मस्जिद बचाने के लिए एक मंच पर आए पांच धर्मों के लोग

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 08-09-2026
People of different faiths united to repair a mosque; the monsoon season showcased the 'Ganga-Jamuni' spirit of India.
People of different faiths united to repair a mosque; the monsoon season showcased the 'Ganga-Jamuni' spirit of India.

 

ओनिका माहेश्वरी/ हिसार, हरियाणा 

बरसात के मौसम में जब लगातार बारिश के कारण पुरानी इमारतों की हालत और खराब होने लगती है, ऐसे समय में एक 200 साल पुरानी मस्जिद की मरम्मत के लिए अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों का एक साथ खड़ा होना सामाजिक सौहार्द की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करता है। मस्जिद में मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय से जुड़े लोग भी एकत्र हुए और पुरानी इमारत को सुरक्षित रखने तथा उसकी मरम्मत के लिए अपना समर्थन जताया। यह दृश्य उस भारत की तस्वीर पेश करता है, जहां अलग-अलग आस्थाओं के लोग एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए साथ खड़े होते हैं।

मौके पर मौजूद लोगों ने साफ तौर पर कहा कि किसी भी धर्म के व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च जाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनका कहना था कि देश की एकता और सामाजिक विकास तभी संभव है, जब सभी धर्मों और समुदायों का सम्मान किया जाए।
 
मस्जिद में मौजूद एक व्यक्ति ने इस पूरे दृश्य को बेहद खूबसूरत बताते हुए कहा, “यह बहुत खूबसूरत दृश्य है यहाँ पर, जो अक्सर कम देखने को मिलता है आजकल। हम मस्जिद में बैठे हैं, हमारे साथ मुस्लिम, सिख, हिंदू, जैन, बौद्ध धर्म के सारे समुदाय के लोग यहाँ बैठे हैं। सर, आप यह बताइए, यह सारे साथ कैसे आये, एक साथ कैसे आये, एकजुट कैसे हुए?”
 
 
मौके पर मौजूद ऑल इंडिया किसान सभा के कार्यकर्ता सुरेंद्र ने कहा कि यह मस्जिद करीब 200 साल पुरानी है और बरसात के मौसम में इसकी मरम्मत की जरूरत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थल किसी एक व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज की साझा विरासत का हिस्सा होते हैं। उनके मुताबिक, लोगों का यहां एकत्र होना इसी साझा जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है।
 
सुरेंद्र ने अपना परिचय देते हुए कहा, “मेरा नाम सुरेंद्र है और मैं ऑल इंडिया किसान सभा का कार्यकर्ता हूँ। यहाँ पर जो यह मस्जिद 200 साल पुरानी है...” उन्होंने कहा कि पुरानी इमारत की मरम्मत और उसे सुरक्षित रखने की कोशिश के दौरान लोगों के बीच संवाद और सहयोग की भावना सबसे महत्वपूर्ण है।
 
 
उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और आपसी सम्मान की बात करते हुए कहा, “बार-बार हमने कह लिया उनको, कि भाई कोई मंदिर में जाता है, मस्जिद में जाता है, कोई गुरुद्वारे में जाता है, कोई चर्च में जाता है, सबको निष्ठा का अधिकार है। निजी कहीं भी कोई जा सकता है। आप जैसे मंदिर में जा रहे हो, जैसे राम बोल रहे हो, जो भी बोल रहे हो आप, आपको कौन रोकता है? इनको आप क्यों रोक रहे हो?”
 
सुरेंद्र की बात का मूल संदेश यही था कि भारत की खूबसूरती उसकी विविधता में है और धार्मिक आस्था को लेकर एक-दूसरे के प्रति सम्मान ही सामाजिक शांति की सबसे मजबूत नींव है। किसी व्यक्ति की आस्था चाहे जिस धर्म से जुड़ी हो, उसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना करने और धार्मिक स्थल पर जाने का अधिकार होना चाहिए।
 
इस मौके पर किसानों और विभिन्न समुदायों के लोगों की मौजूदगी ने यह संदेश भी दिया कि सामाजिक मुद्दों पर एकजुटता किसी एक धर्म की सीमा में बंधी हुई नहीं है। जब किसी पुरानी इमारत को संरक्षण और मरम्मत की जरूरत होती है तो उसे सुरक्षित रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाता है।
 
