उप्र शहरी निकाय चुनावः पसमांदा मुस्लिमों से बदलता राजनैतिक परिदृश्य

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 4 Months ago
पसमांदा मुस्लिमों से बदलता राजनैतिक परिदृश्य
पसमांदा मुस्लिमों से बदलता राजनैतिक परिदृश्य

 

परवेज हनीफ

लघु भारत जैसे उप्र के हालिया नगर क्षेत्र चुनाव के परिणाम सामने आए. लगभग 21 करोड़ जनसंख्या वाले इस प्रदेश से 80 सांसद हैं और इस राज्य ने देश को अधिकांश प्रधानमंत्री दिए हैं. नगर निकायों के त्रिस्तरीय चुनाव में 17 महानगर, 199 नगर पालिका परिषद तथा 544 नगर पंचायतें शामिल थीं.

नगर क्षेत्र के वार्ड प्रबन्धन हेतु बोर्ड के गठन के साथ एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत पूरे प्रदेश के 75 जिलों में चुनाव सम्पन्न हुए. लोगों ने अपने शहर के प्रथम नागरिक को चुना.

राजनैतिक दलों ने लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर जनता का मूड मीटर समझने के लिए अपने चुनाव-चिन्ह देकर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे. इस चुनाव में लगभग 32 जिलों में पसमांदा मुस्लिम यानी पिछड़ी जातियां, प्रभावी 20 प्रतिशत जनसंख्या सहभागिता में भारतीय मूल के मुस्लिमों की 85 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें कथित विदेशी मूल के अशराफ 15 प्रतिशत ही हैं.

परंतु देश के मसलकों व मरकजों और धार्मिक संस्थाओं में अशराफों की, भारत पर 800 वर्ष के शासन के बाद आज भी 75 वर्षीय लोकतंत्र में सियासी दखल के चलते सर्वोच्चता रही है.

परन्तु सामाजिक न्याय अधिकारिता, गरीब-जरूरतमन्द पसमांदा की विकास में भागीदारी, निःशुल्क शिक्षा अवसर, मुफ्त आवास, खाद्यान्य, गरीब कन्या विवाह, आयुष्मान गोल्डन कार्ड से 5 लाख तक के मुफ्त पात्रों को प्राईवेट इलाज, सामाजिक राजनैतिक सुधार और तीन तलाक अध्यादेश के चलते, सामाजिक परिदृश्य में परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है.

हालाँकि पहले पसमांद को विधायिका और संसद में जाने का गेट-पास यानी टिकट ही नहीं मिलता था और विदेशी मूल के पुराने अशराफ शासक वर्ग के लिए पसमांदा को शासक के रूप में मान्यता देना ‘सिर पर जूती’ समान कहा जाता था. अशराफ, पसमांदा के वोट तो लेता था, लेकिन पसमांदा में सदियों की हीनभावना के चलते उन्हें लोकतंत्र में भी निम्न स्तर का बनाए रखा गया.

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इस आशातीत परिवर्तित परिदृश्य के पीछे के प्रभाव कारणों में प्रमुख रूप से उप्र के  सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल रहे, जिनका यूपी की सत्ता में 1989 से 2017 तक अधिकांश समीकरण पिछड़ों के नाम पर चला. सपा का एमवाई यानी मुस्लिम-यादव और बसपा का दबे कुचलों के नाम पर दलित-मुस्लिम समीकरण देखा गया.

सत्ता में रहे समाजवादी डा. लोहिया के अनुयायियों ने मुस्लिमों में 85 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिम यानी धर्मान्तरित हिन्दू दलित व पिछड़ों को वोट बैंक ही समझा और उन्हें न तो पिछड़ों की आबादी के अनुसार राजनैतिक हिस्सेदारी दी और न ही सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण.

इस वर्ग के अधिकांश हाथ के कारीगरों और पेशागत जाति की पहचान वालों के पेशे को भी मूल्य संवर्द्धन से जोड़ा न जा सका. इस वर्ग ने रोजगार के लिए आधुनिक भारत के बड़े और छोटे नगरों की ओर परिवार सहित पलायन किया.

जिससे शहर, कस्बों व महानगरों में आज पसमांदा समाज की जनसंख्या में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई है. किसी समय 80 प्रतिशत गांव-देहात में रहने वाला यह वर्ग आज 10-15 प्रतिशत पलायन कर शहरी बन गया है और तकनीकी, गैरतकनीकी, कृषि, गैर-कृषि आधारित अनेक रोजगारों में कुशल-अकुशल मजदूर और राष्ट्र के उत्पाद क्षेत्रों से जुड़ गया है.

उप्र के मुख्यमंत्री योगी ने ‘एक जिला-एक उत्पाद’ और मूल्य संवर्द्धन विकास पर फोकस किया. इसमें भी यह पसमांदा वर्ग अपनी सहभागिता दिखा रहा है.

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उप्र के विगत 2022 के विधानसभा चुनाव व उपचुनाव में पसमांदा वोट अपनी राजनैतिक स्वतंत्र सहभागिता में तुलनात्मक दृष्टि से अधिक मुखर नजर आया,  जैसा कि देखा गया कि परंपरागत रूप से कुल मुस्लिम मतदाताओं में धार्मिक मसलकों व मरकजों व इमाम के दखल के कारण भाजपा को हराने के लिए पार्टी विशेष को मत देने की प्रवृत्ति रही.

परन्तु पसमांदा भारतीय मूल के धर्मांतरित दलित पिछड़े मुस्लिम हैं. इसलिए वे ‘सबका साथ-सबका विकास’ और गरीबी उन्मूलन योजनाओं, मोदी आवास, आयुष्मान कार्ड से मुफ्त इलाज, मुफ्त अनाज, किसान-मजदूर पेंशन, निःशुल्क शिक्षा तथा सामाजिक न्याय के लिए तीन तलाक अधिनियम, दलित मुस्लिम को आरक्षण के लिए आयोग का गठन आदि प्रयास और सुविधाओं के कारण भाजपा के पक्ष में भी मतदान करते दिखे.

वर्तमान नगर निकाय के चुनाव के दौरान स्थिति में और परिवर्तन आया, जब गैर भाजपा दलों ने प्रचार किया कि भाजपा मुस्लिमों को टिकट नहीं देती, तो वोट क्यों देते हो? भाजपा के हैदराबाद में हुए वर्ष 2022 के राष्ट्रीय अधिवेशन में पसमांदा मुस्लिम विमर्श पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा करके भाजपा संगठन से उन तक पहुंच बनाने, समस्याएं जाने और सामाजिक न्याय की बात कही.

इसके बाद सामाजिक न्याय हेतु पसमांदा विमर्श पर वर्षों से कार्यरत संगठनों को बल मिला और उन्होंने अधिक मुखर होकर अनेक पसमांदा मुस्लिम प्रभावी प्रदेशों में सक्रिय हुए. अलीगढ़ से पंजीकृत ट्रस्ट, ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज ने जागरूकता कार्यक्रम चलाया.

पसमांदा बुद्धिजीवीयों ने पसमांदा समाज को विकास व सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भाजपा विरोधी सियासी मानसिकता से बाहर निकालने, जाति व्यवस्था से हटकर ‘वर्ग व्यवस्था विकास’ और भारतीय मूल के मुस्लिमों को जागरूक करने का कार्य किया.

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इससे उप्र के हालिया त्रिस्तरीय नगर निकाय के चुनाव में परिणाम और आश्चर्यजनक हो गए, जब भाजपा ने भी गैर-भाजपा दलों की तरह 390 टिकट मुस्लिमों और अधिकांश पसमांदा उम्मीदवारों को दिए, जो भाजपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़े. वहीं अन्य दलों ने भी बहुसंख्यक पसमांदाओं को टिकट दिए.

उप्र के 17 नगर निगमों में जहां सभी मेयर भाजपा के जीते, वहीं पसमांदा मुस्लिम पार्षद भी जीते. 2017 की तुलना में, 2023 में वोट प्रतिशत सभी महानगरों में बढ़ा. यह अलग बात है कि महानगरों में मुस्लिम प्रभावी क्षेत्रों के चलते कांग्रेस, आप और ओवेसी की पार्टी ने भी अपनी दस्तक देकर, दूसरे नंबर वाली सपा को पीछे धकेल दिया.

सर्वाधिक नगर क्षेत्र पंचायत के 544 नगरों में पिछड़े वर्ग की महिला व पिछड़ी जाति के आरक्षण के चलते भाजपा के चुनाव चिन्ह पर 4 और भाजपा के 11 पसमांदा समर्थित प्रत्याशियों ने विजय प्राप्त की. 

