नाम ‘सरसमल’, खून राजपूताना और दिल में महाभारत: मेव मुसलमानों की अजब-गजब दास्तां

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 31-08-2026
The name ‘Sarasmal’, Rajputana blood, and the Mahabharata in their hearts: The extraordinary tale of the Mev Muslims.
The name ‘Sarasmal’, Rajputana blood, and the Mahabharata in their hearts: The extraordinary tale of the Mev Muslims.

 

मलिक असगर हाशमी

अगर आपसे कोई कहे कि वह ‘सरसमल’, ‘फतेह सिंह’ या ‘तेल सिंह’ से मिलने जा रहा है, तो आपके ज़हन में पहला ख्याल यही आएगा कि ये किसी हिंदू भाई के नाम होंगे। लेकिन अगर आप ऐसा सोच रहे हैं, तो रुकिए! आप गलत हो सकते हैं। ये तीनों नाम किसी हिंदू के नहीं, बल्कि हरियाणा और राजस्थान के सीमावर्ती मेवात क्षेत्र में रहने वाले मेवाती मुसलमानों (मेव) के हैं।

दिल्ली से महज़ कुछ घंटों की दूरी पर बसा मेवात एक ऐसी दुनिया है, जहाँ इस्लाम की इबादत और भारत की सनातन संस्कृति की गहरी जड़ें एक साथ साँस लेती हैं। हाल के वर्षों में भले ही यहाँ तब्लीगी जमात के कई बड़े इज़्तिमा आयोजित हुए हों, लेकिन मेवाती मुसलमानों ने अपनी सदियों पुरानी संस्कृति, खान-पान, और पहनावे से अपना नाता नहीं तोड़ा है। फरीदाबाद में एक राष्ट्रीय दैनिक से जुड़े पत्रकार सरसमल कहते हैं-

                                             ‘‘ आज भी हर दूसरे मेवाती परिवार में आपको ऐसे नाम आसानी से मिल जाएँगे जो सुनने में ठेठ पारंपरिक लगते हैं।“

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सरसमल, दैनिक हिन्दुस्तान के फरीदाबाद संस्करण के प्रभारी हैं और हरियाणा के अच्छे पत्रकारों में इनकी गिनती होती है.

सिर पर साफा, थाली में घी-बुरा और महाभारत के सुर

मेवाती मुसलमानों की जीवनशैली देश के आम मुसलमानों से काफी अलग और दिलचस्प है। यहाँ के पुरुष गोल जालीदार टोपी पहनने के बजाय हिंदुओं की तरह सिर पर गर्व से साफा (पगड़ी) बाँधते हैं। वहीं, यहाँ की महिलाओं के पहनावे और घूँघट करने के तरीके को देखकर आपके लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा कि वे हिंदू हैं या मुस्लिम।

अतिथि सत्कार में आज भी यहाँ पारंपरिक रूप से 'घी-बुरे' से मेहमानों का स्वागत किया जाता है। संगीत की बात करें, तो शास्त्रीय संगीत का प्रसिद्ध 'मेवाती घराना' इसी मिट्टी की देन है, जिससे मशहूर गायिका सुलक्ष्णा पंडित जुड़ी रही हैं। वहीं, 'इंडियन आइडल' के विजेता और सूफी गायक सलमान अली भी मेवात के पुन्हाना से ही आते हैं।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मेव समुदाय अपनी भाषा में 'पांडुन के कड़े' गाता है, जो वास्तव में महाभारत की घटनाओं का मेवाती लोक संस्करण है। यहाँ शादी-ब्याह हो या कोई अन्य खुशी का मौका, महाभारत की ये लोकगाथाएँ बड़े चाव से गाई जाती हैं।

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इस मेवाती की वेश-भूषा से अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यह हिंदू है या मुसलमा. तस्वीरः एडवोकेट नूरूद्दीन नूर के फेसबुक वाल से ली गई है.

श्रीराम, श्रीकृष्ण और अर्जुन से वंश-परंपरा का नाता

मेवाती मुसलमान अपनी उत्पत्ति को लेकर जो दावे करते हैं, वे किसी को भी आश्चर्य में डाल सकते हैं। यहाँ के कई लोग खुद को श्रीराम, श्रीकृष्ण और पांडुपुत्र अर्जुन का वंशज मानते हैं। इतिहासकार बताते हैं कि 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच मेव समुदाय धीरे-धीरे इस्लाम की ओर बढ़ा, लेकिन धर्म बदलने के बावजूद उन्होंने अपने रीति-रिवाज, गोत्र व्यवस्था और परंपराओं को नहीं छोड़ा।

मेवाती समाज लगभग 100 'गोत्र-पाल' में बँटा हुआ है। आम तौर पर मुस्लिम समाज में एक ही गोत्र या रिश्तेदारों में शादियाँ हो जाती हैं, लेकिन मेव समुदाय में दशकों तक हिंदुओं की तरह एक ही गोत्र (पाल) में शादी करना सख्त वर्जित रहा। यद्यपि बदलते सामाजिक ताने-बाने और आधुनिक दबावों के कारण अब कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन गोत्र-पाल का सम्मान आज भी कायम है।

इतना ही नहीं, मेव समुदाय में वंशावली सहेजने की परंपरा भी बहुत अनोखी है, जिसे ‘जगार’ कहा जाता है। जीवन चक्र के हर बड़े समारोह में इस वंशावली को दोहराया जाता है। ये लोग दीवाली, दशहरा और होली जैसे त्योहार भी बड़े उत्साह से मनाते हैं।

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पशुओं के लिए चारा-पानी का इंतजाम करती मेवाती महिलाएं. तस्वीरः सद्दीक अहमद मेव के वाल से

गाय केवल पशु नहीं, 'माता' और 'देवी' है

भारत में जहाँ गाय को लेकर अक्सर धार्मिक और राजनीतिक विवाद खड़े होते हैं, वहीं मेवात का नज़रिया बहुत अलग रहा है। मेवाती मुसलमान पारंपरिक रूप से बड़ी संख्या में गायें पालते हैं। उनका मानना है कि गाय हमें दूध देती है और हमारा पेट पालती है, इसलिए वे गाय को माता और देवी के रूप में सम्मान देते हैं।

यहाँ बेटियों की शादियों में दहेज के रूप में गाय देने की एक पुरानी और पवित्र परंपरा रही है।दिलचस्प बात यह है कि समय-समय पर खुद मेवाती समुदाय के प्रबुद्ध लोगों ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और गौ-वध पर पूरी तरह पाबंदी लगाने की माँग उठाई है।

खानवा का मैदान और हसन खान मेवाती का अमर बलिदान

इतिहास के पन्नों में मेव मुसलमानों की देशभक्ति और राजपूताना आन-बान-शान के दर्जनों किस्से दर्ज हैं। वरिष्ठ शोधकर्ता और 'मेवात एक खोज' जैसी चर्चित किताबों के लेखक (सेवानिवृत्त इंजीनियर) सिद्दीक अहमद मेव के अनुसार,

                              “मेवाती अपनी रगों में राजपूताना खून महसूस करते हैं।इसकी सबसे बड़ी मिसाल मिलती है 27 मार्च 1527 को हुए खानवा के ऐतिहासिक युद्ध में। जब मुगल आक्रांता बाबर अपनी विशाल सेना लेकर भरतपुर के खानवा गाँव में खड़ा था, तब उसके सामने मेवाड़ के प्रतापी राजा राणा सांगा ढाल बनकर खड़े थे। उस वक्त धर्म से मुस्लिम लेकिन खून और जमीर से राजपूत वीर राजा हसन खान मेवाती ने बाबर के नापाक मंसूबों को रोका था। हसन खान ने अपनी कौम के धर्म से ऊपर उठकर वतन और राणा सांगा का साथ दिया और मैदान-ए-जंग में अपने प्राण न्योछावर कर दिए।"

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'मेवात की बी अम्मा' के नाम से मशहूर महाबी राबिया ने भारत की आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

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स्वतंत्रता संग्राम में भी मेवातियों का योगदान अतुलनीय रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने पर 470मेवातियों को उनके ही गाँवों में फाँसी पर लटका दिया गया था। वहीं, 'मेवात की बी अम्मा' के नाम से मशहूर महाबी राबिया ने भारत की आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

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देश विभाजन के समय भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने को तैयार मेवातियों को गांव घासेड़ा में समझाते महात्मा गांधी

जब बापू पहुँचे थे 'गाँधी ग्राम घासेड़ा'

1947 में देश के विभाजन के समय जब सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और मेवाती मुसलमान असुरक्षित महसूस करके पाकिस्तान जाने की तैयारी करने लगे, तब महात्मा गांधी खुद 19 दिसंबर 1947 को उन्हें रोकने मेवात के 'घासेड़ा' गाँव पहुँचे थे। बापू ने मेवातियों को भारत का 'रीढ़ की हड्डी' बताया और उन्हें देश न छोड़ने का भरोसा दिलाया। आज भी सोहना के रास्ते गुरुग्राम से मेवात जाते समय सड़क किनारे स्थित घासेड़ा गाँव बापू के उस ऐतिहासिक दौरे की याद दिलाता है।

पिछड़ेपन की चुनौती और बदलती हवाएँ

सांस्कृतिक रूप से इतना समृद्ध होने के बावजूद, मेवात आर्थिक और सामाजिक विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट गया। नीति आयोग के अनुसार, देश के 101सबसे पिछड़े जिलों की रैंकिंग में हरियाणा का मेवात (नूंह) मात्र 26प्रतिशत स्कोर के साथ सबसे निचले पायदानों पर रहा है। हालाँकि, हाल के सालों में यहाँ नई पीढ़ी के बीच पढ़ाई-लिखाई का रुझान तेज़ी से बढ़ा है।

लेकिन दूसरी तरफ, राजनीति और सांप्रदायिकता की काली छाया ने इस शांत क्षेत्र को समय-समय पर जख्म दिए हैं। 1992में बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद मेवात का शांतिपूर्ण ताना-बाना प्रभावित हुआ।

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मेवात एक खोज के लेखक सिद्दीक अहमद मेव

लेखिका सबा नकवी और क्षेत्र के वरिष्ठ वकीलों जैसे नूरुद्दीन के अनुसार,

                          “बाबरी घटनाक्रम के बाद स्थानीय राजनीति में बदलाव आया और दशकों से चला आ रहा मिश्रित सांस्कृतिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।“2011-12के दंगे हों या हाल के वर्षों में नूंह में हुई हिंसा,राजनीतिक लाभ के लिए इस क्षेत्र के सौहार्द से खिलवाड़ किया जाता रहा है।"

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मेवातियों के गाय पालने की संस्कृति को इस अन्फोग्राफिक्स से समझ सकते हैं

एक अद्भुत विरासत का संदेश

तमाम आधुनिक बदलावों, वैचारिक दबावों और राजनीतिक खींचतान के बावजूद, मेवात का इतिहास इस बात का जीवंत गवाह है कि धर्म बदलने से न तो किसी की संस्कृति बदलती है और न ही पूर्वजों का खून। मेवात के ये 'सिंह' सरनेम वाले मुसलमान आज भी भारत की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' और साझी विरासत का एक ऐसा अनोखा प्रतीक हैं, जिसे संजोकर रखना पूरे देश की ज़िम्मेदारी है।

( लेखन, संपादन और डिजाइन:मलिक असग़र हाशमी)