इस्लामफोबिया का इतिहास: नफरत के दौर में समझ की तलाश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-03-2026
The History of Islamophobia: A Quest for Understanding in an Era of Hate
The History of Islamophobia: A Quest for Understanding in an Era of Hate

 

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साकिब सलीम

साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने 15 मार्च को 'इस्लामफोबिया से लड़ने का अंतरराष्ट्रीय दिवस' घोषित किया। आज जिस 'इस्लामफोबिया' शब्द को हम बार-बार सुनते हैं, उसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। 1997 में ब्रिटेन के एक थिंक टैंक 'रनीमीड' (Runnymede) की रिपोर्ट आने के बाद यह शब्द आम चर्चा का हिस्सा बना। सोवियत संघ के पतन, खाड़ी युद्ध और 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' जैसी थ्योरी आने के बाद पश्चिमी देशों में मुसलमानों के प्रति नफरत का एक नया दौर शुरू हुआ। 9/11 के हमलों के बाद यह नफरत और बढ़ गई। संयुक्त राष्ट्र ने भी माना कि इस्लामफोबिया अब नस्लवाद और यहूदी विरोधी भावनाओं (एंटी-सेमिटिज्म) की तरह एक बड़ी वैश्विक समस्या बन चुका है।

शब्द की उत्पत्ति और पुराना संदर्भ

'इस्लामफोबिया' शब्द का सबसे पहला जिक्र 1910 में मिलता है। फ्रांस के एक छात्र एलन क्वेलिएन ने अपनी डॉक्टरेट थीसिस में इसका इस्तेमाल किया था। जफर इकबाल ने अपनी किताब में बताया है कि एलन ने तभी पश्चिम के नकारात्मक रवैये की आलोचना की थी। एलन का मानना था कि इस्लामफोबिया असल में एक तरह का नस्लवाद है। इसमें इस्लाम को यूरोप का कट्टर दुश्मन मान लिया जाता है और उसकी पूरी सभ्यता को नकार दिया जाता है।

हालांकि 1997 तक यह शब्द बहुत कम इस्तेमाल होता था। रनीमीड फाउंडेशन की रिपोर्ट ने इसे परिभाषित किया। रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामफोबिया का मतलब इस्लाम के प्रति बेवजह की दुश्मनी है। इसकी वजह से मुस्लिम व्यक्तियों और समुदायों के साथ भेदभाव होता है। उन्हें राजनीति और समाज की मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाता है।

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विरोध और तर्क

उस वक्त भी इस रिपोर्ट का विरोध हुआ था। आज भी कई लोग यही तर्क देते हैं कि 'इस्लामफोबिया' शब्द का इस्तेमाल इस्लाम की जायज आलोचना को दबाने के लिए किया जाता है। उस समय मीडिया ने रनीमीड पर आरोप लगाया कि वह 'इस्लामिकली करेक्ट' होने की कोशिश कर रहा है और मुस्लिम समाज की बुराइयों को छिपा रहा है।

लेकिन रिपोर्ट बनाने वालों का तर्क अलग था। उनका कहना था कि जैसे यूरोप में यहूदियों के खिलाफ बढ़ती नफरत को पहचानने के लिए 'एंटी-सेमिटिज्म' शब्द जरूरी था, वैसे ही मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते पूर्वाग्रह को नाम देना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम के कानूनों या मुस्लिम देशों की नीतियों की आलोचना करना इस्लामफोबिया नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब इस्लाम को लेकर एक 'बंद नजरिया' (Closed view) अपना लिया जाता है।

बंद नजरिया बनाम खुला नजरिया

इस्लामफोबिया को समझने के लिए रनीमीड रिपोर्ट ने आठ मुख्य बिंदु बताए थे। इसमें सबसे अहम है यह समझना कि क्या हम इस्लाम को एक पत्थर की लकीर जैसा मानते हैं या एक विविधतापूर्ण समूह के रूप में देखते हैं।

भारत के उदाहरण से इसे बेहतर समझा जा सकता है। यहाँ एक बड़ा वर्ग मानता है कि सभी मुसलमान एक जैसा खान-पान रखते हैं, एक जैसे कपड़े पहनते हैं और उनकी सोच एक जैसी है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। भारत के फिल्म और फैशन उद्योग में मुस्लिम कलाकारों की बड़ी भूमिका है। इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा फॉलो की जाने वाली जन्नत जुबैर मुस्लिम हैं। कई मुसलमान शाकाहारी होते हैं। कई शराब भी पीते हैं। कुछ संगीत को पसंद करते हैं, कुछ नहीं। मुसलमान कोई एक सांचे में ढले लोग नहीं हैं, बल्कि वे एक मोजेक (विविध रंगों का मेल) की तरह हैं। जब लोग इस विविधता को समझेंगे, तो रूढ़िवादिता और नफरत अपने आप कम होगी।

एक और गलत धारणा यह है कि इस्लाम अपने मानने वालों को दूसरी संस्कृतियों से अलग रखता है। भारत में अक्सर दावा किया जाता है कि मुसलमानों की संस्कृति हिंदुओं या सिखों से बिल्कुल अलग है। जबकि सच्चाई इसके उलट है। विदेशी मुसलमान अक्सर भारतीय मुसलमानों पर आरोप लगाते हैं कि उन पर हिंदू संस्कृति का बहुत गहरा असर है। भारतीय मुसलमान अपनी जगह के हिसाब से सिंदूर और चूड़ियां जैसी परंपराएं भी निभाते हैं। दुनिया में हर जगह मुसलमानों और अन्य समुदायों के बीच सांस्कृतिक लेन-देन एक सच्चाई है।

राजनीति और डर का माहौल

इस्लामफोबिया का एक पहलू यह भी है कि इस्लाम को सिर्फ एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में देखा जाता है। किसी भी सामान्य गतिविधि को शक की नजर से देखा जाने लगता है। प्यार को 'लव जिहाद' और जमीन की खरीद को 'लैंड जिहाद' का नाम दे दिया जाता है। 'खुला नजरिया' रखने वाला व्यक्ति इस्लाम को एक आस्था के तौर पर देखता है, जहां इंसान अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी।

इस नफरत की वजह से भेदभाव को जायज ठहराया जाने लगता है। खान-पान के नाम पर हाउसिंग सोसायटियों में घर नहीं दिए जाते। पहनावे के नाम पर स्कूलों के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। रिपोर्ट कहती है कि इस्लाम के साथ वैचारिक मतभेद होना एक बात है, लेकिन भेदभाव करना पूरी तरह गलत है।

समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव

इस्लामफोबिया सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरनाक है। इसके कुछ गंभीर परिणाम इस प्रकार हैं:

  1. अन्याय: यह एक न्यायपूर्ण और विविधतापूर्ण समाज बनने के रास्ते में रुकावट डालता है।

  2. युवाओं पर असर: मीडिया में लगातार नकारात्मक छवि देखने से मुस्लिम युवाओं में हीन भावना आती है। आत्मविश्वास की कमी की वजह से वे कभी-कभी चरमपंथी समूहों की ओर आकर्षित हो सकते हैं, जो उन्हें एक झूठी पहचान का एहसास दिलाते हैं।

  3. सामाजिक अशांति: इससे समाज में टकराव और अशांति बढ़ने का खतरा रहता है।

  4. मुख्यधारा की आवाजें दबना: नफरत के माहौल में मुस्लिम समुदाय के भीतर उठने वाली उदार और समझदार आवाजें दब जाती हैं।

  5. आर्थिक नुकसान: भेदभाव की वजह से काबिलियत और टैलेंट का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है।

  6. आपसी सहयोग का खत्म होना: जब भरोसा नहीं होता, तो मुसलमान और गैर-मुसलमान मिलकर साझा समस्याओं (जैसे गरीबी या बीमारी) का हल नहीं निकाल पाते।

  7. अंतरराष्ट्रीय संबंध: इस्लामफोबिया से देशों के बीच व्यापार, कूटनीति और रिश्तों पर बुरा असर पड़ता है।

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जफर इकबाल लिखते हैं कि इस्लामफोबिया से लड़ने के लिए मुसलमानों की सांस्कृतिक पहचान को समझना जरूरी है। उनकी भाषा, खान-पान, क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। आज दुनिया भर में मुसलमानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'स्टीरियोटाइपिंग' (एक ही छवि में बांधना) है। जब तक हम इंसान को उसके धर्म के चश्मे से हटकर उसकी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पहचान से नहीं देखेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

संवाद और खुलापन ही वह रास्ता है जिससे इस बढ़ती नफरत को कम किया जा सकता है। एक-दूसरे की विविधताओं का सम्मान करना ही एक स्वस्थ समाज की नींव है।

लेखक: स्वतंत्र पत्रकार एवं शोधकर्ता