मेवात की माटी का मान: गफरुद्दीन जोगी मेवाती और भपंग की गूंज अब पद्मश्री के आंगन में

Story by  यूनुस अल्वी | Published by  [email protected] | Date 28-01-2026
Honoring the soil of Mewat: Ghaffaruddin Jogi Mewati and the resonance of the Bhapang instrument now reach the hallowed grounds of the Padma Shri awards.
Honoring the soil of Mewat: Ghaffaruddin Jogi Mewati and the resonance of the Bhapang instrument now reach the hallowed grounds of the Padma Shri awards.

 

यूनुस अलवी/नूंह( हरियाणा)/अलवर ( राजस्थान)

‘‘यह खुशी वैसी है, जैसे कोई मजदूर सुबह मेहनत करने जाए और शाम को उसे उसकी मजदूरी मिल जाए।’’ ये शब्द उस कलाकार के हैं, जिसने आधी सदी से ज्यादा समय तक मेवात की ऊबड़-खाबड़ गलियों से लेकर सात समंदर पार तक अपनी कला का डंका बजाया। जैसे ही भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान की घोषणा हुई, अलवर की टाइगर कॉलोनी में रहने वाले 68 वर्षीय गफरुद्दीन जोगी मेवाती का गला भर आया। उनकी आँखों में वे सारे मंज़र तैर गए, जब वे नंगे पांव मेवात के गांवों में भपंग बजाकर आटा माँगा करते थे। आज उनकी वही 'मजदूरी' भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' के रूप में उनके सामने थी। यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी मेवाती संस्कृति, जोगी समाज की विरासत और उस 'भपंग' की थाप का सम्मान है, जो आधुनिकता के शोर में कहीं खो जाने के डर से सहमी हुई थी।

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एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होते गफरुद्दीन जोगी मेवाती

गफरुद्दीन जोगी मेवाती का व्यक्तित्व और उनका संगीत भारत की साझा संस्कृति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे आज की दुनिया 'सिंक्रीटिज्म' (Syncretism) कहती है। मेवात क्षेत्र, जो हरियाणा और राजस्थान की सीमाओं को जोड़ता है, अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है।

यहाँ का जोगी समाज मुस्लिम धर्म का पालन करते हुए भी पीढ़ियों से महाभारत के प्रसंगों और लोक कथाओं का गायन करता आ रहा है। गफरुद्दीन इस परंपरा के सबसे मज़बूत स्तंभ हैं। वे कहते हैं, "अपनी भाषा, संस्कृति और लोक कला से जुड़कर रहो, यही हमारी असली पहचान है।" उनके लिए यह सम्मान मेवात की उस मिट्टी का कर्ज़ है, जिसने उन्हें संघर्ष के दिनों में पाल-पोसकर बड़ा किया।

राजस्थान के डीग जिले के कैथवाड़ा गाँव में जन्मे गफरुद्दीन का बचपन किसी फ़िल्मी संघर्ष से कम नहीं था। उनके पिता, स्वर्गीय बुध सिंह जोगी, स्वयं एक सिद्ध कलाकार थे। मात्र चार साल की कोमल आयु में, जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, गफरुद्दीन के हाथों में 'भपंग' थमा दिया गया था।

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भपंग, जो देखने में एक छोटे डमरू जैसा लगता है लेकिन जिसमें एक तार लगा होता है, भगवान शिव के डमरू का ही एक विकसित रूप माना जाता है। इसे बजाना कोई साधारण कला नहीं है; इसमें पेट की मांसपेशियों, हाथ की उंगलियों और गले की लय का अद्भुत समन्वय चाहिए होता है।

बचपन में पिता के साथ गाँव-गाँव घूमना, चौपालों पर बैठना और लोक गाथाएं सुनाना ही उनकी पाठशाला थी। आर्थिक तंगी ऐसी थी कि उन्हें घर चलाने के लिए गाँव-गाँव जाकर अनाज और आटा माँगना पड़ता था। वे दिन मुश्किल थे, लेकिन भपंग की थाप ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया।

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प्रधानतंत्री नरेंद्र मोदी और लोक कलाकारों के ग्रुप मंें शामिल गफरुद्दीन जोगी मेवाती

