एहसान फ़ज़ीली, श्रीनगर
सकारात्मक आरक्षण किस तरह लोगों की तकदीर बदल सकता है, इसका उदाहरण इस साल साफ दिखा। प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा 2025 में जम्मू कश्मीर से इस बार रिकॉर्ड 17 उम्मीदवार सफल हुए हैं। इन 17 में से पांच उम्मीदवार पाहाड़ी समुदाय से हैं। इस समुदाय को दो साल पहले अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।
इस सफलता की सूची में एक और नाम खास है। 30 साल के दृष्टिबाधित युवक इरफान अहमद लोन ने भी परीक्षा पास की है। उन्होंने 957वीं रैंक हासिल की। इरफान का गांव मंजपोरा, नैदखई, जिला बांदीपोरा है। उनकी सफलता से पूरे इलाके में खुशी का माहौल है।
पाहाड़ी समुदाय से जिन पांच उम्मीदवारों का चयन हुआ है, उनमें सुवन शर्मा शामिल हैं। वह राजौरी के नौशेरा इलाके के लाम्बेरी गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने 148वीं रैंक हासिल की। डॉ. गुलाम माया दीन मलिक राजौरी से हैं और उन्हें 683वीं रैंक मिली। पूंछ के आकाश जग्गी को 747वीं रैंक मिली। मोहम्मद एजाज उल रहमान मंडी, पूंछ से हैं और उनकी रैंक 869 है। उरी बारामूला के अज़हर आसिफ खान को 886वीं रैंक मिली है।

ये सभी उम्मीदवार नियंत्रण रेखा के पास के सीमावर्ती इलाकों से आते हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को लंबे समय से कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहा है।यह पहला मौका है जब जम्मू कश्मीर के पाहाड़ी समुदाय के उम्मीदवार आरक्षित श्रेणी में सिविल सेवा परीक्षा में सफल हुए हैं। इससे पहले गुज्जर और बकरवाल समुदाय को 1991 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।
जम्मू कश्मीर पाहाड़ी ट्राइबल फोरम के प्रमुख सैयद शबीर अहमद गिलानी ने इसे ऐतिहासिक पल बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह जम्मू कश्मीर के पाहाड़ी जनजातीय लोगों के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक शांतिपूर्ण संघर्ष के बाद इस समुदाय को संवैधानिक पहचान मिली है।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार के इस फैसले से युवाओं के लिए नए अवसर खुले हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सिविल सेवा परीक्षा में समुदाय के युवाओं की सफलता उनकी प्रतिभा और मेहनत का प्रमाण है। यह सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है बल्कि पूरे पाहाड़ी समाज के लिए गर्व का क्षण है।
कश्मीर में लोग इरफान अहमद लोन को भी खूब बधाई दे रहे हैं। उन्होंने अपनी शारीरिक परेशानी को कभी अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया।इरफान के पिता बशीर अहमद लोन ने बताया कि उनके बेटे की आंखों की रोशनी स्कूल के शुरुआती दिनों में ही चली गई थी। वह जम्मू कश्मीर सरकार में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं।
बचपन में एक सहपाठी ने गलती से पेंसिल उनकी आंख में चुभा दी थी। इससे उनकी एक आंख की रोशनी चली गई। बाद में दूसरी आंख की रोशनी भी खत्म हो गई। इसके बावजूद इरफान ने पढ़ाई नहीं छोड़ी।उनके पिता बताते हैं कि इरफान अपनी महत्वाकांक्षा के बारे में ज्यादा बात नहीं करते थे। वह बस पढ़ाई में लगे रहते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि जो लोग अपने लक्ष्य के बारे में ज्यादा बोलते हैं, वे अक्सर उसे हासिल नहीं कर पाते।
इरफान की छोटी बहन शाज़िया ने भी बताया कि उनका भाई हमेशा मेहनती रहा है। उसका पूरा ध्यान यूपीएससी पास करने पर था।पिता ने उन्हें देहरादून के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर विजुअली हैंडीकैप्ड में दाखिला दिलाया। वहीं से उन्होंने दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से स्नातक किया। आगे की पढ़ाई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से की, जहां से उन्होंने मास्टर डिग्री हासिल की।

परिवार के एक सदस्य ने बताया कि इरफान को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी का ऑफर भी मिला था। लेकिन उन्होंने उसे छोड़कर यूपीएससी की तैयारी को प्राथमिकता दी।इरफान ने चौथे प्रयास में यह परीक्षा पास की है। इस समय वह दिल्ली में हैं और एलआईसी में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम कर रहे हैं।
सोनावारी के विधायक हिलाल अकबर लोन ने भी उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि इरफान ने यूपीएससी पास करके इतिहास रचा है। उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया।उनकी मेहनत और लगातार प्रयास आने वाले समय में हजारों युवाओं को प्रेरित करेंगे। जो भी बड़े सपने देखते हैं, उनके लिए इरफान की कहानी एक नई उम्मीद बन सकती है।