (img:ai)
ओनिका माहेश्वरी, नई दिल्ली
देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के हालिया नतीजे एक सुखद बदलाव की गवाही दे रहे हैं। इस बार के परिणामों ने विशेष रूप से उन मुस्लिम महिला प्रतिभागियों की ओर सबका ध्यान खींचा है, जिन्होंने शीर्ष 25 में अपनी जगह बनाई। हालांकि यह कोई अचानक हुआ चमत्कार नहीं है। पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि मुस्लिम महिलाएं हर साल इस परीक्षा में अपने झंडे गाड़ रही हैं। वे न केवल सफल हो रही हैं, बल्कि उस पुरानी और रूढ़िवादी धारणा को भी ध्वस्त कर रही हैं कि मुस्लिम महिलाएं सिर्फ घर की चारदिवारी तक सीमित हैं।
जकात फाउंडेशन के जफर महमूद ने एक बार बहुत सटीक बात कही थी कि वह जमाना अब बीत चुका है जब औरतों की जिंदगी सिर्फ घर के अंदर कटती थी। आज वक्त बदल चुका है। मुस्लिम महिलाएं अब पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। यह बदलाव केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक है। जब एक महिला प्रशासनिक सेवा में आती है, तो वह अपने साथ पूरे परिवार और समाज के लिए तरक्की के नए रास्ते खोल देती है। 2020 से 2025 तक के यूपीएससी के परिणाम बताते हैं कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में इन बेटियों की मौजूदगी लगातार मजबूत हो रही है।
इन सफलताओं के पीछे सबसे प्रेरक पहलू उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि है। ये बेटियां महलों से नहीं, बल्कि तंग गलियों और सीमित संसाधनों वाले घरों से निकलकर आई हैं। इनमें से कोई ऑटो-रिक्शा चलाने वाले की बेटी है, तो किसी के पिता छोटी सी दुकान पर क्रॉकरी बेचते हैं। इन लड़कियों ने साबित किया है कि अगर इरादा पक्का हो और मेहनत सच्ची, तो अभावों की कोख से भी गौरवशाली भविष्य का जन्म हो सकता है।
महाराष्ट्र के यवतमाल की अदीबा अनम की कहानी संघर्ष की जीती-जागती मिसाल है। अदीबा के पिता किराए का ऑटो-रिक्शा चलाकर परिवार पालते थे। पूरा परिवार एक छोटे से किराए के मकान में रहता था। अदीबा का शुरुआती सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। तीन बार की असफलता के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। साल 2024 के नतीजों में 142वीं रैंक हासिल कर उन्होंने दिखा दिया कि एक साधारण रिक्शा चालक की बेटी भी देश की सर्वोच्च सेवा तक पहुंच सकती है।
ऐसी ही एक दास्तान बनारस की अरफा उस्मानी की है। अरफा के पिता असलम खान वाराणसी की एक छोटी सी दुकान पर क्रॉकरी बेचते हैं। अरफा बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहीं। उन्होंने आईआईटी (बीएचयू) से डिग्री ली। अच्छी नौकरी के विकल्प मौजूद थे, लेकिन उन्होंने समाज सेवा की राह चुनी। बिना किसी भारी-भरकम कोचिंग के, आत्मनिर्भर तैयारी के बल पर उन्होंने चौथे प्रयास में 111वीं रैंक हासिल की। अरफा की यह जीत उन लाखों लड़कियों के लिए उम्मीद है जो संसाधनों की कमी को अपनी कमजोरी मान बैठती हैं।
कोलकाता की साइमा खान की कहानी धैर्य और एकाग्रता का पाठ पढ़ाती है। मोमिनपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली साइमा ने अपनी तैयारी के दौरान दुनिया से पूरी तरह दूरी बना ली थी। उन्होंने कई सालों तक शादी-ब्याह, रिश्तेदारों और सोशल मीडिया से खुद को दूर रखा। तीन बार नाकाम होने के बावजूद वे डटी रहीं। अंततः चौथे प्रयास में 165वीं रैंक पाकर उन्होंने अपना सपना पूरा किया। साइमा का मानना है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता और हर असफलता आपको जीत के करीब ले जाती है।
हाल के वर्षों में कई और नामों ने भी सुर्खियां बटोरी हैं। इफरा शम्स अंसारी ने साल 2025 के नतीजों में 24वीं रैंक हासिल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। वहीं, नौशीन (रैंक 9) और वरदाह खान (रैंक 18) जैसी मेधावियों ने टॉप-20 में जगह बनाकर यह साफ कर दिया कि मुस्लिम महिलाओं का प्रदर्शन अब उम्मीद से कहीं बेहतर है। इसी तरह अबीर असद जैसी उम्मीदवार, जो एक मौलाना की बेटी हैं, ने बिना किसी कोचिंग के सेल्फ-स्टडी के दम पर 35वीं रैंक प्राप्त की। यह उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो शिक्षा और धार्मिक पृष्ठभूमि को एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं।
यूपीएससी में मुस्लिम उम्मीदवारों, खासकर महिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है। साल 2020 में जहां सदफ चौधरी ने 23वीं रैंक के साथ मुस्लिम उम्मीदवारों में टॉप किया था, वहीं 2023 और 2024 में यह संख्या और बढ़ी। साल 2025 की घोषणा में भी लगभग 13 से अधिक मुस्लिम महिलाएं सफल रहीं। इरम चौधरी (AIR 40) और फरखंदा कुरैशी (AIR 67) जैसे नाम अब समाज में रोल मॉडल बन चुके हैं।
पिछले कुछ वर्षों के UPSC परिणाम भी इस बात की पुष्टि करते हैं। साल 2025 में Muslim उम्मीदवारों की संख्या लगभग 53 थी, जिनमें से 13+ महिलाएं शामिल हैं। इफरा शम्स अंसारी ने 24वीं रैंक हासिल की। साल 2024 में Muslim महिलाओं में इरम चौधरी ने AIR 40, फरखंदा कुरैशी ने AIR 67 और अदीबा अनम ने AIR 142 प्राप्त की। साल 2023 में नौशीन AIR 9, वरदाह खान AIR 18 और साइमा खान AIR 165 पर रहीं। साल 2022 में आयशा फातिमा AIR 184 और काजी आयशा इब्राहिम AIR 586 पर रहीं। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम महिलाएं लगातार शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रशासनिक सेवाओं में आगे बढ़ रही हैं।
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यह बढ़ता आत्मविश्वास बताता है कि मुस्लिम समाज में अब शिक्षा को लेकर नई चेतना आई है। अब बेटियां केवल स्नातक करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे नीति निर्धारण और प्रशासन का हिस्सा बनने की महत्वाकांक्षा रख रही हैं। इन लड़कियों ने समाज की बेड़ियों को अपनी उड़ान की ताकत बनाया है। इनकी सफलता न केवल उनके परिवारों को गरीबी से बाहर निकाल रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा दीया जला रही है जो कभी बुझने वाला नहीं है। आज ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि यदि अवसर और सही मंच मिले, तो वे आसमान छूने की काबिलियत रखती हैं।