अल्लामा इक़बाल ने श्रीकृष्ण की बाँसुरी को क्यों कहा सरोद-ए-रब्बानी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-09-2026
Why did Allama Iqbal call Sri Krishna's flute Sarod-e-Rabbani?
Why did Allama Iqbal call Sri Krishna's flute Sarod-e-Rabbani?

 

ग़ौस सिवानी

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि शायर-ए-इस्लाम अल्लामा इक़बाल की नज़र में श्रीकृष्ण का बहुत विशेष स्थान था? यानी जिस विचारक ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इस्लामी दर्शन को लोकप्रिय बनाया, उसी के दिल, दिमाग और कविता पर कृष्ण कन्हैया की गहरी छाप थी। जी हाँ! यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि सच्चाई है कि जिस तरह इक़बाल ने भगवान राम को "इमाम-ए-हिंद" कहा, उसी तरह उन्होंने कृष्ण की बाँसुरी को "सरूद-ए-रब्बानी" (ईश्वरीय संगीत) कहा है।

अल्लामा इक़बाल भले ही अपनी कविता में इस्लाम का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन इसके साथ ही वे एक महान विचारक भी थे। उन्होंने विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और दार्शनिक परंपराओं का गहराई से अध्ययन किया था।

यद्यपि उनकी पहचान "शायर-ए-इस्लाम" के रूप में होती है, लेकिन उनका चिंतन किसी एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं था। जहाँ भी उन्हें मानवता, आध्यात्मिकता, नैतिकता और सत्य का प्रकाश दिखाई देता था, वे उसका सम्मान करते थे।

इसी उदार दृष्टिकोण के कारण इक़बाल ने हिंदू धर्म की कई महत्वपूर्ण विभूतियों का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया, जिनमें श्रीकृष्ण का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले श्रीकृष्ण का एक संक्षिप्त परिचय आवश्यक है, ताकि इस लेख को समझना आसान हो।
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श्रीकृष्ण कौन हैं?

श्रीकृष्ण हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण और प्रिय विभूतियों में गिने जाते हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार वे भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। उनके जीवन, उपदेशों और व्यक्तित्व ने केवल हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य, संगीत, ललित कला और दर्शन पर भी गहरा प्रभाव डाला है। आज भी करोड़ों लोग श्रीकृष्ण को प्रेम, ज्ञान, आध्यात्मिकता और धर्म के प्रतीक के रूप में याद करते हैं।

हिंदू परंपराओं के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म लगभग पाँच हज़ार वर्ष पहले मथुरा में हुआ था। उनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था।श्रीकृष्ण के बचपन की कथाएँ हिंदू परंपराओं में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उनकी बाँसुरी की धुन, गोपियों के प्रति प्रेम और राधा के साथ उनके संबंध भारतीय साहित्य और लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इन घटनाओं को केवल कथाएँ नहीं माना जाता, बल्कि इनमें आध्यात्मिक और नैतिक अर्थ भी खोजे जाते हैं। अनेक विचारकों के अनुसार कृष्ण और राधा का प्रेम वास्तव में जीव और परमात्मा के बीच आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक है।

श्रीकृष्ण का सबसे महत्वपूर्ण स्वरूप महाकाव्य महाभारत में दिखाई देता है। इस युद्ध में उन्होंने पांडवों का साथ दिया, लेकिन स्वयं शस्त्र नहीं उठाए। वे अर्जुन के सारथी बने और युद्धभूमि में उसे जीवन, कर्तव्य, नैतिकता और आध्यात्मिकता के बारे में जो उपदेश दिए, वे बाद में भगवद्गीता के रूप में संकलित हुए। भगवद्गीता हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में गिनी जाती है।

भारत की संस्कृति में श्रीकृष्ण का प्रभाव बहुत व्यापक है। उनके बारे में असंख्य पुस्तकें, कविताएँ, नाटक, गीत और चित्रकला की उत्कृष्ट रचनाएँ बनाई गई हैं। जन्माष्टमी का त्योहार उनके जन्म की स्मृति में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, फिजी, अमेरिका, ब्रिटेन और दुनिया के कई अन्य देशों में भी श्रीकृष्ण के अनुयायी मौजूद हैं।

श्रीकृष्ण के प्रति इक़बाल की श्रद्धा

इक़बाल ने श्रीकृष्ण को केवल हिंदू धर्म की एक पवित्र विभूति के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक, ज्ञानी और मानवता के शिक्षक के रूप में स्वीकार किया। उनके अनुसार श्रीकृष्ण ऐसी महान विभूति थे जिन्होंने भारत के आध्यात्मिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।इक़बाल ने अपनी रचनाओं में श्रीकृष्ण के प्रति अत्यंत प्रेम और सम्मान की भावनाओं को व्यक्त किया है।

कृष्ण और सरोद-ए-रब्बानी

बांग-ए-दरा की मशहूर नज़्म "सरगुज़श्त-ए-आदम" में इक़बाल ने श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का सम्मान के साथ उल्लेख किया है। वे श्रीकृष्ण की बाँसुरी के स्वर को "सरोद-ए-रब्बानी", यानी ईश्वरीय संगीत, कहते हैं, जिसने हिंदुस्तान को तौहीद (एक ईश्वर) का संदेश दिया। इक़बाल कहते हैं: "सुनाया हिंद में आकर सरोद-ए-रब्बानी"

इक़बाल के इस एक मिसरे से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे श्रीकृष्ण की बाँसुरी को ईश्वरीय संदेश का वाहक मानते हैं। उनका यह मिसरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक अर्थों से भरा हुआ है।

वे बताते हैं कि हिंद की धरती पर श्रीकृष्ण के माध्यम से ईश्वरीय संदेश, आध्यात्मिक संगीत या रब्बानी शिक्षाओं की गूँज सुनाई दी। "सरोद-ए-रब्बानी" शब्द ईश्वर की ओर से आने वाले मार्गदर्शन, सत्य, प्रेम और मानवता के संदेश का प्रतीक है, जबकि बाँसुरी श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है।

इस मिसरे से यह प्रभाव भी उभरता है कि हिंदुस्तान सदियों से आध्यात्मिकता, ज्ञान और तौहीद का केंद्र रहा है, जहाँ विभिन्न नबियों, संतों, सूफ़ियों और सुधारकों के संदेशों ने मानवता को नैतिकता, प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया। इक़बाल की यह विशेषता है कि वे कुछ ही शब्दों में लंबे इतिहास को बयान कर देते हैं और इस मिसरे में भी उन्होंने यही किया है। लंबी नज़्म "सरगुज़श्त-ए-आदम" के एक मिसरे में उन्होंने हिंदुस्तान की विशाल ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि को समेट दिया है।

इक़बाल की दूसरी रचनाएँ भी यह दिखाती हैं कि वे श्रीकृष्ण को एक महान प्रचारक और सुधारक मानते हैं। इक़बाल का निम्नलिखित कथन देखिए:"जिस अरूस-ए-मआनी को श्रीकृष्ण, श्रीराम और रामानुज बेनक़ाब करना चाहते थे, श्री शंकर के तार्किक तिलिस्म ने उसे महजूब कर दिया और श्रीकृष्ण की क़ौम उनकी तजदीद के समर से महरूम रह गई।"(दीबाचा, अस्रार-ए-ख़ुदी)

अल्लामा इक़बाल का यह कथन उनके ख़ुदी के दर्शन, धार्मिक चिंतन और भारत के इतिहास के गहरे अध्ययन का परिचायक है। यहाँ इक़बाल हिंदू धार्मिक और दार्शनिक परंपरा का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि श्रीकृष्ण, श्रीराम और रामानुज मनुष्य को एक जीवंत आध्यात्मिक सत्य, प्रेम, कर्म और ईश्वर से संबंध का संदेश देना चाहते थे। उनके अनुसार ये शिक्षाएँ मनुष्य की आंतरिक जागृति और नैतिक विकास का स्रोत थीं।

इक़बाल के अनुसार श्री शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत और उसकी तार्किक व्याख्याओं ने इस आध्यात्मिक सत्य को ऐसे दार्शनिक तिलिस्म में छिपा दिया कि उसका मूल संदेश पीछे रह गया।

इक़बाल की दृष्टि में केवल बौद्धिक और अमूर्त दर्शन, यदि जीवन, कर्म और आध्यात्मिक ऊष्मा से खाली हो जाए, तो वह समाजों को वास्तविक जागरण और नवजीवन नहीं दे सकता। इसलिए वे मानते हैं कि श्रीकृष्ण की क़ौम या भारतीय समाज उनकी सुधारवादी और आध्यात्मिक शिक्षा के पूरे फल से वंचित रह गया, क्योंकि उनके संदेश की व्यावहारिक और नैतिक आत्मा दार्शनिक बहसों में खो गई।

यह कथन वास्तव में इक़बाल के उस मूल विचार को व्यक्त करता है कि जीवन की असली शक्ति प्रेम, गति, कर्म और ख़ुदी की जागृति में है, न कि केवल अमूर्त बौद्धिक चर्चाओं में।श्रीकृष्ण के बारे में इक़बाल के विचारों पर डॉ. मुहम्मद नफ़ीस हसन लिखते हैं:"हिंदू परंपरा के अनुसार महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो शिक्षाएँ दीं, गीता

उन्हीं शिक्षाओं पर आधारित है और उसमें ज्ञान तथा नैतिकता से जुड़े विषय हैं। श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ गीता की शोभा हैं। इक़बाल श्रीकृष्ण के विचार और दर्शन से प्रभावित होकर 'अस्रार-ए-ख़ुदी' की भूमिका में उन्हें यह श्रद्धांजलि देते हैं:"

"श्रीकृष्ण का नाम हमेशा आदर और सम्मान के साथ लिया जाएगा। इस महान व्यक्ति ने अत्यंत आकर्षक शैली में अपने देश और समाज की दार्शनिक परंपराओं की आलोचना की और यह सत्य स्पष्ट किया कि कर्म का त्याग, पूर्ण त्याग नहीं है, क्योंकि कर्म प्रकृति की माँग है और उसी से जीवन की स्थिरता है। बल्कि कर्म त्याग का अर्थ यह है कि कर्म और उसके परिणामों से बिल्कुल आसक्ति न हो।"

बांग-ए-दरा की नज़्म "सरगुज़श्त-ए-आदम" में इक़बाल ने श्रीकृष्ण की बाँसुरी, अर्थात उनके विचारों और शिक्षाओं को "सरोद-ए-रब्बानी" कहा है।

"सुनाया हिंद में आकर सरोद-ए-रब्बानी।"(फ़िक्र-ए-इक़बाल के मशरिक़ी मसादिर, डॉ. मुहम्मद नफ़ीस हसन, पृष्ठ 142)

श्रीकृष्ण और उनकी शिक्षाओं के प्रति इक़बाल के सम्मान का प्रमाण 11 अक्तूबर 1921 को महाराजा किशन प्रसाद शाद के नाम लिखे गए उनके पत्र से भी मिलता है, जिसमें उन्होंने भगवद् गीता का उर्दू में अनुवाद करने की इच्छा व्यक्त की थी।

अल्लामा इक़बाल के यहाँ सभी धर्मों की महान विभूतियों के प्रति सम्मान था और श्रीकृष्ण उन चुनी हुई हस्तियों में थे जिनकी शिक्षाओं से इक़बाल ने अपने दर्शन के लिए प्रेरणा प्राप्त की।

कृष्ण और प्रेम का संदेश

इक़बाल के अनुसार श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता प्रेम थी। वे मानते थे कि श्रीकृष्ण ने मनुष्यों को प्रेम, भाईचारे और आध्यात्मिक जुड़ाव का संदेश दिया। इक़बाल की दृष्टि में प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाती है और मनुष्यों के बीच की नफ़रत को समाप्त करती है।इसीलिए इक़बाल ने श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को केवल धार्मिक सीमा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें प्रेम और आध्यात्मिकता का विश्वव्यापी संदेशवाहक माना।

 कृष्ण एक राष्ट्रीय नेता के रूप में

इक़बाल की कविता में समाजों की जागृति और आत्मपहचान का विषय बहुत महत्वपूर्ण है। वे ऐसे नेताओं को पसंद करते थे जो अपने समाज को पतन से निकालकर प्रगति और जागरूकता के मार्ग पर ले जाएँ। इक़बाल के अनुसार श्रीकृष्ण भी ऐसे ही नेता थे जिन्होंने भारतीय समाज को वैचारिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की।

गीता और इक़बाल

श्रीकृष्ण के संबंध में चर्चा करते समय भगवद गीता का उल्लेख आवश्यक है, क्योंकि गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ दी गई हैं। इक़बाल गीता को भारत के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में मानते थे। उन्होंने अपनी पुस्तक अस्रार-ए-ख़ुदी की भूमिका में गीता और उसकी व्याख्याओं का उल्लेख किया है।

इक़बाल के अनुसार गीता में कर्म, उत्तरदायित्व और आंतरिक साधना का जो विचार प्रस्तुत किया गया है, वह मनुष्य के व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।यद्यपि इक़बाल का ख़ुदी का दर्शन इस्लामी शिक्षाओं से प्रेरित है, फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि भारतीय दर्शन में भी ऐसे अनेक तत्व हैं जो मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो सकते हैं।

इक़बाल और धार्मिक सहिष्णुता

श्रीकृष्ण के बारे में इक़बाल की रचनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि वे धार्मिक कट्टरता के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने भगवान राम, गुरु नानक, स्वामी रामतीर्थ, गौतम बुद्ध और आदि शंकराचार्य जैसी विभूतियों का भी सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है। साथ ही उन्होंने श्रीकृष्ण को भारत के महान आध्यात्मिक नेताओं में गिना है। इक़बाल ने हमेशा बौद्धिक ईमानदारी के साथ दूसरों के विचारों का अध्ययन किया और जहाँ अच्छाई देखी, उसका स्वीकार किया।

वर्तमान समय के लिए संदेश

आज के समय में, जब धार्मिक और सामाजिक मतभेद अक्सर तनाव का कारण बन जाते हैं, इक़बाल का दृष्टिकोण हमारे लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। उन्होंने दिखाया कि अपने धर्म पर दृढ़ रहते हुए भी दूसरी धार्मिक और वैचारिक परंपराओं का सम्मान किया जा सकता है।

श्रीकृष्ण के बारे में इक़बाल की राय इस बात का सर्वोत्तम उदाहरण है कि बौद्धिक व्यापकता, सहिष्णुता और निष्पक्षता किस प्रकार विभिन्न धर्मों के बीच संवाद और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा दे सकती है।

इक़बाल की दृष्टि में श्रीकृष्ण भारत की एक महान आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विभूति हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण को प्रेम, ज्ञान, आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक माना। यही इक़बाल की वैचारिक उदारता, बौद्धिक ईमानदारी और मानवता का सबसे उज्ज्वल पक्ष है।