नई दिल्ली।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद को गिराए जाने की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इस कार्रवाई को भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता, संपत्ति के अधिकार और कानून के शासन को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं।
मीडिया को जारी बयान में मलिक मोतसिम खान ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद को गिराया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक मनमानी का उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि इस घटना से देश और दुनिया के सामने प्रशासन की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते हैं। उनके मुताबिक, सहारनपुर में हुई कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र पर एक दाग की तरह है। यह घटना शासन व्यवस्था और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति प्रशासन के रवैये पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
मलिक मोतसिम खान ने कहा कि यदि बहुसंख्यकवादी राजनीति को संविधान की भावना को कमजोर करने और कानून के शासन को प्रभावित करने की छूट मिलती है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सहारनपुर की घटना भविष्य में इस बात के उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है कि राजनीतिक प्रभाव के चलते यदि प्रशासनिक शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल होने लगे तो संवैधानिक व्यवस्था किस तरह प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के विध्वंस संबंधी निर्देशों के पालन पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दशकों से सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे किसी धार्मिक ढांचे की स्थिति का फैसला क्या कुछ राजनीतिक नेताओं और उनके निर्देश पर काम करने वाले अधिकारियों के माध्यम से किया जा सकता है।
जमाअत के उपाध्यक्ष ने कहा कि यदि धार्मिक स्थलों, वक्फ संपत्तियों, मालिकाना हक, कब्जे और समय सीमा से जुड़े विवादों का समाधान न्यायिक प्रक्रिया के बजाय बुलडोजर के जरिए किया जाने लगे, तो इससे कानून के शासन में लोगों का भरोसा कमजोर होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी परिस्थितियों में न्यायपालिका की भूमिका क्या रह जाएगी।
उन्होंने उच्च न्यायपालिका से इस मामले का संज्ञान लेने की अपील करते हुए कहा कि घटना की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है। साथ ही उन्होंने न्यायप्रिय नागरिकों से भी ऐसी घटनाओं के खिलाफ लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आवाज उठाने का आह्वान किया।
मलिक मोतसिम खान ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक मशीनरी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कार्रवाई करने में राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों को लेकर की जा रही कार्रवाइयों से समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय का माहौल पैदा हो सकता है।
उन्होंने आगामी विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास जैसे वास्तविक मुद्दों पर जनता के बीच जाना चाहिए। उनके मुताबिक, धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों के जरिए लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष ने कहा कि देश के लोग अब विकास और जनहित से जुड़े मुद्दों को अधिक महत्व दे रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई या उनकी इबादतगाहों को नुकसान पहुंचाने से राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश सफल नहीं होगी।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान अपने धर्म, धार्मिक पहचान, संस्कृति और परंपराओं से अपना संबंध कमजोर नहीं होने देंगे। प्रशासन की किसी भी कार्रवाई को लेकर उन्होंने कहा कि कानूनी विवादों का समाधान कानून और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए, न कि मनमाने तरीके से शक्ति का इस्तेमाल करके।
मलिक मोतसिम खान ने कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी को किसी इबादतगाह को गिराने की कार्रवाई को कानूनी विवाद का अंतिम समाधान नहीं समझना चाहिए। उन्होंने न्याय, उचित प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देने की मांग की।
उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र संविधान, कानून के शासन और सभी नागरिकों के समान अधिकारों पर आधारित है। ऐसे में धार्मिक स्थलों और अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों में प्रशासन को विशेष सावधानी, पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए।