पसमांदा मुसलामान की पृष्ठभूमि में उर्दू साहित्य

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] • 8 Months ago
पसमांदा मुसलामान की पृष्ठभूमि में उर्दू साहित्य
पसमांदा मुसलामान की पृष्ठभूमि में उर्दू साहित्य

 

डॉक्टर शारिद जमाल अंसारी
 
आधुनिक भारत में साहित्य, समाजशास्त्र, राजनीति और इतिहास में पसमांदा (पिछड़ा) मुसलमान  महत्वपूर्ण विषय है. इसकी पृष्ठभूमि बहुत लम्बी और गहरी है. लम्बे समय से मुस्लिम पिछड़ा वर्ग अपनों से ही अपने अधिकार और हक की लड़ाई लड़ता आ रहा है. स्वतंत्रता संग्राम में जौनपुर रियासत के पसमांदा मुसलमानों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. उग्र रूप से इस विद्रोह में भाग लिया था.

अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों में अधिकतर पसमांदा मुस्लिम समुदाय से ही सैनिक थे. लेकिन दुर्भाग्यवश, लाखों की संख्या में लोग मारे गए और तबाही मच गई.
 
लेकिन तथाकथित अभिजात्य वर्ग के कुछ बुद्धिजीवियों ने अपने ब्रिटिश आकाओं को खुश करने के उद्देश्य से पसमांदा मुस्लिम समाज के अजलाफ (पिछ्ड़ा) और अरज़ाल (अति-पिछ्ड़ अर्थात निन्म श्रेणी) मुसलमानों का अपमान किया. उन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए यहाँ तक कहा कि मुसलमानों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया, बल्कि उन उपद्रवी तत्वों में जाहिल जुलाहों ने भाग लिया था. 
 
जिस प्रकार राजनीति के क्षेत्र में पसमांदा मुसलमानों के साथ भेदभाव  किया जाता था. उसी प्रकार उर्दू साहित्य में भी इस वर्ग के साथ भेदभाव किया जाता रहा है. उर्दू भाषा को टकसाली या जहाज़ी भाषा की श्रेणी में रखा जाता है.
 
उर्दू भाषा को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फलने-फूलने का अवसर मिला. दिल्ली और लखनऊ इसकी दो बड़ी संस्थागत (दबिस्तान) श्रेणी उत्तर भारत में हैं, जिन्होंने उर्दू के प्रचार-प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. फोर्ट विलियम कॉलेज ने इसके प्रगति और विकास में मुख्य भूमिका निभाई है.
 
फ़ारसी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था. उर्दू भाषा ने फ़ारसी भाषा को सरकारी भाषा की श्रेणी से बाहर करके सर्वप्रथम दक्कन में इब्राहिम आदिल शाह के दरबार में सरकारी भाषा के रूप में स्थापित किया.
भारतीय समाज प्राचीन काल से ही मनुस्मृति की वर्ण एवं जाति व्यवस्था पर आधारित था.
 
समस्त भारत चार जातीय व्यवस्था में बँटा हुआ था. जिसमें ब्राह्मणों को स्वर्ण वर्ग के अंतर्गत विशेषाधिकार की श्रेणी प्राप्त थी. शूद्रों को समाज में पशु-पक्षियों से भी निम्न और तुच्छ श्रेणी में रख कर मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया था.
 
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शिक्षा, ज्ञान और समाज के साथ उनका संबंध नगण्य था. मानवता की सीमा को लांघ कर उनको मूल सुविधाओं से वंचित करते हुए कठोर दंड की व्यवस्था बनाई गई थी. यदि कोई शूद्र मंत्र जाप सुन लेता तो उसके कान में शीशा पिघला कर डाल दिया जाता था.
 
यदि कोई शिष्य किसी को अपना आन्तरिक गुरु स्वीकार करके अभ्यास करता और निपुणता प्राप्त करता तो गुरु गुरु दक्षिणा स्वरूप धनुष विद्या में निपुण शिष्य का अंगूठा काटने को कहता था. उर्दू साहित्य के प्रचार-प्रसार, प्रगति और विकास में उपरोक्त पंक्तियों में वर्णित वर्ण व्यवस्था का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है.
 
भारतीय भाषाओं में कई क्षेत्रीय भाषाएँ शामिल हैं जिनमें उर्दू को प्राथमिकता प्राप्त है. वास्तव में दलित साहित्य को आधार प्रदान करने में हिन्दी और मराठी साहित्य ही मुखर है. दलित साहित्य का विषयगत संबंध समाज में वर्तमान जातियों के शोषण तक ही सीमित नहीं है ,ब्राह्मणवादी सोच और उसके परिणामों के बारे में भी बताता है . इसके भविष्य के निहितार्थों को इंगित करता है.
 
2006 में सच्चर कमेटी ने मुस्लिम समाज में दो वर्ग (अजलाफ़ और अरज़ाल) की पहचान की थी.वर्तमान स्थिती भारत में उपस्थित हिंदु समाज के दलित वर्ग से भी बुरी और दैनीय थी. उसके विकास और प्रगति के लिए स्पष्ट बिंदुओं की सिफारिश भी की थी.
 
कुलीन मुस्लिम नेतृत्व ने इस वर्ग की दुर्दशा को बहुत ही सुंदर तरीक़े से देश के सामने समस्त मुस्लिम समाज को इसी श्रेणी में ला खड़ा किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि समस्त मुस्लिम समुदाय को दलित की श्रेणी में देखा जाने लगा. जबकि ऐसा नहीं है. अभिजात वर्ग भी विभिन्न गैर-भगवा राज्यों में सरकारी संस्थानों और विभागों में स्वयं को पिछड़ी श्रेणी में रख करके आरक्षण और विशेषाधिकार प्राप्त कर रहा है.
 
इसी प्रकार इस वर्ग ने हर जगह स्वयं के लिए व्यवस्था बनाने का प्रयत्न किया है. पसमांदा मुस्लिम विषय के प्रति उर्दू साहित्य का रुख भी वैसा ही है जैसे एक ब्राह्मण का दलित के प्रति, अर्थात दलितों का विषय उर्दू साहित्य में अछूत है.
 
इसका औचित्य यह है कि उर्दू साहित्य का संबंध मुस्लिम समाज से बहुत गहरा रहा है. इस साहित्य में वर्ण और श्रेणी व्यवस्था का विचार नगण्य है. अर्थात जब दलित विषय का डिस्कोर्स स्थापित किया जाता है, तब इस भाषा का संबंध मुस्लिम समाज से हो जाता है .
 
उर्दू को एक मुस्लिम भाषा का रूप मिल जाता है लेकिन और यह धारणा उसी समाज की उपज है जिसने अपने स्वार्थ के लिए भारतीय समाज को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि में बाँटा हुआ है.जब उर्दू पर धार्मिक कट्टरता का आरोप लगाया जाता है तो उर्दू एक धर्मनिरपेक्ष और भारतीय भाषा की श्रेणी प्राप्त कर लेती है. प्रचार किया जाने लगता है कि भाषा का कोई धर्म नहीं होता है. अबरार मुजीब ने अपने निबंध "मुस्लिम और दलित डिस्कोर्स" में लिखा है:
 
"उर्दू में इस अहम अदबी तहरीक को फ़रोग़ न मिलने की सबसे अहम वजह उर्दू का मुस्लमानों से गहरा रिश्ता की वजह से है. चूँकि इस्लाम में ज़ातों का निज़ाम हिंदू वर्ण के निज़ाम की तरह पुख़्ता और सख़्त नहीं है इसलिए समाजी रवाबित में सय्यद और अंसारी ज़ालिम-ओ-मज़लूम की शक्ल में ज़ाहिर नहीं होते. लेकिन यह उर्दू दानिशवरों की फ़िक्र का एक सतही अंदाज़ है. मुसलमान हिंदुस्तान के अंदर मआशी और समाजी इस्तेहसाल के नुक़्ता-ए-नज़र से दलितों से भी बदतर हालत में है.
 