अनेक प्रतिद्वन्दी रहे सपा-21 व बसपा 11 व कांग्रेस-3 के साथ 32 सर्वाधिक निर्दलीय पिछड़े पसमांदा मुस्लिम ने दलगत स्तर पर जीत हासिल की. कुछ जिले जिसमें बोली से सर्वाधिक 9, बदायूँ से 7, सहारनपुर से 6 व अनेक जनपदों में 4 नगर क्षेत्र पंचायत पर कब्जा किया, जिसमें अनारक्षित सीट पर भी पसमांदा ने जीत दर्ज की.

इसी प्रकार नगर पालिका परिषद के कुल 199 शहरी चुनाव क्षेत्र में भी 51 पसमांदा मुस्लिमों ने जीत हासिल की, जिसमें आरक्षित 13 पिछड़ा वर्ग अन्य पिछड़ा वर्ग महिला-11, महिला सामान्य-7 व अनारक्षित में सर्वाधिक 19 साटों पर जीत हुई. राजनैतिक पार्टियों में कुल सपा के 16 उम्मीदवारों से ज्यादा 17 निर्दलीयों ने बाजी मारी, जिसमें भाजपा समर्थित भी 7 हैं.

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कुल मिला कर अगर देखा जाए, तो डबल इंजन भाजपा सरकार में 17 नगर निगमों में 2017 की तुलना 2023 के चुनाव में सभी जगह वोट प्रतिशत बढ़ा. यह भी काबिलेगौर है कि इन महानगरों में पसमांदा शासन की कल्याण योजनाओं के चलते, पसमांदा पुरुषों से ज्यादा गृह स्वामिनी महिलाओं को भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट करते देखा गया तथा भाजपा द्वारा मुस्लिमों को टिकट दिए जाने से भी वोट ऊपर-नीचे ट्रांसफर हुए.

परन्तु यह आश्चर्यजनक है कि भाजपा के मंत्रियों के घर में भाजपा को हार मिली, जिसमें केंद्र व राज्य के मंत्री भी शामिल हैं. केन्द्र के राज्यमंत्री पंकज के क्षेत्र में 10 में 7 सीटें हारे. एसपी सिंह बघेल ने आगरा में 2 सीट खोईं.

महेन्द्र नाथ पाण्डे और अजय कुमार मिश्र के लखीमपुर में भाजपा तीसरे नंबर पर रही. राज्य के मंत्री कपिलदेव अग्रवाल को जिले की 8 सीटों पर हार मिली. यही हाल राज्यमंत्री वीएल वर्मा का बदायूँ में रहा.

रायबरेली में भी जिले की 9 से 5 में जीत हुई. इसी प्रकार अन्य भी मंत्रियों के क्षेत्र में भाजपा को आशातीत सफलता नहीं मिली. यह विचारणीय है. हालांकि कुछ मंत्रियों के क्षेत्र का हाल अच्छा भी रहा.

समाजवादी पार्टी कभी भाजपा के मुकाबले एमवाई समीकरण के कारण नम्बर 2 पर आक्रामक रहती थी. पसमांदा मुस्लिम ने उसका मुस्लिम समीकरण तोड़ दिया. मुस्लिम वोट कांग्रेस, भाजपा, इतेहादुल मुस्लमीन की तरफ गया तथा निर्दलीयों ने सबसे बड़ी संख्या में जीत दर्ज की.

इस चुनाव की यह भी विशेषता रही कि धर्म की जगह वर्ग, जातियों, विकास कार्यों, सरकारी सुविधाओं, मोदी आवास योजना, निःशुल्क राशन, माफिया-गुंडागर्दी पर रोक और सुशासन मुद्दा रहा. पुराने चेहरों को जनता ने कार्य के आधार पर अधिकांशतः नकार दिया.

सामान्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण के बिना किसी सांप्रदायिक तनाव के पसमांदा मुस्लिम ने अपनी जनसंख्या 85 प्रतिशत मुस्लिम के कारण जीत हासिल की और इस तरह भाजपा के प्रति नकारात्मक वोट में कमी आयी. मसलक, मरकज व धार्मिक हस्तक्षेप उतना प्रभावी नहीं रहा, जितना कि विधानसभा व लोकसभा चुनाव में रहता है.

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पसमांदा मुस्लिम के इस बदलते राजनैतिक परिदृश्य में देखें, तो पहले कांग्रेस की लगभग 60 वर्षीय केंद्रीय सरकार या गैर भाजपा कार्यकाल में संविधान की धारा-341 में भारतीय मूल के हिंदू समाज की दलित जातियों से धर्मान्तरित पसमांदा मुस्लिमों और धर्मान्तरित ईसाइयों को छोड़कर, सिक्खों व नव बौद्धों को दलित आरक्षण की मुख्य धारा से जोड़ा गया.

