ग़ौस सिवानी
अल्लामा मुहम्मद इक़बाल उपमहाद्वीप के उन महान विचारकों और कवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने धर्म, संस्कृति, मानवता और आध्यात्मिकता को व्यापक दृष्टि से देखा। यद्यपि इक़बाल एक सच्चे मुसलमान और इस्लामी पुनर्जागरण के समर्थक थे, लेकिन उन्होंने दूसरे धर्मों की महान हस्तियों और उनके विचारों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा।
उनके विचार और शिक्षाएँ उन्हें अच्छी लगीं तो उन्होंने उनकी प्रशंसा भी की। जिन हिंदू व्यक्तित्वों का इक़बाल ने सम्मान के साथ उल्लेख किया है, उनमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भी शामिल हैं, जिनके नाम और कार्यों से भारत का बच्चा-बच्चा परिचित है और जिनकी कथाएँ दुनिया के अनेक देशों में प्रसिद्ध हैं। इक़बाल ने भगवान राम को बड़े सम्मान और श्रद्धा के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की है।
भगवान राम कौन हैं?
भगवान राम की कथा भारत में सदियों से सुनाई जाती रही है। लोग इसे एक-दूसरे को सुनाते आए हैं और बच्चे इसे अपने बड़ों से सुनते आए हैं। इस कथा का मूल स्रोत रामायण है, जिसका फ़ारसी भाषा में अनुवाद मुग़ल काल में हुआ था।
रामायण के अनुसार श्रीरामचंद्र जी अयोध्या के राजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम का विवाह सीता नाम की एक सद्गुणी स्त्री से हुआ था। अपने पिता के बाद राम जी को राजगद्दी पर बैठना था, लेकिन उनकी सौतेली माता ने उन्हें वनवास भेज दिया और अपने पुत्र भरत को राजा बना दिया।
राम जी के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण और उनकी पत्नी सीता भी वनवास गए। वन में रहते समय लंका के राजा रावण ने सीता का अपहरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया। राम जी ने हनुमान की सेना की सहायता से सीता को मुक्त कराया और चौदह वर्ष वन में बिताने के बाद अयोध्या लौट आए। इस दौरान भरत ने राम जी की खड़ाऊँ को राजगद्दी पर रखकर राज्य चलाया।
राम जी की पूरी कथा में उनकी वीरता, मानवता और माता-पिता की आज्ञापालन की भावना साफ़ दिखाई देती है। यही कारण है कि सदियों से यह कथा भारत के हर बच्चे की ज़ुबान पर है और हर वर्ष दशहरा के अवसर पर इसे रामलीला के रूप में मंचित किया जाता है। राम की कथा दुनिया के अनेक देशों में प्रसिद्ध है, जिनमें इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड आदि शामिल हैं।
इक़बाल के लिए "राम" एक वास्तविक पात्र
रामायण की कथा की ऐतिहासिक सच्चाई क्या है? इस विषय पर इतिहासकारों ने बहुत चर्चा की है और इस कथा तथा इसके पात्रों को पौराणिक माना है, लेकिन इक़बाल ने राम को एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व माना है। उन्होंने राम की प्रशंसा केवल अपनी शायरी में ही नहीं, बल्कि गद्य में भी की है।
यह उद्धरण देखिए: "जिस अरूस-ए-मआनी को श्री कृष्ण, श्री राम और रामानुज बेनक़ाब करना चाहते थे, श्री शंकर के मंतिक़ी तिलिस्म ने उसे महजूब कर दिया और श्री कृष्ण की क़ौम उनकी तज्दीद के समर से महरूम रह गई।"(दीबाचा अस्रार-ए-ख़ुदी)
इस कथन को पढ़कर क्या ऐसा नहीं लगता कि इक़बाल श्रीकृष्ण और श्रीराम को कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि वास्तविक और ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानते हैं। इस कथन में इक़बाल ने हिंदू दर्शन की दो अलग-अलग प्रवृत्तियों का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
उनके अनुसार श्रीकृष्ण, श्रीराम और रामानुज की शिक्षाएँ जीवन, नैतिकता, कर्म और ईश्वर से हृदय के संबंध पर आधारित थीं। ये महान व्यक्तित्व मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, प्रेम, त्याग और ईश्वर से संबंध की शिक्षा देते थे। इक़बाल ने इन शिक्षाओं को "अरूस-ए-मआनी" कहा है, अर्थात ऐसी शाश्वत सच्चाई जो मनुष्य के जीवन को अर्थ देती है।
इक़बाल की नज़्म "राम"
इक़बाल ने अपनी गद्य रचनाओं से स्पष्ट कर दिया है कि वे राम और कृष्ण को काल्पनिक नहीं, बल्कि वास्तविक मानते थे। स्पष्ट है कि कोई काल्पनिक पात्र "इमाम-ए-हिंद" का स्थान प्राप्त नहीं कर सकता, जो इक़बाल ने राम जी को दिया है।
उनकी प्रसिद्ध नज़्म "राम", जो उनके काव्य-संग्रह "बांग-ए-दरा" में शामिल है, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे राम को केवल हिंदुओं के धार्मिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और नैतिक परंपरा के एक महान व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। इक़बाल अपनी नज़्म की शुरुआत इन शब्दों से करते हैं:
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद
सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद
इक़बाल कहते हैं कि भारत की संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा सत्य, ज्ञान और आध्यात्मिक विवेक से इतनी समृद्ध है, जैसे कोई प्याला उत्तम मदिरा से भरा हुआ हो। इस आध्यात्मिक धरोहर का एक महान प्रतीक भगवान राम हैं, जिनका व्यक्तित्व नैतिकता, सत्य, त्याग और आध्यात्मिक महानता का प्रतिनिधित्व करता है।
दूसरे मिसरे में इक़बाल कहते हैं कि पश्चिम के सभी दार्शनिक भी भारत के राम के सामने मानो शिष्य दिखाई देते हैं। इसका उद्देश्य राम की नैतिक और आध्यात्मिक महानता को उजागर करना है। इक़बाल के अनुसार राम का व्यक्तित्व केवल दार्शनिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे व्यावहारिक जीवन, नैतिकता और मानवता के मार्गदर्शक हैं।
इसी नज़्म में वे कहते हैं:
है राम के वजूद पे हिंदोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद।"
यह शेर उर्दू शायरी में भगवान राम के बारे में कहे गए सबसे ऊँचे शेरों में गिना जाता है। इक़बाल ने राम को "इमाम-ए-हिंद" कहा है। यहाँ "इमाम" शब्द धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, नेता और राष्ट्र की नैतिक अगुवाई करने वाले व्यक्तित्व के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इक़बाल के अनुसार राम भारतीय संस्कृति के ऐसे महान व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने चरित्र और नैतिकता से समाज का मार्गदर्शन किया।
आगे इक़बाल कहते हैं:
ऐजाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही
रोशन तर अज़ सहर है ज़माने में शाम-ए-हिंद
इस शेर में इक़बाल ने राम को "चराग़-ए-हिदायत" कहा है। इसका अर्थ यह है कि इक़बाल स्वीकार करते हैं कि राम की शिक्षाओं और उनके चरित्र ने भारत के नैतिक और आध्यात्मिक जीवन को प्रकाश दिया। इक़बाल के अनुसार महान मनुष्य वही होता है जो अपने चरित्र से समाज में प्रकाश फैलाए।
नज़्म का आख़िरी शेर है:
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश-ए-मुहब्बत में फ़र्द था
इस शेर में इक़बाल भगवान राम की शारीरिक वीरता और आध्यात्मिक महानता, दोनों को एक साथ प्रस्तुत करते हैं।पहले मिसरे में इक़बाल कहते हैं कि राम तलवार चलाने में निपुण, बहादुर और बेमिसाल योद्धा थे। "तलवार का धनी" का अर्थ केवल यह नहीं है कि वे एक सैनिक थे, बल्कि इससे उनकी बहादुरी, दृढ़ निश्चय, नेतृत्व और सत्य के लिए संघर्ष करने की क्षमता का भी पता चलता है। "शुजाअत में फ़र्द था" का मतलब है कि वे साहस और वीरता में अपने जैसा कोई नहीं रखते थे।
दूसरे मिसरे में इक़बाल राम के आंतरिक और नैतिक चरित्र को सामने लाते हैं। "पाकीज़गी" से मतलब ऊँचा चरित्र, सच्चाई, ईमानदारी और नैतिक पवित्रता है, जबकि "जोश-ए-मुहब्बत" का अर्थ लोगों के प्रति प्रेम, सहानुभूति, त्याग और निष्ठा है। इक़बाल के अनुसार राम की महानता केवल उनकी युद्ध-कला में नहीं थी, बल्कि उनके पवित्र चरित्र और प्रेम से भरे हृदय में भी थी। इसलिए वे इन गुणों में भी उन्हें "फ़र्द", यानी बेमिसाल, कहते हैं।
पूरी नज़्म इस प्रकार है:
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद
सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद
यह हिंदियों की फ़िक्र-ए-फ़लक-रस का है असर
रिफ़अत में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए-हिंद
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
है राम के वजूद पे हिंदोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद
ऐजाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही
रोशन तर अज़ सहर है ज़माना में शाम-ए-हिंद
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश-ए-मुहब्बत में फ़र्द था
इक़बाल की नज़र में राम का व्यक्तित्व
इक़बाल राम को केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व नहीं मानते, बल्कि उन्हें सत्य, त्याग, न्याय, निष्ठा, धैर्य और उच्च नैतिकता का प्रतीक मानते हैं। राम के जीवन में पिता की आज्ञा का पालन, वचन निभाना, न्याय करना और जनता की सेवा जैसे गुण स्पष्ट दिखाई देते हैं। इक़बाल के अनुसार यही गुण किसी भी महान व्यक्ति की पहचान होते हैं।
इक़बाल की शायरी में ख़ुदी का विचार बहुत महत्वपूर्ण है। ख़ुदी का अर्थ केवल अपने बारे में सोचना नहीं है, बल्कि ऊँचे नैतिक मूल्य, मज़बूत चरित्र, त्याग, आत्मसंयम और सत्य पर अडिग रहना है। राम का जीवन इन सभी गुणों का जीवंत उदाहरण है, इसलिए इक़बाल उनका सम्मान करते हैं।
यह नज़्म धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक सद्भाव और आपसी सम्मान का एक सुंदर उदाहरण है।इक़बाल की नज़्म "राम" उनकी उदार सोच, बौद्धिक ईमानदारी और मानवता-प्रेम का उज्ज्वल उदाहरण है। उन्होंने भगवान राम को भारत की एक महान नैतिक और सांस्कृतिक विभूति के रूप में श्रद्धांजलि दी और उन्हें "इमाम-ए-हिंद" की उपाधि दी। इक़बाल की नज़र में किसी व्यक्ति की महानता उसके धर्म से अधिक उसके चरित्र, नैतिकता और मानव सेवा में निहित होती है।