उपर्युक्त पंक्ति से यह भी स्पष्ट होता है कि साहित्य से जुड़े मुस्लिम बुद्धिजीवी ऐसा वातावरण बना रहे हैं मानो यह आवश्यकता केवल 'अंसारी' समुदाय के लिए ही हो. सैयद और अंसारी के संदर्भ में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि मुस्लिम समाज में पसमांदा मुस्लिम आंदोलन का नेतृत्व केवल अंसारी समुदाय ही कर रहा है.
 
उन्होंने मुस्लिम समाज की दलित पहचान की वकालत की है और मुस्लिम समाज को ऐसे रूप में चित्रित किया है और दर्शाया है जैसे समस्त मुस्लिम समाज ही पसमांदा है और समस्त समाज को दलित श्रेणी में रखने की आवश्यकता है और पसमांदा मुस्लिम समाज के साथ-साथ कुलीन मुस्लिम समाज के साथ शोषण और भेदभाव किया गया। इस संबंध में वह आगे लिखते हैं:
 
"लेकिन दलित अदब की ये ताबीर इस लिहाज़ से तब्दील होनी चाहीए कि हिन्दुस्तान में हिंदू मज़हब की निचली ज़ातों के अलावा पूरा इस्लामी समाज भी ब्रह्मणी निज़ाम के ज़ुल्म-ओ-सितम और इस्तिहसाल का इसी तरह शिकार रहे, ऐसा बिल्कुल नहीं है. पसमांदा मुस्लिम समाज के संबंध में राष्ट्रनिर्माण के ताने-बाने का इतिहास देखने से पता चलता है कि मुस्लिम समाज में इस धारणा की स्थापना सलतनत काल में ही हो गई थी. ग़यासुद्दीन बलबन के काल में भी उन निम्न वर्ग मुस्लिमों की पहचान की गई, जिन लोगों ने नियुक्ति के समय अपनी जाति की पहचान छिपाई थी. दरबार के उच्च पदों पर नियुक्त किए गए थे. ग़यासुद्दीन बलबन के आदेश पर, ऐसे अधिकारियों को उनके वंश और नस्ल की शोध के बाद अपदस्थ कर दिया गया या मार दिया गया.
 
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राष्ट्रवादी पसमांदा मुस्लिम समाज ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था. इस समाज ने सुंदर और अखंड भारत का सपना देखा था जहाँ हर समुदाय और पंथ के लोग मेल-मिलाप, प्यार, दोस्ती, सद्भावना और एकजुटता के साथ रह सकें। इस संदर्भ में जॉन एलिया अपने कविता संग्रह "शायद’ के प्रस्तावना में लिखते हैं:
 
“इस गुफ़्तगु का हरगिज़ यह मतलब नहीं कि वह मुआशरा कोई तवाना और मिसाली मुआशरा था. ज़ाहिर है कि वो अपनी तबई उम्र को पहुँच चुका था .अब अपनी ज़िंदगी के आख़िरी साँस ले रहा था. वह मुआशरा तबक़ा-ए-अशराफ़ यानी शेखों, सय्यदों, मुग़्लों और पठानों का मुआशरा था. ये अशराफ़ अपने महरूम, पसमांदा और पेशावर मुस्लमान भाईयों को बड़ी हक़ारत के साथ ‘अजलाफ़’ कहते थे.
 
ये सदीयों के मज़लूम ‘अजलाफ़’ अशराफ़ की रईयत कहलाते थे. मगर अब सियासी और समाजी तहरीकों के बाइस वह बेदार हो रहे थे. उनकी अक्सरीयत क़ौम-परस्त थी और अशराफ़ मुस्लिम लीग में थे यानी जंग शुरू हो चुकी थी.
 
तबक़ा-ए-अशराफ़ चूँकि सदीयों से मुराआत याफता रहा था इसलिए ज़्यादा तालीम-याफ़ता, मुहज़्ज़ब और तख़लीक़ी था. मैंने उसके वजूद के ढहने की हालत को अपने इस शेअर में बयान किया है ;-
 
थे अजब ध्यान के दर-ओ-दीवार
गिरते-गिरते भी अपने ध्यान में थे”

जॉन एलिया खुद एक सैयद परिवार में पैदा हुए कम्युनिस्ट और कवि थे. आगे वह स्वर्ण समाज अपने स्वार्थ को साधने के उद्देश्य से कुछ भी कर सकता है इस संदर्भ में लिखते हैं:"बात यह है कि मुस्लिम-लीग, ख़ासतौर पर अलीगढ़ के तल्बा (जिन्हें तालीम के बाद मुलाज़मतें दरकार थीं ज़मींदारों, जागीरदारों, छोटे ताजिरों, छोटे सरमायादारों और मग़रिबी वज़’अ-क़त’अ के लोगों की नमाईंदा-तरीन तंज़ीम थी। ये लोग न मज़हबी थे न ग़ैर-मज़हबी"
 
अभिजात्य वर्ग अपने हित और स्वार्थ को वरियता देता है, इसलिए जहाँ भी उसे अपना हित दिखाई देता है, वह अपना हित साधने में कोई न कोई माध्यम निकाल ही लेता है. जॉन एलिया अपने काव्य संग्रह ‘शायद’ के प्रस्तावना में उस ओर संकेत किया है कि स्वर्ण मुसलमानों के लिए धर्म उनके लिए एक माध्यम मात्र है इसलिए "ये लोग न तो धार्मिक थे और न ही अधार्मिक" अर्थात यह न ही आस्तिक थे और न ही नास्तिक.
 
अब जबकि पस्मांदा मुस्लिम समाज संस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक मोर्चे पर अपने अधिकारों और मूल सुविधाओं के लिए लड़ रहा है तो उसको सबसे अधिक चुनौती अपने ही धर्म के स्वर्ण समाज से मिल रही है. यह समाज उनके विरुद्ध एक अलग एक विपरीत विचारधारा के साथ खड़ा है.
 
आज़ादी के बाद से ही पसमांदा मुस्लिम समाज साक्षी रहा है कि तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों ने मुस्लिम संगठनों, मदरसों और मुस्लिम अभिजात्य नेतृत्व के साथ बड़े नियोजित ढंग से अपने हितों को साधा और पसमांदा मुस्लिम समाज के लिए स्वर्ण मुस्लिम समाज से ही नेतृत्व नियुक्त किया और इस समाज ने पसमांदा मुस्लिम समाज को द्वीतीय नागरिक के रूप में रखा.
 
इस वर्ग को सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से और कमज़ोर करने के उद्देश्य इस समुदाय के सामने धार्मिक समस्याएं खड़ी करके ऐसी भयावह स्थिती पैदा की गई कि यह समाज अपना सब कुछ लुटा कर धर्म की रक्षा करने के लिए निकल पड़ा.
 
उसका परिणाम यह हुआ की जिस समाज में युवाओं को शिक्षा और उन्नति के मार्ग पर ले जाने की आवश्यक्ता थी वह दंगा-फ़साद जैसे असामाजिक गतिविधियों में पड़ गयए. क़ानून और पुलिस के हत्थे चढ़ गए. जेलों की सलाख़ों में अपना जीवन गिर्वी रख दिया.
 
इस घिनौनी राजनीत ने इस समाज को बार-बार अपने शिकंजे में कसा और संप्रदायिक महौल बना कर सौहार्द को बिगाड़ा और फिर से तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के पक्ष में वोट देने के लिए विवश कर दिया. इस समाज के लिए घृणापूर्ण स्वर आज भी इन स्वर्णों के यहाँ बड़े ज़ोर-शोर से बोले और प्रयोग किए जा रहे हैं .
 
