मोहम्मद हबीब: जिन्होंने फुटबॉल को ही जीवन बना लिया

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 31-08-2026
Mohammed Habib: Indian football's first true professional, who made the pitch his vocation.
Mohammed Habib: Indian football's first true professional, who made the pitch his vocation.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
“फुटबॉल खेलना ही मेरा काम है।” मोहम्मद हबीब के करियर को समझने के लिए शायद इससे बेहतर कोई परिचय नहीं हो सकता। ऐसे दौर में जब भारतीय फुटबॉल खिलाड़ी क्लब से मामूली सालाना फीस पाने के साथ-साथ सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरी, बैंक या किसी सार्वजनिक उपक्रम में रोजगार तलाशते थे, हबीब ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने नौकरी के तमाम प्रस्तावों को ठुकराया और अपना पूरा जीवन फुटबॉल को समर्पित कर दिया। मैदान ही उनका ऑफिस था और फुटबॉल ही उनका पेशा।

यही वजह है कि भारतीय फुटबॉल के इतिहास में मोहम्मद हबीब को कई लोग देश के पहले सच्चे पेशेवर फुटबॉलर के तौर पर याद करते हैं। 1970 और 1980 के दशक में जब कोलकाता का फुटबॉल मैदान हजारों-लाखों दर्शकों से भर जाता था, तब हबीब उन खिलाड़ियों में थे जिन्होंने इस खेल को सिर्फ मुकाबला नहीं, बल्कि जुनून और संस्कृति बना दिया।
 
हैदराबाद में जन्मे इस खिलाड़ी ने ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और मोहम्मडन स्पोर्टिंग कोलकाता के तीनों बड़े क्लबों के लिए खेला और करीब दो दशकों तक भारतीय फुटबॉल के सबसे बड़े चेहरों में बने रहे। प्रशंसकों ने उन्हें प्यार से ‘बड़े मियां’ कहा। उनकी कहानी में एशियन गेम्स का कांस्य पदक है, भारत की कप्तानी है, अर्जुन अवॉर्ड है, पेले के सामने खेली गई ऐतिहासिक शाम है और ऐसे कई किस्से हैं जो आज भी भारतीय फुटबॉल की लोककथाओं का हिस्सा हैं।
 
 
खिलाड़ी का परिचय

मोहम्मद हबीब का जन्म 17 जुलाई 1949 को हैदराबाद में हुआ था। वह मुख्य रूप से फॉरवर्ड और प्लेमेकर के रूप में खेलते थे। मैदान पर उनकी सबसे बड़ी खासियत सिर्फ गोल करना नहीं थी। वह खेल को समझते थे, साथियों को मौके बनाकर देते थे और जरूरत पड़ने पर खुद निर्णायक गोल भी कर देते थे। भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए उन्होंने करीब एक दशक तक खेला और देश की कप्तानी भी की। वह उस भारतीय टीम का हिस्सा थे जिसने 1970 बैंकॉक एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीता था। इसी दौर में भारतीय फुटबॉल एशिया की मजबूत टीमों को चुनौती देने की क्षमता रखता था। घरेलू फुटबॉल में हबीब का कद और भी बड़ा था। उन्होंने कोलकाता के तीनों बड़े क्लबों के लिए खेलकर एक ऐसी उपलब्धि हासिल की, जो आज भी बेहद खास मानी जाती है। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि क्लबों की प्रतिद्वंद्विता के बावजूद तीनों क्लबों के प्रशंसक उन्हें सम्मान देते थे।
 
हैदराबाद से शुरू हुआ फुटबॉल का सफर

हबीब की कहानी हैदराबाद से शुरू हुई। कम उम्र में ही फुटबॉल के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता गया और उन्होंने City College Old Boys' Club से खेलना शुरू किया। लेकिन उनके करियर का असली मोड़ 1966 में आया। उस समय वह सिर्फ 19 साल के थे, जब उन्होंने आंध्र प्रदेश के लिए संतोष ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन किया। फरवरी 1966 में कोल्लम में खेले गए संतोष ट्रॉफी अभियान में हबीब ने आंध्र प्रदेश को खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। वहां मौजूद ईस्ट बंगाल के अधिकारियों की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने लगभग तुरंत हबीब को अपने साथ जोड़ लिया।
 
