प्रमोद जोशी
कश्मीर के बारे में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के एक बयान ने भारत और पाकिस्तान के पर्यवेक्षकों का ध्यान खींचा है. कश्मीर-विवाद के अलावा भारत-अमेरिका रिश्तों के लिहाज से भी यह बयान महत्त्वपूर्ण है.भारतीय पर्यवेक्षक मानते हैं कि भारत को इस विषय पर आत्यंतिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए. बयान के मतलब को समझने का प्रयास अभी किया ही जा रहा है.
सच यह भी है कि किसी राजदूत का बयान अंतिम नहीं होता. यह बयान कोई संधि नहीं है, और न राष्ट्रपति की घोषणा या विदेश विभाग के बयान जैसा आधिकारिक. फिर भी डिप्लोमेसी में शब्दावली और समय का महत्त्व होता है.

क्या चल रहा है?
इतना समझ में आता है कि पीछे कुछ चल रहा है. कई दिन गुजर जाने के बाद भी अमेरिकी सरकार ने इस बात का कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है. इससे लगता है कि राजदूत ने बिना विचारे यह बात नहीं कही है.
सच यह भी है कि डिप्लोमेसी में हमेशा कुछ न कुछ बैकरूम चलता रहता है. उन्हें आधिकारिक रूप से सामने आने के पहले कई मोड़ों से गुज़रना होता है. इसलिए इसे अमेरिकी-नीति का हिस्सा मानने के पहले कुछ बातों का इंतज़ार करना होगा.
अमेरिकी राजदूत इस्लामाबाद में भी यही बात दोहराएँ तभी उसका कोई मतलब है. गोर ने 19अगस्त को श्रीनगर में कहा, ‘कश्मीर भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है’. उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर की यात्रा करने वाले अपने नागरिकों के लिए जारी यात्रा-सलाह को हटाने पर अमेरिका विचार करेगा.
चर्चा इस बात पर भी है कि सर्जियो गोर ने 'अभिन्न अंग' की जगह 'महत्त्वपूर्ण' शब्द का क्यों इस्तेमाल किया. गोर से मुलाकात के ठीक पहले, मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने क्षेत्र में अमेरिकी भूमिका के दावों को स्पष्ट करते हुए कहा: ‘हमारे मामले वाशिंगटन में हल नहीं होंगे; उन्हें हमारे देश की सरकार ही हल करेगी.’
अमेरिकी दृष्टिकोण
अतीत में अमेरिका, आधिकारिक रूप से कहता रहा है कि कश्मीर विवादित क्षेत्र है और कश्मीरी लोगों की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच इसकी स्थिति का निपटारा होना चाहिए.
अमेरिकी अधिकारियों ने लगातार कई राष्ट्रपतियों के दौरान कहा है कि ‘हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है’. इसमें 2019भी शामिल है, जब एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक ने अपनी संसद को बताया था कि भारत के कदम ने नियंत्रण रेखा को ‘वास्तविक’ सीमा के रूप में वाशिंगटन के दृष्टिकोण को नहीं बदला है.
1999में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से कहा था कि क्षेत्र में दोनों देशों के बीच हुई लड़ाई के बाद पाकिस्तानी सेना को भारतीय प्रशासित कश्मीर के कारगिल से पीछे हटना होगा.
अल जज़ीरा ने पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव और इस्लामाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रीजनल स्टडीज के अध्यक्ष जौहर सलीम को उद्धृत किया है कि गोर की टिप्पणी को अमेरिकी नीति में बदलाव के रूप में नहीं समझना चाहिए.
उनके अनुसार ‘नीति में कोई भी बदलाव वाशिंगटन के औपचारिक बयानों, विदेश विभाग की भाषा में परिलक्षित होगा और वास्तव में, यह वाइट हाउस के स्तर पर होना चाहिए.’
पृष्ठभूमि
कश्मीर को लेकर अमेरिकी नज़रिए में कुछ बदलाव तो पहले भी हुआ है. 1948के आसपास अमेरिका ने कभी-कभी स्वतंत्रता को जनमत संग्रह के विकल्पों में शामिल करने की बात की थी. मार्च 1948में अमेरिका ने भारत से स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर का प्रस्ताव रखा था, जिसमें पहले स्वतंत्रता पर वोट और फिर भारत/पाकिस्तान पर वोट का विचार था.
वह शुरुआती चरण था, जो 1950तक बदल गया. सितंबर 1950में अमेरिकी राजदूत लॉय हेंडरसन ने शेख अब्दुल्ला से गुप्त मुलाकात की. अब्दुल्ला ने स्वतंत्र कश्मीर का समर्थन किया और कहा कि ज्यादातर आबादी इसे चाहती है.
उन्होंने अमेरिकी आर्थिक मदद की भी बात की. लेकिन यह अब्दुल्ला की व्यक्तिगत राय थी; अमेरिका ने इसे आधिकारिक नीति नहीं बनाया.1953में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट की वजह से और अन्य स्रोतों में कश्मीर वैली को विशेष स्थिति (संभवतः स्वतंत्रता, भारत-पाकिस्तान की गारंटी के साथ) और बाकी हिस्से के विभाजन की चर्चा आई.
अमेरिका के तत्कालीन विदेशमंत्री जॉन फोस्टर डलेस से जुड़े कुछ प्रस्तावों की बात भी हुई, लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों ने उससे इनकार किया. अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर किसी हस्तक्षेप से इनकार किया. ये ज्यादातर अफवाहें थीं, जो शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी (अगस्त 1953) से जुड़ी थीं.
1950के दशक का मध्य आते-आते अमेरिका ने कश्मीर मुद्दे पर सक्रिय मध्यस्थता से दूरी बना ली. शीतयुद्ध को दौरान भारत-अमेरिका संबंध और पाकिस्तान के साथ गठबंधन (सीटो और सेंटो) ने नीति को प्रभावित किया. स्वतंत्र कश्मीर का समर्थन कम हो गया.

यात्रा का महत्त्व
गोर की इस यात्रा के महत्त्व पर भी हमें ग़ौर करना होगा. सर्जियो गोर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के विशेष दूत भी हैं और अनुच्छेद 370के निरसन के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की यह पहली स्वतंत्र कश्मीर-यात्रा है.
उनके श्रीनगर और लद्दाख दौरे का इस्लामाबाद और बीजिंग दोनों जगह गहन विश्लेषण किया जाएगा. चीन की प्रतिक्रिया इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि गोर श्रीनगर के बाद लद्दाख भी गए थे, जिसे लेकर चीन के भी दावे हैं.
कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवाद बनाने की पाकिस्तानी कोशिशों को चीन का लगातार समर्थन मिलता है. पाकिस्तान सरकार ने अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए अमेरिकी चार्ज डी'अफेयर्स को तलब किया और उसके बाद अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए बयान भी जारी किया.
भारतीय चिंताएँ
भारत इसे दो देशों के बीच का विषय मानता है. भारत की दृष्टि से सीमा पार से आतंकवाद को प्रायोजित करना गंभीर चिंता का विषय है. गोर के संदेश में यह भी संकेत मिलता है कि अमेरिका ने इस विषय पर भारतीय चिंताओं पर ध्यान दिया है.
अक्तूबर 2001में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बाहर आत्मघाती बम धमाके और दिसंबर 2001में भारतीय संसद पर हुए और नवंबर 2008में मुंबई हमले ने इस मसले की गंभीरता को काफी बढ़ाया था.
इन निर्णायक घटनाओं ने दक्षिण एशिया को लेकर अमेरिका की कई पुरानी धारणाओं के सामने सवाल खड़े हुए हैं. अभी कहना मुश्किल है कि यह बयान उसी बदलाव का प्रतिनिधि है या नहीं.
वैश्विक रणनीति में ट्रंप की नीति लेन-देन वाली रही है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार-समझौता होना है, जिसके बारे में बार-बार सूचना आती है कि वह किसी भी समय हो जाएगा, पर वह हुआ नहीं है.
अब गोर ने शनिवार को फिर कहा कि ट्रेड डील पर सैद्धांतिक रूप से पूरी सहमति हो गई है. अब काम में टेक्स्ट के कुछ हिस्सों को व्यवस्थित और अंतिम रूप दिया जा रहा है.
ट्रैवल एडवाइज़री
अमेरिकी विदेश मंत्रालय अलग-अलग देशों के लिए अपने नागरिकों को ट्रैवल एडवाइज़री जारी करता है. भारत को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्रालय की लेवल-2की एडवाइज़री है लेकिन जम्मू-कश्मीर समेत कुछ इलाक़ों के लिए उसने लेवल-4की एडवाइज़री जारी की हुई है.
अमेरिका ने अपने नागरिकों को कहा है कि वे आतंकवाद और नागरिक अशांति की आशंका की वजह से जम्मू-कश्मीर का दौरा न करें. अब वह यदि ट्रैवल एडवाइज़री में ढील देगा, तो इससे अगस्त 2019के बाद हासिल की गई सुरक्षा संबंधी उपलब्धियों का संदेश जाएगा. यानी कि भारत का कदम आंतरिक मामला था, और कश्मीर में स्थितियाँ बेहतर हुई हैं.
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया से फैलो माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ‘जनवरी में दिल्ली पहुँचने के बाद से गोर का मुख्य लक्ष्य भारत के साथ रिश्तों में सुधार लाना रहा है. उनकी टिप्पणी निश्चित रूप से इसमें मदद करेगी. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में अमेरिकी नीति में बदलाव है?’
'ऐसा है, तो यह कश्मीर पर अमेरिका की वर्षों पुरानी नीति से अलग होना है, और पाकिस्तान के अमेरिका के साथ तेजी से रिश्तों को नुक़सान पहुँचाने का जोखिम भी इसमें है.'

पाकिस्तानी प्रतिक्रिया
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से पिछले बुधवार को जारी बयान में कहा गया है, ‘आज इस्लामाबाद में अमेरिकी चार्ज डी' अफेयर्स को विदेश मंत्रालय में तलब किया गया और भारत में अमेरिकी राजदूत द्वारा जम्मू और कश्मीर के दौरे के दौरान जम्मू-कश्मीर की स्थिति के बारे में दिए गए तथ्यात्मक रूप से ग़लत बयानों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया.’
पाकिस्तान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जम्मू-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रासंगिक प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं के अनुसार अपने अंतिम समाधान का इंतज़ार कर रहा है.
दूसरी तरफ इस मामले में पाकिस्तान के भीतर से ही अंतर्विरोधी बातें सामने आती रही हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर ने 17दिसम्बर 2003को परवेज़ मुशर्रफ के इंटरव्यू पर आधारित समाचार जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा, ‘हमारा देश संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर चलता है, पर अब हमने उसे भी ‘किनारे रख दिया है’ (लेफ्ट एसाइड) और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए आधा रास्ता खुद चलने को तैयार है.’
मुशर्रफ की पेशकश
यह बात आगरा शिखर वार्ता (14-16जुलाई 2001) के बाद की है. कई रिपोर्टों के अनुसार, आगरा में मुशर्रफ ने कश्मीर विवाद सुलझाने के लिए ‘चार सूत्री समाधान’ का प्रस्ताव किया था. इसमें सैनिकों की चरणबद्ध वापसी या निरस्त्रीकरण तथा कश्मीर की सीमाओं में कोई परिवर्तन न करना शामिल था.
इस समाधान में जम्मू-कश्मीर के लोगों को नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति देने का प्रस्ताव था और साथ ही स्वतंत्रता के बिना स्वशासन तथा भारत, पाकिस्तान और कश्मीर को शामिल करते हुए जम्मू-कश्मीर में एक संयुक्त पर्यवेक्षण तंत्र की वकालत की गई थी.
उसके बाद यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री के बयानों से भी लगता था कि भारत सरकार ऐसे समाधान का समर्थन कर सकती है. 2009में सीएनएन-आईबीएन से एक इंटरव्यू में मनमोहन सिंह ने कहा कि मुझे इस मामले में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ना चाहिए थे. वे अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में एक ऐसे समझौते की बातें कर रहे थे, जिसके तहत कश्मीर के नक्शे में कोई बदलाव नहीं हो
बहरहाल उसके बाद नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, पर पठानकोट और उड़ी से लेकर पहलगाम तक के घटनाक्रम ने इन बातों पर ब्रेक लगा दिए.