वहीं मुस्लिम वोट बैंक, भाजपा विरोधी नकारात्मक प्रचार-प्रसार में इस्तेमाल होता रहा और दलितों जैसी पिछड़ी जातियों तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को संवैधानिक समतामूलक अधिकार नहीं दिए गए.

इस पर 18 दिसंबर 2003 को राज्य सरकार में संसद में चर्चा हुई थी. परंतु इसके लिए वर्तमान भाजपा सरकार और सामाजिक न्याय अधिकार मंत्रालय द्वारा 6 अक्टूबर 2022 को गजट नोटिफिकेशन जारी करके सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया, जिसमें इस अधिकार के अंतर्गत दलितों जैसी जातियों को भी सामाजिक सुरक्षा, शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक न्याय के अधिकार दिलवाने के प्रयास किए गए.

स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुस्लिमों के लिए अपनी चिंताएं साझा कर पार्टी में संदेश दिया है. पहले भी रंगनाथ मिश्र व सच्चर कमेटी की रिपोर्टें आईं. परंतु वर्तमान में जनगणना 2011 के आधार के बाद धारा-341 में दलित मुस्लिमों को संवैधानिक अधिकार के परीक्षण के लिए आयोग का कार्यकाल दो वर्ष रखा गया, जो ज्यादा है, यह 6 माह में होना चाहिए.

ताकि पसमांदा मुस्लिम के बदलते राजनैतिक परिदृश्य में और प्रगति आ सके और उनका भाजपा में विश्वास पैदा हो. इसी प्रकार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे 150 सांसदों वाले पसमांदा मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में प्रभाव पड़ेगा,

जहां मंडल कमीशन के चलते पिछड़ी जाति की सरकारें 1989 से अधिकांशतः काबिज रहीं. इस पिछड़ी जाति क्रांति में पिछड़ी जातियों के ही एक समूह पसमांदा मुस्लिमों को सामाजिक न्याय की जगह, जाति विशेष प्रोत्साहन अभियान तक सीमित रखा गया.

विगत 15 सितंबर, 2001 के बाद से, राजनाथ सिंह के कार्यकाल में इस अन्याय को दूर करने के लिए हुकुम सिंह जी की अध्यक्षता में सामाजिक न्याय समिति में दयाराम पाल व पसमांदा मुस्लिम महाज की स्वयंसेवी संस्थाओं की मांग पर पिछड़ी जातियों को उनकी आबादी के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण देने को सेवित-असेवित वर्ग में विभाजित किया, जिसमें पसमांदा मुस्लिम को लाभ पहुंचता, परंतु न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण यह कानून नहीं बन सका, जिसकी आज भी उतनी ही जरूरत है.

आज पसमांदा मुस्लिम समाज के प्रखर बुद्धिजीवियों में सामाजिक, राजनैतिक समतामूलक समाज के लिए चेतना देखी जा रही है. यदि केंद्र सरकार संविधान की धारा-341 के तहत शेष पसमांदा मुस्लिम पिछड़ी जातियों को उनकी राज्यवार जनसंख्या के आधार पर 27 प्रतिशत आरक्षण देती है, तो पसमांदा हितों की 75 वर्ष में अनदेखी तथा मंडल कमीशन के 27 प्रतिशत पिछड़ी जाति के आरक्षण में जातिवाद पर अंकुश लगेगा, जिसका सीधा लाभ भारतीय मूल के 85 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिम को भी मिलेगा तथा जो अशराफ विदेशी मूल की जातियां हैं,

जिनका भारत में मरकज, मसलक व धार्मिक संगठनों पर एकाधिकार है तथा जो विकास और सामाजिक न्याय की जगह अपने ढंग से परोसी धर्मान्धता के नाम पर नकारात्मक राजनीति को आश्रय देते हैं तथा 800 साल देश में शासन करने और धर्म के नाम पर बंटवारे के लिए जिम्मेदार रहे हैं,

उनका प्रभाव कम होगा तथा हिंदू-मुस्लिम का एक बड़ा 85 प्रतिशत वर्ग देश के समूचे परिदृश्य को बदल सकेगा. आज धर्म के आधार पर हार्डकोरर राजनीति के बावजूद, यह सत्य अपनी जगह संघर्षरत और आशावान है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता के चलते सांप्रदायिकता के विरुद्ध सामाजिक समरसता का वातावरण निर्मित हो सकेगा.

(लेखक ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष हैं.)

 

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