डी. शरीफ़ा ख़ानम की कहानी उन अनगिनत महिलाओं की कहानियों से अलग नहीं है, जिनकी मदद करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 62 वर्षीय ख़ानम भी अपने आसपास की कई महिलाओं की तरह पुरुष वर्चस्व और पितृसत्ता को देखते हुए बड़ी हुईं और इसे सामाजिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा मानती रहीं। लेकिन एक क्षण ऐसा आया, जब उन्हें यह अहसास हुआ कि एक महिला की भी अपनी स्वतंत्र पहचान होती है और उसका जीवन केवल पुरुष-प्रधान समाज की अपेक्षाओं के अनुसार ढलने के लिए नहीं है। आवाज द वाॅयस की विशेष सीरिज द चेंज मेकर्स केलिए हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने तमिलनाडु के डी. शरीफ़ा ख़ानम पर यह विशेष रिपोर्ट तैयार की हैI
शरीफ़ा ख़ानम तमिलनाडु के एक गाँव में दस बच्चों में सबसे छोटी थीं। उन्होंने एक उर्दू स्कूल में पढ़ाई की, जहाँ उनकी माँ शिक्षिका थीं। उनकी माँ अपने पति से अलग हो चुकी थीं और अकेले ही बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए संघर्ष कर रही थीं।
ख़ानम के एक बड़े भाई ने आईआईटी कानपुर में पढ़ाई की और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनके दाख़िले में मदद की। एएमयू में पढ़ते हुए ख़ानम पहली बार अपने गाँव से बाहर की दुनिया से रूबरू हुईं।
पढ़ाई पूरी करने के बाद, 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पटना में आयोजित एक महिला सम्मेलन में उन्होंने अनुवादक के रूप में काम किया। वे हिंदी और अंग्रेज़ी में दिए गए भाषणों और चर्चाओं का तमिल में अनुवाद करती थीं। इसी दौरान एक सच्चाई उनसे छिपी नहीं रह सकी—हर जगह, हर समुदाय और हर राज्य में महिलाएँ पीड़ा झेल रही थीं।
लगातार यात्राएँ, महिलाओं के अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उन अधिकारों की स्पष्ट अनुपस्थिति ने उन्हें कुछ करने के लिए दृढ़ संकल्पित कर दिया।
एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वे खुद को सिंड्रेला की तरह मानती थीं, जो अपनी फेयरी
गॉडमदर का इंतज़ार कर रही हो। लेकिन इस आत्मबोध के बाद उन्होंने तय किया कि वे न केवल अपनी, बल्कि अपने जैसी अन्य महिलाओं की भी गॉडमदर खुद बनेंगी।
उन्होंने पुडुक्कोट्टई में कुछ महिलाओं के छोटे समूह के साथ काम शुरू किया। ट्यूशन पढ़ाकर और साड़ियाँ बेचकर कमाए गए पैसों को वे आपस में जमा करती थीं।
1987 में यह प्रयास ‘स्टेप्स’ (STEPS) संगठन के रूप में सामने आया। महिलाएँ तलाक़, घरेलू हिंसा, परित्याग, ग़रीबी और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याएँ लेकर उनके पास आने लगीं। ख़ानम ने काउंसलिंग, मध्यस्थता और क़ानूनी रास्तों से समाधान खोजने की कोशिश की। उनके काम से प्रभावित होकर तत्कालीन ज़िला कलेक्टर ने उन्हें इस परियोजना को बड़े पैमाने पर शुरू करने के लिए ज़मीन भी आवंटित की।
रेडिफ़ को दिए एक इंटरव्यू में ख़ानम ने कहा कि लंबे समय तक उन्हें अपनी मुस्लिम पहचान का विशेष बोध नहीं था, जब तक कि आसपास के इलाक़ों में सांप्रदायिक दंगे नहीं भड़क उठे।
मुसलमानों, ख़ासकर मुस्लिम महिलाओं की असुरक्षा को अपनी आँखों से देखने के बाद उनके काम की दिशा बदल गई। यहीं से मुस्लिम महिलाओं की जमाअत का विचार जन्मा। परंपरागत रूप से जमाअत मस्जिद से जुड़ा एक समूह होता है, जिसमें आमतौर पर पुरुष बुज़ुर्ग शामिल होते हैं और वे सामुदायिक मुद्दों पर फ़ैसले करते हैं। ख़ानम का मानना था कि ऐसे फ़ैसले लगभग हमेशा महिलाओं के ख़िलाफ़ होते हैं।

1991 में उन्होंने एक अनौपचारिक मुस्लिम महिला जमाअत की शुरुआत की। उनका विश्वास था कि यही एकमात्र तरीका है, जिससे महिलाओं की आवाज़ सुनी जा सके। उनका यह भी मानना था कि धर्मनिरपेक्ष संगठन अक्सर मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने से हिचकते हैं, शायद धार्मिक नेताओं या मौजूदा जमाअतों को नाराज़ करने के डर से।
उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि मुसलमानों को अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही करना होगा। समय के साथ यह काम और संगठित हुआ और वर्ष 2000 में ‘तमिलनाडु मुस्लिम महिला जमाअत समिति’ अस्तित्व में आई, जो स्टेप्स की एक इकाई के रूप में काम करने लगी।
ख़ानम का मानना था कि अन्याय का सामना करने पर मुस्लिम महिलाओं के पास जाने के लिए कोई ठोस मंच नहीं था। अचानक तलाक़, तीन तलाक़, भरण-पोषण से इनकार, घरेलू हिंसा और शोषण के अन्य मामलों को पुलिस अक्सर शरीयत या मुस्लिम पर्सनल लॉ का मामला बताकर टाल देती थी।

