
हरजिंदर
यूरोप में जब भी इस्लामफोबिया का जिक्र होता है फ्रांस की बात जरूर होती है। फ्रांस दुनिया के उन पहले देशों में है जहां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी भी तरह के धार्मिक चिन्ह पहनने पर रोक लगी तो सबसे पहला निशाना बना हिजाब। यहां तक कि स्कूल, काॅलेज, यूनिवर्सिटीज़ में स्कार्फ पहनने तक पर रोक लगा दी गई।
इस तरह की कट्टरता सिर्फ पाबंदियों पर ही नहीं रुकती वह हिंसक रूप ले ही लेती है। पिछले तकरीबन तीन दशक से फ्रांस में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की छिटपुट घटनाएं लगातार होती रही हैं। इस सदी के पहले दशक में लगा था कि ऐसी वारदात में कमी आ रही है लेकिन वह फिर से बढ़ने लगीं।
इस साल राजधानी में बनी पेरिस ग्रैंड माॅस्क के उद्घाटन के सौ साल पूरे हो रहे। इस मस्जिद की गिनती पेरिस के कुछ गिने चुने लैंडमार्क में होती है।कुछ इतिहासकारों को लगा कि यह इस्लामफोबिया से टक्कर लेने का अच्छा मौका हो सकता है, अगर इस मस्जिद का इतिहास फ्रांस के लोगों को बताया जाए।
पेरिस का यह इबाबत स्थल अपने आप में सिर्फ एक मस्जिद ही नहीं है, यह एक स्मारक भी है, उन मुस्लिम सैनिकों का जिन्होंने 1914 से 1918 के विश्वयुद्ध केे दौरान फ्रांस की तरफ से जंग में हिस्सा लिया था।
इस जंग में फ्रांस एक बड़ी ताकत के रूप में ब्रिटेन, और रूस के साथ उस समूह में शामिल था जिसे एलाइड फोर्सेज़ कहा जाता है। फ्रांस ने यह जंग लड़ने के एशिया और अफ्रीका के अपने उपनिवेशों से एक लाख सैनिकों को तैनात किया था। कहा जाता है कि इसमें 70 फीसदी सैनिक मुसलमान थे। इन्हें जंग के सबसे कठिन और अहम मोर्चों पर तैनात किया गया था।
पहले विश्वयुद्ध की शुरूआत में जब ये सैनिक भारी संख्या में फ्रांस में तैनात हुए तो उनकी इबाबत के लिए कुछ छोटी-छोटी अस्थाई मस्जिदें बनाई गईं। युद्ध के बाद पेरिस में एक बड़ी मस्जिद बनाने के लिए जगह तलाशी जाने लगी। जंग में मुसलमान सैनिकों के योगदान को देखते हुए। 1920 में चले इस अभियान में पेरिस के केंद्र में यह ढूढी गई।
बाद में 1926 में जब इस मस्जिद का उद्घाटन हुआ तो यह माना गया कि यह जंग में मारे गए मुस्लिम सैनिकों का एक स्मारक भी है।फ्रांस के बहुत से लोग मानते हैं कि यह एक ऐसा इतिहास है जिसे लोगों को बताया जाना बहुत जरूरी है। सोच यह है कि इससे वहां पर जो इस्लाम विरोधी भावनाएं लोगों के दिमागों में भरी जा रही हैं उन्हें कम करने में मदद मिलेगी।
बेशक यह एक कठिन काम है। खासकर तब जब इतिहास को लेकर लोगों में दिमागों में भ्रम भरने का दौर तेजी पकड़ रहा है। लेकिन उस भ्रम को दूर करने के लिए इस तरह का सच्चा इतिहास बताना भी जरूरी है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)