Country and abroad: Improving relations with China in changing global circumstances
प्रमोद जोशी
पिछले दो साल से भारत और चीन के रिश्तों की बर्फ पिघलाने के प्रयास चल रहे हैं. अब लगता है कि प्रयास रंग लाएँगे. शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के हाशिए पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को लेकर राजनयिक-सरगर्मियाँ अचानक बढ़ गई हैं.
यह शिखर सम्मेलन एससीओ के 25 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें पीएम मोदी 31 अगस्त और 1 सितंबर तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हैं.
दो हफ्ते बाद 12-13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन भी है, जिसमें दोनों नेताओं की फिर से मुलाकात होने की संभावनाएँ हैं. दोनों सम्मेलनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति भी महत्त्वपूर्ण है.
चीनी राष्ट्रपति की दिल्ली-यात्रा के बड़े निहितार्थ हैं. इस यात्रा की सीधी जानकारी रखने वाले एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, ‘चीनी अधिकारी होटल और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हैं’. उनके साथ क़रीब 400 अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल आने की संभावना है.
वैश्विक परिस्थितियाँ
दोनों देशों के संबंधों में नज़र आती नरमी के पीछे आंशिक रूप से अमेरिका का प्रभाव और आंशिक रूप से व्यावहारिक कारण हैं. पिछले एक साल की वैश्विक-गतिविधियों ने इसकी पृष्ठभूमि तैयार कर दी है.अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ-आक्रमण और लेन-देन की डिप्लोमेसी ने भारत पर बाहरी दबाव बढ़ा दिया है, जिससे स्वायत्तता बनाए रखने की उसकी ज़रूरतें बढ़ गई हैं. ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देश भी चीन-भारत सहयोग के लिए अवसर प्रदान कर रहे हैं.
मौजूदा जियोपॉलिटिकल हालात में दुनिया के कई देशों के रिश्ते नया आकार ले रहे हैं. यह स्थिति भारत और चीन के लिए भी अहम है. इन रिश्तों के सुधरने का मतलब यह नहीं है, कि भारत अब अमेरिका-विरोधी खेमे में शामिल होने जा रहा है. भारत ने अपने रिश्तों की परिधि को बढ़ाया है. वह एक तरफ यूरोपियन यूनियन के साथ रिश्ते जोड़ रहा है, वहीं जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंध सुधारे हैं. अमेरिका के साथ नई भू-भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप वे पुनर्परिभाषित हो रहे हैं.
भारत-चीन संबंधों की वर्तमान स्थिति को लेकर कई तरह की व्याख्याएँ हैं. पहली तो यही है कि क्या वास्तव में संबंधों में नरमी आई है? क्या दोनों पक्ष नए सिरे से शुरुआत कर पाएँगे, या फिर रिश्ते अब भी तनावपूर्ण बने रहेंगे? सीमा-विवाद और चीन की पाकिस्तान-नीति दो बड़े अड़ंगे हैं.
संबंधों में प्रगति
फिलहाल लगता है कि वास्तविकता कहीं बीच में है. 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़पों के बाद से, चीन के साथ संबंधों को संभालने की कोशिश अब भारत भी, करता दिखाई पड़ रहा है.
शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी के बीच अगस्त 2025 में हुई बैठक और चीनी निवेश पर लगे प्रतिबंधों में कुछ ढील से पहले ही संकेत मिला है कि दोनों पक्ष अब द्विपक्षीय तनाव को और बढ़ने से रोकने की दिशा में आगे बढ़ गए हैं.
फिलहाल इसे रिश्तों में सुधार कहने से पहले की स्थिति यानी स्थिरता कहना चाहिए. इसे भारी बदलाव नहीं मान लेना चाहिए, क्योंकि दोनों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, दक्षिण एशिया में सुरक्षा प्रतिस्पर्धा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा सहित तनाव के मूल स्रोत खत्म नहीं हुए हैं. पूर्वी लद्दाख की सीमा के कुछ हिस्सों से सैनिकों की वापसी ने टकराव के जोखिम को तत्काल कम कर दिया है, लेकिन इससे अंतर्निहित मतभेदों और रणनीतिक अविश्वास का समाधान नहीं हुआ है, जो 2020 के बाद से गहराता चला गया है.
महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ
संबंध-सुधार को लेकर हाल में कुछ महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ हुई हैं. गत 25 अगस्त को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेशमंत्री वांग यी के बीच सीमा विवाद पर हुई वार्ता का 25वाँ दौर भी, द्विपक्षीय संबंधों की बदलती संरचना का आभास देता है.
दोनों देशों द्वारा 26 अगस्त को जारी किए गए आठ सूत्री दस्तावेज के अनुसार, भारत और चीन ने जनरल स्तर या वरिष्ठतम सैन्य कमांडर स्तर की बैठकों के आयोजन के लिए दो अतिरिक्त बैठक स्थल स्थापित करने पर भी सहमति व्यक्त की है.
इस बैठक का महत्त्व इसलिए भी है, क्योंकि यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दिल्ली की संभावित यात्रा से ठीक पहले हुई. इस तरह से देखें, तो यह शिखर सम्मेलन दोनों देशों को व्यापक राजनयिक मंच प्रदान करेगा. इसबार के सौहार्दपूर्ण बयान उस शत्रुतापूर्ण लहजे से बिल्कुल अलग हैं, जिसने 2020 की गर्मियों में गलवान में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद से संबंधों को खराब कर दिया था.
बनते-बिगड़ते रिश्ते
गलवान की घटना से पहले, दोनों देश छोटी-मोटी सीमा झड़पों से बिगड़े संबंधों को सुधारने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे. शी जिनपिंग की भारत की पहली राजकीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी अगवानी अपने गृह राज्य गुजरात में की थी।
जून 1954 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई का नागरिक अभिनंदन किया गया था. उसे भी शामिल कर लें तब भी आज तक चीन के किसी नेता का भारत में ऐसा स्वागत नहीं हुआ जैसा 2014 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग का हुआ.
2015 में मोदी ने बतौर पीएम अपनी पहली चीन यात्रा के दौरान शी जिनपिंग से उनके गृहनगर शीआन में मुलाकात की थी. 2017 के डोकलाम विवाद के बाद दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव फिर से पैदा हो गया, जिसे कम करने और आपसी विश्वास को मजबूत करने के उद्देश्य से अप्रैल 2018 में चीन के वुहान में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ.
वुहान भावना
इसके बाद दोनों देशों के बीच बने सहयोग और संवाद के नए माहौल को 'वुहान स्पिरिट' कहा जाता है। इसी अनौपचारिक संवाद की शृंखला में अक्टूबर 2019 में तमिलनाडु के मामल्लापुरम में दूसरा शिखर सम्मेलन (चेन्नई कनेक्ट) आयोजित हुआ.
2020 में गलवान की घटना ने सभी प्रयासों को धराशायी कर दिया. उसके अगले दो साल तक रिश्ते बिगड़ते ही रहे. इस दौरान भारत और अमेरिका के बीच ‘क्वॉड सक्रियता’ बढ़ी, जिसे लेकर चीनी शिकायतें बढ़ीं.
हालाँकि भारत ने ‘क्वॉड’ को चीनी-विरोधी फोरम नहीं माना, पर उसका संदेश यही था. 2024 में हालात ने करवट ली. द्विपक्षीय संवाद का सिलसिला फिर शुरू हुआ. इसकी पहली झलक 25 मार्च 2024 को चीनी विदेशमंत्री वांग यी की अघोषित दिल्ली-यात्रा में देखने को मिली.
उसके बाद पूर्वी लद्दाख में तनाव दूर करने से जुड़ी वार्ताओं ने सकारात्मक भूमिका अदा की. रूस के कज़ान शहर में 23 अक्तूबर को हुए 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी चिनफिंग के बीच महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई.पाँच साल बाद हुई इस पहली औपचारिक बैठक ने बदलती परिस्थितियों का आभास दिया. उस बैठक के ठीक पहले 21 अक्तूबर को दोनों देशों ने एलएसी पर टकराव के दो बिंदुओं, देपसांग मैदानों और डेमचोक में गश्त व्यवस्था पर समझौता हो गया.
