मैसेंजर ऑफ रिलीजियस हार्मनी एंड डिवाइन लव : प्रेमानंद महाराज संत, फकीर या धार्मिक सद्भाव के संदेशवाहक?

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 30-08-2026
Messenger of Religious Harmony and Divine Love: Premanand Maharaj—Saint, Fakir, or Messenger of Religious Harmony?
Messenger of Religious Harmony and Divine Love: Premanand Maharaj—Saint, Fakir, or Messenger of Religious Harmony?

 

मलिक असगर हाशमी

प्रेमानंद महाराज आखिर हैं क्या? संत, फकीर, दरवेश, फरिश्ता, फिलॉसफर या इन सबसे अलग कोई ऐसी आध्यात्मिक शख्सियत, जिसे किसी एक पहचान में बांधना मुश्किल है? वृंदावन के प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज को लेकर यह सवाल अक्सर उठता है। इसकी वजह उनके प्रवचन ही नहीं, बल्कि अलग अलग धर्मों के लोगों के साथ उनके संवाद और व्यवहार भी हैं। उनके अनुयायियों में हिंदू समाज के साथ मुस्लिम और दूसरे समुदायों के लोग भी दिखाई देते हैं। यही वजह है कि प्रेमानंद महाराज को आज केवल एक धार्मिक संत के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक सद्भाव, आध्यात्मिक प्रेम और मानवीय एकता की चर्चा के केंद्र में भी देखा जा रहा है।
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इसी पहलू को समझने की कोशिश नई पुस्तक ‘प्रेमानंद महाराज: मैसेंजर ऑफ रिलीजियस हार्मनी एंड डिवाइन लव’ में की गई है। पुस्तक के लेखक आनंद मिश्रा और रेश्मा मुखर्जी हैं। पुस्तक प्रेमानंद महाराज के व्यक्तित्व, उनके विचारों और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति उनके दृष्टिकोण को सामने रखने का प्रयास करती है।

आनंद मिश्रा बिहार के गया जी से आते हैं। गया जी हिंदू और बौद्ध दोनों धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भगवान विष्णु से जुड़ी मान्यताओं के साथ यह स्थान भगवान गौतम बुद्ध की ज्ञान यात्रा से भी जुड़ा रहा है। ऐसे सांस्कृतिक परिवेश से आने वाले लेखक का प्रेमानंद महाराज के धार्मिक सद्भाव पर लिखना पुस्तक को एक अलग संदर्भ देता है।

पुस्तक का मूल सवाल भी काफी महत्वपूर्ण है। क्या धर्म का अर्थ केवल अपनी परंपरा को मानना है या दूसरे धर्मों की आस्था का सम्मान करना भी धार्मिक जीवन का हिस्सा है? प्रेमानंद महाराज के बारे में पुस्तक में प्रस्तुत विचार इसी सवाल के आसपास घूमते हैं।

इसमें कहा गया है कि धर्म अलग हो सकते हैं। पूजा और उपासना के तरीके अलग हो सकते हैं। भाषा और धार्मिक प्रतीक भी अलग हो सकते हैं। लेकिन ईश्वर की तलाश, प्रेम, करुणा, भक्ति और आत्मिक शांति की इच्छा मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ती है।

यह विचार भारतीय संत परंपरा में नया नहीं है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने भी अलग अलग धार्मिक मार्गों को एक ही परम सत्य की ओर जाने वाले रास्तों के रूप में देखा था। इसी तरह दलाई लामा लंबे समय से अंतरधार्मिक संवाद और विभिन्न आस्थाओं के बीच सम्मान की वकालत करते रहे हैं।

पुस्तक में दलाई लामा के विभिन्न धार्मिक स्थलों की यात्राओं का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि आध्यात्मिकता को किसी एक सीमा में कैद नहीं किया जा सकता। मस्जिद, मंदिर, चर्च, यहूदी धार्मिक स्थल और दूसरे पवित्र स्थानों के प्रति सम्मान धार्मिक विविधता की समझ को मजबूत करता है।

प्रेमानंद महाराज के संदर्भ में पुस्तक इसी परंपरा को आगे बढ़ते हुए देखती है। वृंदावन में उनके प्रवचन सुनने के लिए अलग अलग पृष्ठभूमि के लोग पहुंचते हैं। उनके आश्रम से जुड़े वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री ने भी उनकी लोकप्रियता को व्यापक बनाया है। उनके समर्थकों का मानना है कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे धर्म को विवाद का विषय बनाने के बजाय भक्ति और आत्मिक अनुशासन की बात करते हैं।
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प्रेमानंद महाराज को लेकर सबसे अधिक चर्चा उनके मुस्लिम समाज के प्रति दृष्टिकोण को लेकर भी होती है। पुस्तक में उनके ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया गया है, जिनमें उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने वाले लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

वह सूफी संतों के प्रति भी प्रशंसा का भाव रखते हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो में उन्हें ख्वाजा गरीब नवाज और हजरत निजामुद्दीन औलिया जैसे सूफी संतों का उल्लेख करते हुए देखा गया है। अमीर खुसरो को लेकर भी उनके सकारात्मक विचारों का उल्लेख सामने आता रहा है।

इन प्रसंगों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत की धार्मिक परंपरा केवल अलग अलग समुदायों का इतिहास नहीं है। यहां भक्ति और सूफी परंपराओं ने सदियों तक एक दूसरे को प्रभावित किया है।