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वह आज भी इस पिछड़े समाज को घृणा के दलदल में ढकेल देना चाहते हैं. अबरार मुजीब अपने लेख में लिखते हैं:
 
"उर्दू के चंद रसाइल में ये रुहजान भी देखने में आया कि छिछोरेपन की हद तक गिर कर बा’ज़ लोगों ने मुस्लमानों में ज़ातों की तक़सीम की शनाख़्त का अमल शुरू किया. उसे मुस्लिम आला ज़ात और मुस्लिम शूद्र के मसाइल में बदलने की मज़मूम कोशिश की. मुस्लमानों में किसी भी नुक़्ता-ए-नज़र से कम-अज़-कम हिंदुस्तान के अंदर रिवायती दलित तारीफ़ की सतह पर मुस्लमानों की तक़सीम मुम्किन ही नहीं और जो कोई इस किस्म की कोशिश में मुलव्विस है वो दरअसल हिंदू इंतिहा-पसंदों का ग़ुलाम है और उनके एजंडे पर अमल-पैरा है” 

उर्दू भाषा और साहित्य में विभेदीकरण के आधार पर कहा जा सकता है कि इस साहित्य में पसमांदा मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नगण्य ही नहीं बल्कि ना के बराबर है. उर्दू साहित्य में इस समुदाय के लिए कोई स्थान नहीं है. कहानी, अफसाना, दास्तान, उपन्यास, कविता आदि ऐसे विषयों से रहित है. केवल विषय स्थापित करना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि तथाकथित साहित्यकारों ने उन लेखकों और कवियों को उर्दू साहित्य में स्थान नहीं मिलने दिया, जो इसके योग्य और उपयुक्त थे.
 
उर्दू साहित्य में एक महान कवि नज़ीर अकबराबादी है, लेकिनउर्दू साहित्य में केवल इसलिए महत्व नहीं दिया गया कि उनका संबंध मुस्लिम स्वर्ण जाति से नहीं ,बल्कि कुरैशी जाति से है. एक राष्ट्रवादी कवि और मदरसा शिक्षक जिसने अपने जीवन में 95 वसंत देखे उसके शिष्यों की एक बड़ी संख्या भारत में फैली हुई थी.
 
लेकिन फिर भी उर्दू साहित्य में उन्हें नकारा गया. उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के हर विषय पर अपनी कविताएं लिखकर राष्ट्रीय एकता का एक उदाहरण दिया था. लेकिन उनके साथ अन्याय किया गया और कोई भी उनकी रचनाओं को उर्दू लिपि में प्रकाशित करने को तैयार नहीं हुआ, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद, विलास राय के पुत्रों जो उसके शिष्य थे ने विभिन्न रचनाओं को इकट्ठा किया .
 
उन्हें “कुल्लियात-ए-नज़ीर अकबरआबादी” के नाम से पहली बार प्रकाशित किया. फ्रांसीसी विद्वान एवं साहित्यकार गारसा द तासी के विचार में नज़ीर का पहला दीवान 1820 में देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुआ था आगरा के मत्बा इलाही ने 1867 में बहुत सी वृद्धियों के साथ उर्दू में उनकी कविताओं का संकलन प्रकाशित किया.
 
वह इमामिया धर्म को मानते थे, लेकिन वास्तव में वह एक सूफी और संत स्वभाव और शांतिप्रिय व्यक्ति थे. कभी-कभी वह जीवन को अद्वैतवाद की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन इनका नाम भारतीय सूफी कवियों की सूची में शामिल नहीं हैं.
 
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कबीर दास को जुलाहा बिरादरी से संबंध होने के कारण उनकी विचारधारा को प्रसारित नहीं किया गया. उन्हें उर्दू साहित्य में सूफी नहीं बल्कि संत की पदवी दी जाती है, जबकि शेख कुतबन भी कबीर की शैली में कविता लिखते हैं. उनको सूफ़ी की श्रेणी में रखा गया. इसी प्रकार मलिक मुहम्मद जायसी को सूफ़ी का दर्जा दिया जाता है.
 
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अभी पसमांदा मुस्लिम समाज को बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना है. साहित्य में इस विषय को स्थापित करने के लिए हम को कहानियों, लेखों और संगोष्ठियों के माध्यम से समाज और साहित्य को अपनी समस्याओं से अवगत कराना होगा .
 
( लेखक फ्रीलांस रिसर्च स्कॉलर हैं.पता : सेक्टर 73, नोएडा, उत्तर प्रदेश,मोबाइल: 8700381164,ईमेल: [email protected] )