दोस्ती का हाथ
चार साल की तल्ख़ियों, टकरावों और हिंसक घटनाओं के बाद चीन ने 2024 में भारत की ओर फिर से ‘दोस्ती का हाथ’ बढ़ाया. संबंधों का मिजाज फिर से बदलने में करीब पाँच साल की राजनयिक और सैन्य वार्ताओं की भूमिका है. पिछले साल पीएम मोदी ने सात साल में पहली बार चीन का दौरा किया. सितंबर 2025 में चीन के तियानजिन में हुए एससीओ सम्मेलन में भारत, चीन और रूस के नेताओं की गर्मजोशी भरी मुलाक़ात काफ़ी चर्चित रही थी.
उस समय कहा गया था कि शी जिनपिंग और पीएम मोदी ऐसे समय पर मिले, जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ वॉर और एकतरफ़ा फ़ैसलों का सामना कर रहे थे.
इस बदले माहौल ने अब भारत-चीन रणनीतिक आर्थिक संवाद (एसईडी) को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान किया है. यह वह तंत्र है जिसे 2011 में मनमोहन सिंह और वेन जियाबाओ ने शुरू किया था और जिसके तहत 2019 से पहले वार्ता के छह दौर हो चुके थे.
हिंद महासागर
अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत का हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता में सीधा दखल है, वहीं समुद्र पर आर्थिक निर्भरता के कारण समुद्री मार्गों की सुरक्षा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी पहचान को स्थापित करने का प्रयास किया है, और इस क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ नौसैनिक संपर्क का विस्तार किया है.
‘फर्स्ट रेसपोंडर’ के रूप में उसकी भूमिका ने इस छवि को मजबूत करने में सहायक भूमिका निभाई है. भारत ने मानवीय सहायता और आपदा राहत, नौसैनिक अभ्यास, क्षमता निर्माण और समुद्री सहयोग के अन्य रूपों के माध्यम से अपनी भूमिका को मजबूत किया है.हिंद महासागर के साथ भारत के संबंधों का एक मजबूत सभ्यतागत आयाम भी है. व्यापार, प्रवासन, धर्म और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारत के इस क्षेत्र के देशों के साथ दीर्घकालिक संबंध रहे हैं.
चीनी विस्तार
दूसरी तरफ चीन, हिंद महासागर का तटीय देश नहीं है, फिर भी उसने पिछले दशक में इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक, राजनयिक और नौसैनिक उपस्थिति का तेजी से विस्तार किया है.
उसके हितों में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, समुद्री मार्ग, समुद्री डकैती विरोधी अभियान और अपने बढ़ते विदेशी हितों की रक्षा शामिल हैं.
इस विस्तार का पैमाना और स्वरूप एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है: क्या चीन केवल हिंद महासागर क्षेत्र में अपने हितों को सुरक्षित करना चाहता है, या समुद्री क्षेत्रीय व्यवस्था को अपने पक्ष में ढालना चाहता है? इस क्षेत्र में चीन के स्पष्ट आर्थिक और सुरक्षा हित हैं, लेकिन उसकी गतिविधियाँ समुद्री मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी हितों को सुरक्षित करने से परे की महत्वाकांक्षाओं का संकेत देती हैं.
बढ़ती ताकत
चीन की बढ़ती फौजी ताकत और दोहरे इरादों वाली उपस्थिति उसे हिंद महासागर में संचालन जारी रखने और अपने तटों से दूर तक शक्ति का प्रदर्शन करने की अधिक क्षमता प्रदान करती है.
ग्वादर बंदरगाह पर कब्ज़ा, हंबनटोटा बंदरगाह का 99 साल का पट्टा और जिबूती में सैनिक अड्डा यह बताता है कि उसकी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति तेजी से एक दूसरे से जुड़ रही है.
चीन की बढ़ती क्षमताएँ उसे भारत का प्रतिस्पर्धी बना चुकी हैं. पाकिस्तान में उसकी बढ़ती सैन्य-भूमिका भी चिंता का कारण है. पर क्या चीन इस तथ्य को नहीं जानता है? क्या वह इस दिशा में भी कुछ करेगा? क्या इस सवाल का जवाब हमें जल्द मिलेगा?