कबीर, गुरु नानक, बुल्ले शाह, निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो जैसे नाम इस साझा आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाते हैं। ऐसे में प्रेमानंद महाराज द्वारा सूफी संतों का सम्मान करना उनके अनुयायियों और दूसरे समुदायों के लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बनता है।

प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता को समझने के लिए सोशल मीडिया की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके प्रवचन के छोटे छोटे वीडियो तेजी से प्रसारित होते हैं। इनमें धर्म, परिवार, कर्म, आत्मसंयम, प्रेम और जीवन की परेशानियों से जुड़े सवालों पर उनकी बातें शामिल रहती हैं। इसी माध्यम से ऐसे लोग भी उनके विचारों से परिचित हुए हैं, जो नियमित रूप से किसी धार्मिक आश्रम या सत्संग में नहीं जाते।

पटना के लोकप्रिय शिक्षक और यूट्यूबर खान सर का नाम भी इस संदर्भ में सामने आता है। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में उन्हें प्रेमानंद महाराज के प्रति प्रशंसा व्यक्त करते हुए उद्धृत किया गया है।

उनके बयान में सांसारिक जीवन के बीच रहते हुए उससे अनासक्त रहने की आध्यात्मिक अवधारणा का उल्लेख मिलता है। यह विचार भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में लंबे समय से मौजूद रहा है। व्यक्ति दुनिया में रहते हुए भी अपने भीतर एक अलग अनुशासन और वैराग्य विकसित कर सकता है।

प्रेमानंद महाराज की चर्चा केवल उनके प्रवचनों तक सीमित नहीं है। उनके व्यक्तित्व को लेकर कई सार्वजनिक हस्तियों ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। पुस्तक के अंतिम हिस्से में ऐसी प्रतिक्रियाएं प्रकाशित की गई हैं।

अभिनेत्री और पूर्व सांसद जया प्रदा ने उनके संदेश को कलियुग में सही रास्ते से भटकने से बचाने वाला बताया है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उनके विचारों को सनातन धर्म, सर्वधर्म समभाव और सार्वभौमिक दिव्यता की भावना से जोड़ा है।
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लेखक अशोका मोदी ने भी प्रेमानंद महाराज के धार्मिक सद्भाव और सार्वभौमिक प्रेम के संदेश को आज के समय में महत्वपूर्ण बताया है।

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने उन्हें एकता और विवेक की आवाज बताया है। पुस्तक पर प्रतिक्रिया देने वाले अन्य लोगों ने भी इसके शोध और प्रस्तुति की सराहना की है। इन प्रतिक्रियाओं से यह संकेत मिलता है कि प्रेमानंद महाराज को लेकर चर्चा केवल धार्मिक हलकों तक सीमित नहीं है।

हालांकि किसी संत या आध्यात्मिक व्यक्ति को समझने का सबसे उचित तरीका उनके बारे में बने लोकप्रिय विचारों के बजाय उनके मूल संदेश को देखना है। प्रेमानंद महाराज के संदर्भ में भी यही बात महत्वपूर्ण है।

उनके प्रवचनों में भक्ति के साथ आत्मसंयम, सेवा, करुणा और धार्मिक आस्था के प्रति सम्मान की बातें बार बार दिखाई देती हैं। वह दूसरे धर्मों की आलोचना करने के बजाय अपने अनुयायियों को अपने आचरण पर ध्यान देने की सीख देते हैं, ऐसा उनके समर्थकों और पुस्तक में प्रस्तुत सामग्री से सामने आता है।

यही वजह है कि प्रेमानंद महाराज को केवल संत या धार्मिक गुरु कहकर उनकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। उनके अनुयायी उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते हैं। कुछ लोग उन्हें धार्मिक सद्भाव का संदेश देने वाला संत मानते हैं।

वहीं दूसरे लोग उनके व्यक्तित्व में सूफी फकीरों जैसी सादगी और भक्ति परंपरा जैसी आत्मसमर्पण की भावना देखते हैं। उनके प्रति लोगों की धारणाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन यह बात ध्यान देने योग्य है कि उनकी बातें अलग अलग समुदायों के लोगों तक पहुंच रही हैं।
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आज जब धार्मिक पहचान को लेकर समाज में बहस तेज है, ऐसे समय में सर्वधर्म सम्मान की बात स्वाभाविक रूप से ध्यान खींचती है। प्रेमानंद महाराज का प्रभाव इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

उनका संदेश यह बताने की कोशिश करता है कि अपनी आस्था के प्रति निष्ठा रखने और दूसरे की आस्था का सम्मान करने में कोई विरोध नहीं है। धर्म का रास्ता यदि मनुष्य को प्रेम, करुणा और विनम्रता की ओर ले जाता है तो उसकी उपयोगिता केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक जीवन तक सीमित नहीं रहती।

तो आखिर प्रेमानंद महाराज को किस तराजू पर तौला जाए? संत, फकीर या फरिश्ता? शायद किसी एक शब्द में इसका उत्तर देना कठिन है। उन्हें समझने के लिए उनके प्रवचनों, व्यवहार और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति उनके दृष्टिकोण को एक साथ देखना होगा।

‘प्रेमानंद महाराज: मैसेंजर ऑफ रिलीजियस हार्मनी एंड डिवाइन लव’ इसी कोशिश का एक दस्तावेज है। पुस्तक का केंद्रीय विचार भी यही दिखाई देता है कि धार्मिक विविधता विभाजन का कारण बनने के बजाय इंसान को एक दूसरे के करीब ला सकती है। ऐसे दौर में प्रेम, भक्ति और धार्मिक सद्भाव की भाषा निश्चित रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित करती है।