कोलकाता पहुंचने के बाद हबीब को ज्यादा समय नहीं लगा यह साबित करने में कि उनमें कुछ अलग है। एक साल के भीतर ही वह इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि जब अगले ट्रांसफर सीजन में मोहन बागान ने उन्हें ईस्ट बंगाल से अपने साथ लेने की कोशिश की, तो IFA कार्यालय के बाहर स्थिति लगभग दंगे जैसी हो गई थी। यह उस समय के फुटबॉल प्रेम और हबीब की लोकप्रियता का अंदाजा देने वाला किस्सा है।
 
 
कोलकाता के तीनों दिग्गज क्लबों के अपने खिलाड़ी

मोहम्मद हबीब की सबसे बड़ी खासियतों में से एक यह रही कि उन्होंने कोलकाता के तीनों बड़े क्लबों की जर्सी पहनी। उन्होंने ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और मोहम्मडन स्पोर्टिंग के लिए खेला। आम तौर पर इन क्लबों की जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता के कारण किसी खिलाड़ी का दूसरे क्लब में जाना प्रशंसकों के लिए भावनात्मक मुद्दा बन जाता था। लेकिन हबीब की प्रतिभा और व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि तीनों क्लबों के समर्थकों के बीच उनका सम्मान बना रहा।
 
ईस्ट बंगाल के साथ उनके शुरुआती दौर ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। बाद में मोहन बागान और मोहम्मडन स्पोर्टिंग में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। हबीब सिर्फ स्ट्राइकर नहीं थे। वह schemer और playmaker भी थे। जिस टीम में खेलते, अक्सर मिडफील्ड से खेल को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले लेते। वह साथियों को मौके बनाकर देते और जब मुकाबला निर्णायक मोड़ पर पहुंचता, तब खुद गोल करने से भी पीछे नहीं हटते। यही कारण था कि उनकी उपलब्धियों में एक ऐसा रिकॉर्ड भी आया जो लंबे समय तक चर्चा में रहा—वह इतिहास के एकमात्र खिलाड़ी रहे जिन्होंने तीन अलग-अलग डूरंड कप फाइनल में अपनी टीम के लिए विजयी गोल किया।
 
देश के लिए यादगार सफर

भारतीय राष्ट्रीय टीम के साथ मोहम्मद हबीब का करियर उस दौर में रहा जिसे भारतीय फुटबॉल का सुनहरा समय माना जाता है। 1970 बैंकॉक एशियन गेम्स में भारत ने कांस्य पदक जीता और हबीब इस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा थे। टूर्नामेंट के शुरुआती मुकाबले में भारत का सामना मेजबान थाईलैंड से हुआ। भारत मैच के पहले आधे घंटे में दो गोल से पीछे हो गया था। ऐसे समय में टीम को संभालने का काम हबीब ने किया। उनके साथियों के अनुसार, उन्होंने ड्रेसिंग रूम और मैदान पर खिलाड़ियों को साफ संदेश दिया कि अगर वे बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकते तो उन्हें मैदान पर आखिरी दम तक लड़ना होगा।
 
भारत ने शानदार वापसी करते हुए थाईलैंड के खिलाफ मुकाबला 2-2 से ड्रॉ कराया। हबीब के लिए यह सिर्फ एक मैच नहीं था। यह उनके व्यक्तित्व की झलक थी वह मैदान पर केवल खुद नहीं लड़ते थे, बल्कि पूरी टीम में लड़ने का जज्बा पैदा करते थे। भारत ने उस एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीता और हबीब भारतीय फुटबॉल के उस ऐतिहासिक अभियान के महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में रहे।
उन्होंने 1972 के प्री-ओलंपिक अभियान में भी भारत का नेतृत्व किया। राष्ट्रीय टीम के साथ उनके प्रदर्शन ने उन्हें उस दौर के सबसे भरोसेमंद भारतीय खिलाड़ियों में स्थापित किया।
 
 
1977: जब सामने थे पेले

मोहम्मद हबीब की जिंदगी का शायद सबसे मशहूर किस्सा 1977 का है। उस समय मोहन बागान ने ब्राजील के महान फुटबॉलर पेले की टीम Cosmos के खिलाफ ईडन गार्डन्स में एक प्रदर्शनी मैच खेला। पेले को देखने और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने की खिलाड़ियों में जबरदस्त उत्सुकता थी। मोहन बागान के कई खिलाड़ी ब्राजील के इस महान खिलाड़ी के साथ फोटो खिंचवाने का मौका तलाश रहे थे। लेकिन हबीब अलग थे। उन्होंने अपने साथियों से कथित तौर पर कहा कि मैच पर ध्यान दो। पेले महान हैं, लेकिन वह भी हमारी तरह फुटबॉल खेलते हैं और यहां हमारे खिलाफ फुटबॉल मैच खेलने आए हैं।
 
यह बात हबीब के व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है। जहां बाकी खिलाड़ी महान पेले की मौजूदगी से रोमांचित थे, वहीं हबीब उनके सामने खुद को साबित करने के लिए तैयार थे। और फिर मैदान पर उन्होंने वही किया। मोहन बागान और Cosmos के बीच मुकाबला 2-2 से ड्रॉ रहा और हबीब ने ऐसा शानदार प्रदर्शन किया कि मैच के बाद खुद पेले ने उनकी तारीफ की। भारतीय फुटबॉल के लिए यह एक बेहद यादगार क्षण था एक भारतीय खिलाड़ी ने दुनिया के महानतम फुटबॉल सितारों में से एक के सामने बिना किसी संकोच के अपना खेल दिखाया।
 
भारतीय फुटबॉल के ‘पहले सच्चे प्रोफेशनल’

मोहम्मद हबीब का करियर सिर्फ उनकी फुटबॉल प्रतिभा के कारण खास नहीं था। उनकी सबसे अलग पहचान उनके प्रोफेशनल रवैये से बनी। उनके समय में भारतीय क्लब खिलाड़ियों को बहुत बड़ी रकम नहीं देते थे। क्लब अक्सर खिलाड़ियों को सरकारी विभागों, राष्ट्रीयकृत बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नौकरी दिलाने के लिए अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते थे। इससे खिलाड़ी को फुटबॉल के साथ भविष्य की आर्थिक सुरक्षा मिल जाती थी। लेकिन हबीब ने यह रास्ता नहीं चुना। उन्होंने नौकरी के प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए।
 
उनका मानना था कि अगर फुटबॉल ही उनका काम है, तो उन्हें उसी पर पूरा ध्यान देना चाहिए। किसी दूसरी नौकरी को वह अपने खेल में बाधा मानते थे। इसलिए उन्होंने अपने पूरे खेल करियर के दौरान फुटबॉल को ही अपना पेशा बनाए रखा। यही वजह है कि उन्हें भारतीय फुटबॉल का “first true professional” कहा गया। वह सिर्फ पेशेवर शब्द का इस्तेमाल नहीं करते थे, बल्कि उन्होंने उसे अपने जीवन में उतारा था।
 
 
घरेलू फुटबॉल में उपलब्धियों का सिलसिला

हबीब ने घरेलू फुटबॉल में भी कई ऐसी उपलब्धियां हासिल कीं जिन्हें आज तक याद किया जाता है। वह तीन डूरंड कप फाइनल में विजयी गोल करने वाले इतिहास के एकमात्र खिलाड़ी हैं। यह उपलब्धि उनके निर्णायक मैचों के खिलाड़ी होने को साबित करती है। वह संतोष ट्रॉफी में भी चमके। 1969-70 में बंगाल की खिताबी टीम का हिस्सा रहते हुए उन्होंने 11 गोल किए और टूर्नामेंट के शीर्ष स्कोरर बने। क्लब स्तर पर उन्होंने IFA Shield, Durand Cup, Federation Cup और अन्य प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में खिताब जीते। लेकिन उनके खेल की सबसे बड़ी खूबी आंकड़ों से परे थी। वह सिर्फ स्कोरशीट पर नाम दर्ज कराने वाले खिलाड़ी नहीं थे। वह पूरे खेल की दिशा बदलने की क्षमता रखते थे।
 
जब उनकी टीम दबाव में होती, तो वह गेंद अपने पास रखते। जब टीम को गोल चाहिए होता, तो आगे बढ़ते। और जब साथी खिलाड़ी बेहतर स्थिति में होता, तो खुद गोल करने की बजाय उसे मौका देते। यही उन्हें एक संपूर्ण फुटबॉलर बनाता था।
 
अर्जुन अवॉर्ड: शानदार करियर की राष्ट्रीय मान्यता

करीब डेढ़ दशक तक भारतीय फुटबॉल में लगातार योगदान देने के बाद हबीब को 1980-81 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह उनके खिलाड़ी जीवन की सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धियों में से एक थी। अर्जुन अवॉर्ड ने उस करियर को आधिकारिक सम्मान दिया जिसने भारतीय फुटबॉल के सबसे लोकप्रिय दौर में अपनी मजबूत छाप छोड़ी थी। उनका सम्मान सिर्फ गोलों या ट्रॉफियों के लिए नहीं था। यह उनके राष्ट्रीय टीम में योगदान, नेतृत्व, तकनीकी क्षमता और लंबे समय तक उच्च स्तर पर प्रदर्शन की मान्यता था। हबीब उस पीढ़ी का हिस्सा थे जिसमें पी.के. बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, सैयद नईमुद्दीन और कई अन्य दिग्गज भारतीय फुटबॉल को एशियाई मंच पर पहचान दिला रहे थे।
 
फुटबॉल के बाद भी खेल से रिश्ता नहीं टूटा

फुटबॉल से संन्यास लेने के बाद हबीब ने खेल से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने अपने अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का फैसला किया। उन्होंने टाटा फुटबॉल अकादमी में कोच के रूप में काम किया और वहां करीब एक दशक से ज्यादा समय बिताया। दिलचस्प बात यह है कि यही उनके जीवन का एकमात्र ऐसा दौर था जब उन्होंने नियमित रूप से कोई पूर्णकालिक नौकरी की। एक खिलाड़ी जिसने अपने पूरे करियर में फुटबॉल को ही नौकरी माना था, संन्यास के बाद भी उसी खेल को नई पीढ़ी को सिखाने में जुट गया। इस तरह उनका योगदान खिलाड़ी के रूप में खत्म नहीं हुआ। वह कोच और मार्गदर्शक के रूप में भी फुटबॉल से जुड़े रहे।
 
अर्जुन अवॉर्ड के बाद सम्मान

मोहम्मद हबीब की लोकप्रियता सिर्फ उनके सक्रिय करियर तक सीमित नहीं रही। ईस्ट बंगाल ने 2015 में उन्हें ‘भारत गौरव’ सम्मान से नवाजा। वहीं पश्चिम बंगाल सरकार ने 2018 में उन्हें ‘बंग विभूषण’ से सम्मानित किया। इन सम्मानों ने यह साबित किया कि दशकों पहले मैदान पर बनाई गई उनकी पहचान समय के साथ धुंधली नहीं हुई। उनका नाम आज भी भारतीय फुटबॉल के उस दौर से जुड़ा है जब स्टेडियमों में भीड़ उमड़ती थी और क्लब फुटबॉल खिलाड़ियों को किसी फिल्म स्टार जैसी लोकप्रियता मिलती थी।
 
जिंदगी का कठिन आखिरी दौर

लेकिन जिस खिलाड़ी ने अपने जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा फुटबॉल को दिया, उसके जीवन का आखिरी दौर उतना आसान नहीं रहा। बाद के वर्षों में हबीब हैदराबाद में रहने लगे। उम्र बढ़ने के साथ उनकी सेहत बिगड़ती गई। उन्हें डिमेंशिया और पार्किंसन जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। एक समय मैदान पर बेहद तेज, चुस्त और विपक्षी डिफेंडरों के लिए खौफ बने रहने वाले हबीब के लिए जीवन इतना बदल गया कि वह कई बार परिचित चेहरों को भी पहचान नहीं पाते थे। उनके छोटे भाई मोहम्मद अकबर भी पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर रहे और उन्होंने भी कोलकाता के तीनों बड़े क्लबों के लिए खेला। अकबर चार बार Calcutta Football League के शीर्ष स्कोरर रहे। लेकिन अपने भाई से अलग उन्होंने केंद्र सरकार की नौकरी की और बाद में पेंशन का लाभ मिला।
 
हबीब ने ऐसी कोई नौकरी नहीं की थी।
 
उनके पूरे खेल जीवन में फुटबॉल ही उनका पेशा रहा। यही फैसला उन्हें एक सच्चा प्रोफेशनल बनाता है, लेकिन बाद के वर्षों में इसका एक दूसरा पहलू भी सामने आया—उनके पास किसी सरकारी नौकरी की पेंशन या ऐसी नौकरी से मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा नहीं थी। हालांकि, उनके बच्चे जीवन में अच्छी तरह स्थापित हुए और उनके परिवार की मदद से उन्हें आर्थिक परेशानी नहीं रही।
 
2023 में हुआ निधन

भारतीय फुटबॉल के इस महान खिलाड़ी का 15 अगस्त 2023 को 74 वर्ष की उम्र में हैदराबाद में निधन हो गया। उनके निधन पर भारतीय फुटबॉल जगत ने एक ऐसे खिलाड़ी को याद किया जिसने अपने दौर को परिभाषित किया था। AIFF ने भी उन्हें पूर्व भारतीय कप्तान और देश के महान फुटबॉलरों में से एक के रूप में श्रद्धांजलि दी। Mउनकी मौत के साथ भारतीय फुटबॉल ने उस पीढ़ी के एक और महत्वपूर्ण अध्याय को खो दिया, जिसने स्टेडियमों को जुनून से भर दिया था।
 

 
 
मोहम्मद हबीब की विरासत

मोहम्मद हबीब की कहानी को सिर्फ एक अर्जुन अवॉर्डी फुटबॉलर की कहानी कहना उनके साथ न्याय नहीं होगा। वह ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने भारत की कप्तानी की, एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीता, संतोष ट्रॉफी में गोलों की बारिश की, तीनों बड़े कोलकाता क्लबों के लिए खेला, तीन डूरंड कप फाइनल में विजयी गोल किए और पेले जैसे महान खिलाड़ी के सामने अपनी प्रतिभा साबित की।
लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत उनकी सोच थी। जब उनके दौर में खिलाड़ी सुरक्षित भविष्य के लिए सरकारी नौकरी तलाशते थे, हबीब ने कहा कि फुटबॉल ही उनका काम है। उन्होंने अपनी जिंदगी उसी फैसले के अनुसार जी।
 
इसलिए मोहम्मद हबीब को याद करना सिर्फ पुराने भारतीय फुटबॉल के एक महान स्ट्राइकर को याद करना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है जब खेल के लिए जुनून इतना गहरा था कि एक खिलाड़ी ने अपना पूरा जीवन एक ही पेशे के नाम कर दिया। हैदराबाद का वह लड़का, जिसने 19 साल की उम्र में संतोष ट्रॉफी से शुरुआत की, कोलकाता के तीनों दिग्गज क्लबों का सितारा बना, भारत की कप्तानी की, एशियन गेम्स का पदक जीता, पेले से प्रशंसा पाई और अर्जुन अवॉर्ड हासिल किया मोहम्मद हबीब भारतीय फुटबॉल के सिर्फ ‘बड़े मियां’ नहीं थे, वह उस खेल के सच्चे प्रोफेशनल थे जिसे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी।