राजीव नारायण
भारत शायद दुनिया का सबसे शक्तिशाली AI मॉडल बनाने की दौड़ में आगे न हो, लेकिन वह इस तकनीक का दुनिया के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हो सकता है। इसके लिए उसे ऐसी मानव-शक्ति तैयार करनी होगी, जो AI को उपयोगी, भरोसेमंद और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बना सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक कड़वी सच्चाई भारत को स्वीकार करनी होगी।
वह इस दौड़ में सबसे आगे नहीं है। अमेरिका के पास AI कंपनियों, पूंजी और कंप्यूटिंग क्षमता का सबसे मजबूत आधार है। चीन ने अपनी तकनीकी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाया है। ताइवान उस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के केंद्र में है, जिस पर AI क्रांति निर्भर है। भारत के पास प्रतिभा, महत्वाकांक्षा और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था जरूर है, लेकिन AI की अत्याधुनिक तकनीक बनाने वाले देशों से वह अभी काफी पीछे है।
इस स्थिति से दो निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, भारत को तेजी से आगे बढ़कर कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करनी होगी, निवेश आकर्षित करना होगा और अपने फाउंडेशन मॉडल बनाने होंगे। दूसरा, कुछ लोग मानते हैं कि दौड़ पहले ही खत्म हो चुकी है और भारत केवल दूसरे देशों में विकसित AI का बाजार बनकर रह जाएगा। लेकिन दोनों सोच एक महत्वपूर्ण अवसर को नजरअंदाज करती हैं। एक दूसरी दौड़ भी है, जिसमें भारत के पास जीतने की बेहतर संभावना है।
AI के आसपास बनेंगे नए रोजगार
AI खुद सर्वर से निकलकर वास्तविक अर्थव्यवस्था में काम नहीं कर सकता। किसी को उसके परिणामों की जांच करनी होगी, गलतियों को सुधारना होगा, सिस्टम को प्रशिक्षित करना होगा, स्वचालित प्रक्रियाओं की निगरानी करनी होगी, अलग-अलग कारोबारों के लिए AI को अनुकूल बनाना होगा, स्थानीय भाषाओं में उसे ढालना होगा और वास्तविक दुनिया की जटिल परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना होगा। इसके लिए बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होगी। यही AI के आसपास बनने वाली नई आर्थिक गतिविधि की भारतीय संभावना है।
हर तकनीकी क्रांति ने तकनीक के आसपास नए रोजगार पैदा किए हैं। कारों ने मैकेनिक, सर्विस नेटवर्क और सहायक उद्योग बनाए। इंटरनेट ने ऐसे रोजगार पैदा किए, जिनकी पहले कल्पना भी मुश्किल थी। AI भी ऐसा ही कर सकता है, लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण अंतर होगा—कई नई नौकरियां मशीन और अंतिम उपयोगकर्ता के बीच की कड़ी के रूप में काम करेंगी।
AI के साथ काम करने वाले पेशेवर
मान लीजिए कोई बैंक लोन आवेदनों का आकलन करने के लिए AI का इस्तेमाल करता है। AI कुछ ही सेकंड में बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन उसकी सिफारिशों की जांच, गलतियों की पहचान, असामान्य मामलों की निगरानी और गलत फैसलों को रोकने के लिए इंसानों की जरूरत बनी रहेगी। यही स्थिति अस्पतालों, फैक्ट्रियों, बीमा कंपनियों, लॉजिस्टिक्स, स्कूलों और सरकारी विभागों में भी होगी। AI दस्तावेज तैयार कर सकता है, लेकिन उसकी पुष्टि किसी इंसान को करनी होगी। वह बातचीत का अनुवाद कर सकता है, लेकिन यह देखना जरूरी होगा कि मूल अर्थ सही रहा या नहीं। वह लाखों रिकॉर्ड में पैटर्न पहचान सकता है, लेकिन यह तय करना इंसान का काम होगा कि उन पैटर्न का वास्तव में कोई मतलब है या नहीं।
इन नौकरियों के लिए जरूरी नहीं कि कर्मचारी AI के विशेषज्ञ शोधकर्ता हों। उन्हें संबंधित क्षेत्र की जानकारी, निर्णय लेने की क्षमता, भाषा कौशल, प्रक्रियाओं की समझ और AI टूल्स के साथ काम करने की दक्षता चाहिए होगी। यही भारत के लिए बड़ा अवसर है। भारत ने दशकों में वैश्विक कंपनियों के लिए कुशल और शिक्षित कर्मचारियों के जरिए सेवाओं की अर्थव्यवस्था खड़ी की है। AI कुछ मौजूदा कामों को स्वचालित करेगा, लेकिन साथ ही AI की जांच, प्रबंधन, कस्टमाइजेशन और इंटीग्रेशन से जुड़े नए रोजगार भी पैदा कर सकता है। अवसर सिर्फ AI में रोजगार पैदा करने का नहीं, बल्कि AI के आसपास रोजगार पैदा करने का है।
भारत की विविधता बन सकती है ताकत
AI की दौड़ में भारत की मौजूदा कमजोरी ही उसकी आर्थिक ताकत बन सकती है। भारत को हर फाउंडेशन मॉडल खुद बनाने की जरूरत नहीं है। उसे इन मॉडलों को अपनी विशाल और जटिल अर्थव्यवस्था में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। भारत में करोड़ों संभावित उपयोगकर्ता, लाखों व्यवसाय और भाषाओं, उद्योगों तथा स्थानीय परिस्थितियों की जबरदस्त विविधता है। कैलिफोर्निया या शेनझेन में विकसित कोई AI मॉडल तकनीकी रूप से कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, भारत में उसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह भारतीय ग्राहकों, कंपनियों और परिस्थितियों को कितनी अच्छी तरह समझता है।
ऐसे में हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी या तेलुगु जानने वाले लोगों की जरूरत होगी, जो यह पहचान सकें कि AI ने अनुवाद तो किया है, लेकिन मूल अर्थ खो दिया है। बैंकिंग, कृषि, कानून, चिकित्सा, मैन्युफैक्चरिंग या रिटेल की समझ रखने वाले लोग यह तय कर सकेंगे कि AI का जवाब वास्तव में सही है या केवल सुनने में सही लगता है। यहीं भारत की बड़ी मानव-शक्ति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि संपत्ति बन सकती है।
छोटे शहरों तक पहुंच सकता है AI रोजगार
AI से जुड़े सभी काम केवल बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे बड़े तकनीकी शहरों तक सीमित नहीं रहेंगे। यदि ये काम डिजिटल और दूर से किए जा सकते हैं, तो AI से जुड़े रोजगार छोटे शहरों और कस्बों तक भी पहुंच सकते हैं, जैसा पहले IT-enabled services के विस्तार के दौरान हुआ था। हालांकि, भारत को AI अर्थव्यवस्था को कम वेतन वाले डिजिटल कामों का एक और बड़ा पूल बनने से रोकना होगा। अगर कर्मचारियों को कुछ रुपये प्रति काम के हिसाब से मशीन के आउटपुट को सुधारने तक सीमित कर दिया गया, तो रोजगार तो पैदा होगा, लेकिन समृद्धि नहीं। जरूरत ऐसे अवसरों की है, जहां कर्मचारी AI से जुड़ी नई क्षमताएं हासिल करें, जटिल निगरानी और विशेषज्ञता वाले कामों में आगे बढ़ें और तकनीक के विकास के साथ अपनी उत्पादकता बढ़ाएं। तभी भारत की बड़ी आबादी आर्थिक लाभ में बदल सकेगी।
AI से आगे सोचने की जरूरत
भारत में AI के भविष्य की चर्चा अक्सर री-स्किलिंग तक सीमित रहती है। बदलती नौकरियों वाले कर्मचारियों को नई स्किल सीखनी होगी, युवाओं को बुद्धिमान सिस्टम के साथ काम करना सीखना होगा और कंपनियों को अपने प्रशिक्षण के तरीकों में बदलाव करना होगा। यह सब जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। भारत को यह भी पूछना चाहिए कि AI के आसपास कौन से नए पेशे, सेवाएं और कारोबार खड़े किए जा सकते हैं?
भारत का लक्ष्य जरूरी नहीं कि अमेरिका से बेहतर अगला AI मॉडल बनाना या चीन की तरह बड़े पैमाने पर AI लागू करना हो। भारत की ताकत यह हो सकती है कि वह AI को एक विशाल और जटिल अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप ढालने में दुनिया का सबसे बेहतर देश बने और इस क्षमता को दूसरे देशों को भी निर्यात करे। AI कुछ नौकरियां जरूर खत्म करेगा, लेकिन नई नौकरियां भी पैदा करेगा। सबसे ज्यादा फायदा शायद उन देशों को होगा जो सबसे ज्यादा काम ऑटोमेट नहीं करेंगे, बल्कि उन देशों को होगा जो इंसानों और मशीनों को मिलकर काम करने में सबसे ज्यादा सक्षम बनाएंगे। भारत शायद AI बनाने की दौड़ न जीते, लेकिन सही कौशल, नीतियों और महत्वाकांक्षा के साथ वह ऐसी मानव-शक्ति तैयार कर सकता है, जो AI को दुनिया के लिए काम करना सिखाए।