गांव की बेटियां पढ़ तो रहीं, क्या फैसले भी ले पा रही हैं?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-08-2026
The daughters of the village are indeed getting an education, but are they also able to make decisions?
The daughters of the village are indeed getting an education, but are they also able to make decisions?

 

जीतू कुमारी

गांवों में लड़कियों की शिक्षा को लेकर तस्वीर पहले से बदली है। कुछ दशक पहले जहां गिने चुने घरों की लड़कियों का स्कूल जाना ही बड़ी बात माना जाता था, वहीं अब लगभग सभी ग्रामीण परिवार की किशोरियां स्कूल जाने लगी हैं। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बाद लड़कियां 12वीं तक पढ़ रही हैं और कुछ उच्च शिक्षा के लिए भी गांव से बाहर जा रही हैं।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या केवल स्कूल की दहलीज तक पहुंच जाना ही लड़कियों की आजादी का मतलब पूरा हो जाता है? क्या किताबें हाथ में आने के बाद उनके जीवन के फैसले भी उनके हाथ में आ गए हैं? इन सवालों का जवाब अभी पूरी तरह हां में नहीं दिया जा सकता।

ग्रामीण समाज में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे धीरे-धीरे खुले हैं, लेकिन फैसले लेने की खिड़की अब भी लगभग बंद है। लड़की क्या पढ़ेगी? कितना पढ़ेगी? कब उसकी शादी होगी? किससे शादी करेगी? क्या पहनेगी? किसके साथ और कहां जाएगी? इन सवालों के जवाब अक्सर लड़की से ज्यादा परिवार और समाज तय करता है। 

मतलब शिक्षा का स्तर बढ़ा है, लेकिन निर्णय लेने का अधिकार उसी गति से नहीं बढ़ पाया है। लूणकरणसर ब्लॉक से करीब 20 किमी दूर कुजटी गांव इस बदलाव और ऐसी ही सीमाओं का एक उदाहरण है। करीब 2500 की आबादी वाले इस गांव में पुरुषों की साक्षरता दर 72 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर केवल 40 प्रतिशत है। 

आंकड़े बताते हैं कि लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के मामले में अभी लंबी दूरी तय करनी बाकी है। फिर भी बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। आज गांव की लड़कियां पढ़ना चाहती हैं, आगे बढ़ना चाहती हैं और अपने जीवन को लेकर सवाल भी पूछ रही हैं। गांव की 21 वर्षीय कविता (नाम परिवर्तित) का सवाल इसी बदलती सोच की आवाज है। वह बताती है कि गांव के कई परिवारों में आज भी यह धारणा है कि लड़की को ज्यादा पढ़ाने से वह 'बिगड़' जाएगी। परिवारों को डर रहता है कि पढ़ी-लिखी लड़की आगे चलकर अपनी पसंद से शादी कर सकती है इससे परिवार की 'इज्जत' मिट्टी में मिल जाएगी।

लेकिन कविता का सवाल इस पूरी सोच की बुनियाद को हिला देता है। वह पूछती हैं कि लड़की अपनी पसंद से शादी करे तो परिवार की इज्जत मिट्टी में कैसे मिल जाती है? जबकि लड़का अपनी पसंद से शादी करे तो वही इज्जत क्यों नहीं मिटती?

यह सवाल केवल शादी का सवाल नहीं है। यह उस परंपरा पर उठती उंगली है जिसमें एक ही निर्णय लड़के के लिए अधिकार और लड़की के लिए परिवार की प्रतिष्ठा पर हमला बन जाता है। अगर लड़के को अपने जीवनसाथी के चुनाव का अधिकार है तो लड़की से यह अधिकार क्यों छीन लिया जाता है? अगर परिवार की इज्जत बच्चों के व्यवहार से जुड़ी है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल लड़की के कंधों पर क्यों रखी जाती है?

यही फर्क हमें शिक्षा और आजादी के बीच समझना होगा। शिक्षा का असली अर्थ तब पूरा होता है जब वह अपने जीवन के बारे में सोचने, सवाल पूछने और निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी हासिल करे। यदि 12वीं तक पढ़ने के बाद भी उसके जीवन का फैसला उसकी इच्छा पूछे बिना कर दिया जाए, तो शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में 12वीं के बाद लड़कियों की पढ़ाई रोक दी जाती है और शादी को अगला स्वाभाविक पड़ाव मान लिया जाता है। यह भी सच है कि पहले की तुलना में 12वीं तक पहुंचने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ना एक सकारात्मक बदलाव है।

लेकिन यह सामाजिक बदलाव अचानक नहीं आता है। एक पीढ़ी स्कूल तक पहुंची है, अगली पीढ़ी कॉलेज के बारे में कदम बढ़ाने लगी है. इसके बाद शायद समाज लड़की के अपने फैसले लेने को भी सामान्य मानना सीखेगा। इसलिए अगला कदम उठाने के लिए आज से ही गांवों में हो रही छोटी-छोटी शुरुआतों को पहचानना जरूरी है।

कविता एक और सामाजिक असमानता की ओर ध्यान दिलाती हैं। उनके गांव में विधवा महिला को शुभ नहीं माना जाता और उसे शुभ कामों से दूर रखा जाता है। दूसरी ओर, विधुर पुरुष के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होता है। कविता का सवाल फिर वही है कि पति की मृत्यु के बाद महिला 'अशुभ' और पत्नी की मृत्यु के बाद भी पुरुष सामान्य कैसे हो जाता है?

क्या किसी व्यक्ति का शुभ-अशुभ होना उसके जीवनसाथी की मृत्यु से तय किया जा सकता है? और अगर यह नियम सचमुच सामाजिक परंपरा है, तो उसका बोझ केवल महिलाओं पर ही क्यों?

समाज में बदलाव का मतलब परंपराओं को अचानक खत्म करना नहीं, बल्कि उन परंपराओं से सवाल करना है जो किसी को नियमों से बांधती है और कोई सभी नियमों से ऊपर हो जाता है। गांव की लड़कियों से यह कहना कि 'हम तुम्हारी सुरक्षा चाहते हैं' तब तक अधूरा है, जब तक सुरक्षा के नाम पर उसकी स्वतंत्रता छीनी जाती रहेगी।

लड़कियों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपनी पसंद के कपड़े पहनें, अपनी रुचि के विषय और करियर चुनें, सुरक्षित तरीके से अपनी पसंद की जगहों पर जाएं और सबसे बढ़कर, अपने जीवन से जुड़े सभी फैसलों में उसकी इच्छा को प्राथमिकता मिले।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब गांवों की फ़िज़ा भी बदल रही है। लड़कियां सवाल पूछ रही हैं। वे अपनी दुनिया को केवल घर की चारदीवारी तक सीमित मानने से इनकार कर रही हैं। कुजटी की कविता का सवाल इसी बदलाव का संकेत है। 

अब जरूरत इस बात की है कि समाज उन सवालों से घबराए नहीं, बल्कि अपनी सोच को बदले, क्योंकि किसी लड़की की आजादी परिवार की इज्जत कम नहीं करती। उलटे, जिस समाज में उसकी इच्छा, असहमति और निर्णय को सम्मान मिलता है, वही समाज वास्तव में आगे बढ़ता है। लड़कियों को शिक्षा देना बदलाव की शुरुआत है और उसे अपने फैसले लेने का अधिकार देना उस बदलाव की मंजिल है।

(यह लेखिका की निजी राय है)