गफरुद्दीन जोगी की कला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है महाभारत का गायन है। आश्चर्य की बात यह है कि एक मुस्लिम कलाकार, भगवान कृष्ण और पांडवों की गाथा को इतनी तन्मयता और शुद्धता के साथ गाता है कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाए। अलवर और आसपास के क्षेत्रों को ऐतिहासिक रूप से 'विराटनगर' से जोड़ा जाता है, जहाँ पांडवों ने अपना अज्ञातवास बिताया था। गफरुद्दीन इन लोक कथाओं को जब मेवाती लहजे में सुनाते हैं, तो इतिहास जीवंत हो उठता है। उनकी कला ने यह साबित किया कि संगीत और संस्कृति की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।

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उनकी यात्रा कैथवाड़ा की गलियों से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक कैसे पहुँची, यह भी एक प्रेरणादायक कहानी है। साल 1992 उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ था। पहली बार उन्हें विदेश जाने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और दुबई समेत 60 से अधिक देशों में उन्होंने भपंग की गूंज पहुंचाई। लंदन में महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में जब उन्होंने मेवाती लोक धुनें छेड़ीं, तो विदेशी श्रोता भी उस जादुई लय पर झूमने लगे। उन्होंने मेवात की लोक कला को केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बना दिया।

गफरुद्दीन जोगी मेवाती का योगदान केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। वे लोक संस्कृति के एक 'जीवित पुस्तकालय' (Living Library) हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में 3000 से अधिक लोक गीतों, दोहों और कहानियों को कंठस्थ किया और उन्हें संरक्षित किया है।

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fआज जब लोक संगीत पर बॉलीवुड का रंग चढ़ रहा है, तब गफरुद्दीन ने अपनी कला की मौलिकता को बचाए रखा। उन्होंने सामाजिक सरोकारों से भी अपनी कला को जोड़ा। कोरोना काल में जब लोग डरे हुए थे, तब उन्होंने अपने गीतों के जरिए जागरूकता फैलाई। स्वच्छता अभियान हो या साक्षरता की बात, उनके भपंग की थाप ने हमेशा समाज को जोड़ने का काम किया।

गृह मंत्रालय से जब उन्हें पद्मश्री की सूचना मिली, तब वे अलवर के सूचना केंद्र में ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में व्यस्त थे। वहां भी वे अपनी साधना में लीन थे। फोन आने पर पहले तो उन्हें लगा कि कोई उनके साथ मज़ाक कर रहा है, लेकिन जब खबर की पुष्टि हुई, तो वे भावुक हो गए। उनकी यह सादगी ही उन्हें बड़ा बनाती है। वे इस सम्मान का श्रेय अपनी पूरी मेवात भूमि और जोगी समाज को देते हैं।

उनके परिवार में आज आठवीं पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ा रही है। उनके बेटे, डॉ. शाहरुख खान मेवाती जोगी ने केवल संगीत ही नहीं सीखा, बल्कि मेवात की संस्कृति पर पीएचडी भी की है। यह देखना सुखद है कि जहाँ कई पारंपरिक कलाएं दम तोड़ रही हैं, वहीं गफरुद्दीन का परिवार इस मशाल को जलाए हुए है।

आज गफरुद्दीन जोगी मेवाती का एक ही सपना है,लोक कलाओं के लिए एक समर्पित स्कूल खोलना। वे चाहते हैं कि सरकार उन्हें ज़मीन उपलब्ध कराए जहाँ वे नई पीढ़ी को भपंग वादन, मेवाती लोक गायन और अपनी पारंपरिक कहानियों की शिक्षा दे सकें।

उनका कहना है कि यदि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से नहीं जुड़ी, तो यह पहचान मिट जाएगी। पद्मश्री मिलना उनके लिए मंज़िल नहीं, बल्कि उस यात्रा की नई शुरुआत है जिसे वे मरते दम तक जारी रखना चाहते हैं।

मेवात की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों से निकलकर राष्ट्रपति भवन के भव्य दरबार तक पहुँचने वाला यह सफ़र दुनिया को बताता है कि 'साधना' कभी व्यर्थ नहीं जाती।

गफरुद्दीन जोगी मेवाती आज केवल एक पद्मश्री विजेता नहीं हैं, वे मेवात के गौरव हैं, लोक संस्कृति के रक्षक हैं और उन लाखों कलाकारों के लिए उम्मीद की किरण हैं जो अपनी जड़ों को सींच रहे हैं। उनका संदेश स्पष्ट है-मेहनत करो, अपनी संस्कृति पर गर्व करो और मजदूरी (फल) की चिंता  मत करो, वह एक दिन ज़रूर मिलेगी।