ये मामले पुरुष-प्रधान जमाअतों में भी दबा दिए जाते थे, जिन्हें ख़ानम ने ‘कंगारू कोर्ट’ की संज्ञा दी है। उनका कहना था कि इसका एक बड़ा कारण क़ुरान की पुरुषों द्वारा की गई ग़लत व्याख्याएँ हैं, क्योंकि वह अरबी लिपि में है।इस वजह से महिलाओं के पास न तो सही जानकारी होती थी और न ही उन व्याख्याओं को चुनौती देने का आत्मविश्वास। जब ख़ानम ने क़ुरान का तमिल अनुवाद पढ़ा, तो उन्हें मूल पाठ और मस्जिद से जुड़ी जमाअतों द्वारा लागू किए जा रहे नियमों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया।
महिला जमाअत ने शरीयत पर कार्यशालाएँ आयोजित करनी शुरू कीं और तीन तलाक़ की समाप्ति तथा महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों पर सरकार से पैरवी की। जमाअत की वेबसाइट के अनुसार, तमिलनाडु मुस्लिम महिला जमाअत समिति को मौलवियों और पुरुष-नेतृत्व वाले संगठनों से लगातार विरोध, यहाँ तक कि जान से मारने की धमकियाँ भी मिलीं।
जमाअत ज़िला स्तर पर हर महीने और पुडुक्कोट्टई स्थित मुख्यालय में हर तीन महीने में बैठक करती है। महिलाएँ अपनी समस्याएँ इन बैठकों में रखती हैं, जहाँ काउंसलिंग, पुलिस या अदालत के ज़रिये समाधान खोजने की कोशिश की जाती है। जो मामले हल नहीं हो पाते, उन्हें केंद्रीय स्तर की बैठकों में उठाया जाता है। ख़ानम ने कई मंचों पर कहा है कि जमाअत के काम शुरू करने के बाद तमिलनाडु की कुछ मस्जिदों ने भी महिलाओं के लिए जगह बनानी शुरू की है।
इसके साथ-साथ, स्टेप्स महिला विकास संगठन हिंसा और उत्पीड़न का सामना कर रही महिलाओं के लिए एक सुरक्षित आश्रय के रूप में काम करता है। यह पीड़ित महिलाओं को अल्पकालिक आवास सुविधा प्रदान करता है और स्थानीय समुदायों तथा पुलिस के साथ मिलकर काम करता है। समय के साथ स्टेप्स ने महिलाओं की आजीविका, भूमि अधिकार और रोज़गार जैसे मुद्दों को भी अपने दायरे में शामिल किया है।
लेख लिखे जाने तक कई प्रयासों के बावजूद ख़ानम साक्षात्कार के लिए उपलब्ध नहीं हो सकीं। उनके कार्यालय ने जमाअत या केवल महिलाओं के लिए मस्जिद बनाने के उनके कथित विचारों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि, अन्य मंचों पर उन्होंने स्पष्ट किया है कि मस्जिद कभी उनका मुख्य उद्देश्य नहीं थी। असली बात यह थी कि महिलाएँ एक साथ आएँ, खुलकर बात करें और सामूहिक रूप से अपनी समस्याओं का समाधान खोजें—जो जमाअत पहले से कर रही है। पीड़ित महिलाओं के लिए अल्पकालिक आश्रय गृह का उनका पुराना सपना स्टेप्स के माध्यम से पूरा किया जा रहा है।
स्टेप्स की वेबसाइट पर संगठन का मूल विश्वास दर्ज है: आत्मसम्मान महिलाओं की मुक्ति की बुनियाद है। यह संगठन दहेज उत्पीड़न, तलाक़ विवाद, यौन उत्पीड़न, बाल यौन शोषण और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं से जूझ रही महिलाओं को सहायता और परामर्श प्रदान करता है। अपने हस्तक्षेपों के ज़रिये स्टेप्स लगभग 3,500 महिलाओं की मदद करने का दावा करता है।

स्टेप्स ने शुरुआत में स्कूल और कॉलेज के छात्रों तथा ग्रामीण महिलाओं के साथ जागरूकता कार्यक्रमों—जैसे कार्यशालाएँ, पोस्टर प्रदर्शनियाँ, प्रतियोगिताएँ और आत्मरक्षा प्रशिक्षण के ज़रिये काम किया। वर्षों में यह संकटग्रस्त महिलाओं के लिए एक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जो स्थानीय और राज्य स्तर पर मुद्दे उठाता है और व्यावहारिक समाधान के लिए प्रयास करता है।
लगभग दो दशकों से डी. शरीफ़ा ख़ानम भारत के महिला आंदोलन में एक सक्रिय और सशक्त उपस्थिति बनी हुई हैं। पुडुक्कोट्टई से संचालित स्टेप्स आज भी रोज़ाना हिंसा के मामलों में हस्तक्षेप करता है और परिवारों, समुदायों तथा संस्थाओं के साथ मिलकर काम करता है। इसके केंद्र में एक सरल लेकिन शक्तिशाली विचार है कि महिलाएँ, ख़ासकर वे जो समाज के हाशिये पर हैं, सुनी जाने की हक़दार हैं।