श्रीलता एम.
शमा मोहम्मद, एआईसीसी की प्रवक्ता और राजनीति में एक दशक से अधिक अनुभव रखने वाली, भारतीय राजनीति में महिलाओं की चुनौतियों को अच्छी तरह समझती हैं। वह जानती हैं कि किसी महिला के लिए, खासकर मुस्लिम महिला के लिए, राजनीति में आगे बढ़ना कितना कठिन है। 2024 में महिला आरक्षण बिल के पारित होने के बावजूद कांग्रेस ने किसी मुस्लिम महिला को लोकसभा का टिकट नहीं दिया और देशभर में केवल दो मुस्लिम महिलाएं विधायक हैं। शमा कहती हैं, राजनीति में सबसे बड़ा रोड़ा पुरुष हैं। केरल में जब उन्होंने जिला स्तर पर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, तो पार्टी के पुरुष नेताओं को लगा कि वह सफल नहीं हो सकतीं। और जब उन्होंने सफलता पाई, तो उन्हें नापसंद किया गया।

शमा मोहम्मद अपने रास्ते की तीन सबसे बड़ी बाधाओं को बताती हैं। पहली यह कि वह किसी राजनीतिक वंश से नहीं हैं। दूसरी, वह महिला हैं। तीसरी, वह मुस्लिम हैं। कांग्रेस में ओडिशा की सोफिया फिरदौस या कर्नाटक की कनीज फातिमा जैसी महिलाएं अपने राजनीतिक परिवारों के समर्थन से आगे बढ़ीं। लेकिन शमा के पास ऐसा कोई समर्थन नहीं था। वह कहती हैं कि ऐसे मुस्लिम महिलाएं बहुत कम हैं जो अपने दम पर राजनीति में आगे बढ़ रही हों। वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में महिलाओं को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया है। उनकी पांच सांसदों में से तीन महिलाएं हैं, लेकिन कांग्रेस और बीजेपी केवल 13 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर पाई हैं।
शमा की राजनीतिक यात्रा अचानक नहीं शुरू हुई। वह पहले डेंटिस्ट थीं और बाद में जेडी न्यूज में रिपोर्टर बनीं। वह कुवैत में पली-बढ़ीं और अपने पिता के साथ बीबीसी, अल जज़ीरा और अन्य चैनलों पर दुनिया भर की राजनीति पर बहसें देखती थीं। उनके पिता की राजनीति और विश्व मामलों में रुचि ने उनमें भी राजनीतिक समझ विकसित की। वर्षों तक समाचार देखना, बहसों में हिस्सा लेना और जिला स्तर की राजनीति में सक्रिय रहना उन्हें एक धाराप्रवाह और निडर प्रवक्ता बना गया।

मीडिया में उनका काम उन्हें राजनीति के करीब ले आया। वह याद करती हैं कि मनीष शर्मा और अभिषेक मनु सिंहवी जैसे साथी रोज़ टीवी पर बहस करते थे। जेडी न्यूज में काम करते हुए उन्हें राजनीति को कवर करने के ज्यादा मौके नहीं मिले, लेकिन उनके जुनून को देखकर किसी ने उन्हें कांग्रेस के मीडिया विभाग में रंधीप सूरजवाला से मिलने भेजा। इसके बाद वह पार्टी के लिए काम करने लगीं और पुणे और दिल्ली के बीच लगातार यात्रा करती रहीं। उस समय ज़ूम या स्काइप नहीं था, बहसों में भाग लेने के लिए फिजिकली उपस्थित होना जरूरी था।
मीडिया में काम करने के साथ ही शमा ने केरल के जिला स्तर पर पार्टी के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। यह आसान नहीं था। उस समय उनके बच्चे छोटे थे, बड़ा बेटा 14 साल का और छोटा बेटा 11 साल का। पति अबू धाबी में होने के कारण बच्चों और घर का ध्यान रखना कठिन था। परिवार और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण था। लेकिन शमा ने हार नहीं मानी।
शमा कहती हैं कि उन्होंने राजनीति इसलिए चुनी क्योंकि संसद में अपराधियों, वसूली करने वालों और अन्य असामाजिक तत्वों को देखा और केवल शिकायतें सुनाई जाती थीं, कोई बदलाव नहीं होता था। उन्होंने बदलाव का हिस्सा बनने का निर्णय लिया। मुस्लिम होने के कारण उन्हें अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें पाकिस्तान का एजेंट, जिहादी या देशविरोधी कहते। लेकिन इस सबने उनकी मानसिक मजबूती को और बढ़ाया।
पार्टी में महिलाओं के लिए रास्ता सीमित होने के बावजूद, शमा ने अपना ध्यान जमीनी स्तर के काम पर केंद्रित किया। उन्होंने कन्नूर, केरल में ज़ोया चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। यह ट्रस्ट 2018 में शुरू हुआ और पहले स्कूलों की मरम्मत पर काम करता था, खासकर 2019 की बाढ़ के बाद। हाल ही में ट्रस्ट ने पीटी उषा के जिले में एक खेल स्कूल खोला और पैंचशील ग्रुप की मदद से एक और खेल स्कूल खोलने की योजना है। ट्रस्ट शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं के सशक्तिकरण के काम भी करता है।
शमा कांग्रेस में बदलाव की जरूरत भी स्पष्ट रूप से बताती हैं। वह चाहती हैं कि महिलाओं को अधिक टिकट दिए जाएं। पार्टी को सक्षम और मेहनती महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना चाहिए, जैसे तृणमूल कांग्रेस करती है। बदलाव धीरे-धीरे आता है, लेकिन शमा इस दिशा में लगातार काम कर रही हैं। केरल में महिलाओं की आबादी 51 प्रतिशत है और अगर उन्हें किनारे रखा जाता है, तो वह इसे चुनौती के रूप में लेती हैं। उनके लिए मुस्लिम और महिला होना केवल संघर्ष नहीं, बल्कि प्रेरणा है।
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शमा की कहानी यह दिखाती है कि कठिनाइयों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद, महिलाएं और मुस्लिम होने के बावजूद बदलाव ला सकती हैं। वह पार्टी में और जमीनी स्तर पर दोनों जगह सक्रिय हैं। उनके काम और ट्रस्ट की गतिविधियों ने यह दिखा दिया कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए केवल राजनीतिक पद होना जरूरी नहीं।
केरल में चुनाव नज़दीक आते ही यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी आवाज़ और महिलाओं के लिए प्रतिनिधित्व का उनका दृष्टिकोण वास्तविकता में बदल पाएगा। शमा मोहम्मद अपनी यात्रा लगातार जारी रखती हैं और बदलाव लाने के लिए प्रयासरत हैं। उनका जीवन और संघर्ष यह संदेश देता है कि महिलाओं को राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल करने और उनकी मेहनत को मान्यता देने की सख्त जरूरत है।
शमा का उदाहरण उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने अधिकारों और समाज में समान प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। वह दिखाती हैं कि अगर हौसला, समर्पण और मेहनत हो तो कोई भी बाधा असंभव नहीं। उनका जीवन यह साबित करता है कि महिलाओं की भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि समाज में बदलाव और सशक्तिकरण का प्रतीक है।
उनकी कहानी यह भी याद दिलाती है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्गों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। शमा ने साबित किया कि जब पुरुष और सामाजिक संरचनाएँ आपको सीमित करती हैं, तब भी दृढ़ इच्छा शक्ति, संघर्ष और जमीनी स्तर पर काम करने की प्रतिबद्धता किसी भी चुनौती को पार कर सकती है।

शमा मोहम्मद न केवल राजनीतिक बाधाओं को तोड़ रही हैं, बल्कि अपने ज़ोया ट्रस्ट के माध्यम से समाज में महिलाओं, बच्चों और जरूरतमंदों के लिए स्थायी बदलाव भी ला रही हैं। उनके जीवन का संदेश स्पष्ट है, संघर्ष और समर्पण के बिना समाज में कोई बड़ा परिवर्तन संभव नहीं है।
शमा मोहम्मद की कहानी सिर्फ राजनीतिक सफलता की नहीं, बल्कि साहस, धैर्य और सामाजिक जिम्मेदारी की कहानी है। यह कहानी हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो अपने हौसले और मेहनत के बल पर सीमाओं को पार करना चाहती है।