मौजूद लोगों ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी के खिलाफ खड़ा होना नहीं बल्कि सद्भावना और भाईचारे को मजबूत करना है। सुरेंद्र ने कहा, “हम सद्भावना चाहते हैं। देश की एकता चाहते हैं, देश के विकास करने वाले लोग हैं। जब तक सभी धर्मों का सम्मान नहीं होगा, देश का विकास नहीं हो सकता, समाज का विकास नहीं हो सकता, इस बात को लेकर के ना आज यहाँ पर हम तमाम के तमाम लोग इकट्ठे हुए हैं।”
 
यही भावना इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात बनकर सामने आई। मस्जिद की मरम्मत का सवाल धीरे-धीरे सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास की बड़ी तस्वीर से जुड़ गया। मुस्लिम समुदाय के हाजी साहब, इमाम साहब और मुस्लिम समाज एकता समिति से जुड़े सदस्यों के साथ दूसरे समुदायों के लोगों की मौजूदगी ने यह दिखाया कि धार्मिक स्थलों के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना समुदायों के बीच दूरी कम करने का माध्यम बन सकती है।
 
सुरेंद्र ने भविष्य में भी इसी तरह मिलकर काम करने की बात कही। उन्होंने कहा, “भविष्य में हमारी यही कोशिश रहेगी कि तमाम... जो हमारे मुस्लिम भाई हैं, यहाँ पर हाजी साहब हैं, इमाम साहब हैं, हमारे मुस्लिम समाज एकता समिति के सदस्य हैं, तमाम के तमाम यह महसूस न करें, आप यह महसूस करें कि हमारे लाखों-हजारों हाथ हैं।”
 
उन्होंने आगे कहा, “जो हैं इकट्ठे रहेंगे, और जो असामाजिक तत्व हैं, उनको खदेड़ने के लिए सारे काम करेंगे।”
 
इस पूरी पहल का सकारात्मक पहलू यही रहा कि अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग एक जगह बैठकर एक-दूसरे के साथ खड़े नजर आए। यह दृश्य उस सामाजिक ताने-बाने की याद दिलाता है, जिसमें किसी भी समुदाय की परेशानी को केवल उसी समुदाय की समस्या नहीं माना जाता, बल्कि उसे साझा जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है।
 
मौके पर मौजूद लोगों ने अतीत में हुई कुछ घटनाओं का जिक्र भी किया, लेकिन उनका जोर इस बात पर रहा कि ऐसी परिस्थितियों का जवाब सामाजिक एकजुटता, संवाद और कानून के दायरे में रहकर दिया जाना चाहिए। सुरेंद्र ने कुछ साल पहले एक आम व्यापारी के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय भी अलग-अलग लोग एकजुट हुए थे और पुलिस प्रशासन के सामने मामला उठाया गया था।
 
उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं के बावजूद समाज में आपसी भरोसा कायम रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, देश के सामाजिक ढांचे को मजबूत करने में हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग की भूमिका रही है।
 
सुरेंद्र ने कहा, “तो हम यह कहना चाहते हैं कि इस देश के विकास में, हिंदुस्तान की आजादी में, हिंदुस्तान के तमाम जो सामाजिक ढांचा है, उसको बनाने के लिए और चलाने के लिए सभी जातियों का, सभी वर्गों का योगदान है।”
 
200 साल पुरानी मस्जिद की मरम्मत के लिए बारिश के मौसम में एकत्र हुए लोगों की यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर मानवीय जिम्मेदारी की बात करती है। मंदिर में जाने वाला व्यक्ति मस्जिद की इमारत की सुरक्षा के लिए खड़ा हो सकता है, मस्जिद में नमाज पढ़ने वाला व्यक्ति गुरुद्वारे की सेवा में शामिल हो सकता है और अलग-अलग धर्मों के लोग मिलकर किसी साझा विरासत को बचाने की कोशिश कर सकते हैं। यही भारत की सामाजिक विविधता की ताकत है।
 
 

 
 
इस पहल ने यह संदेश दिया कि समाज में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन मतभेदों के बीच भी संवाद और सहयोग की जगह हमेशा बनी रहनी चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान, एक-दूसरे की आस्था के प्रति संवेदनशीलता और जरूरत के समय एक-दूसरे का साथ देना ही सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है।
 
बरसात में जर्जर होती एक पुरानी मस्जिद की मरम्मत का मुद्दा इसलिए एक व्यापक मानवीय संदेश में बदल गया। इमारत किसी एक समुदाय की हो सकती है, लेकिन उसे बचाने की जिम्मेदारी इंसानियत की हो सकती है। मस्जिद में मुस्लिम, हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोगों का एक साथ बैठना इसी साझा भावना की तस्वीर बनकर सामने आया।
 
यह दृश्य बताता है कि भारत की असली ताकत केवल उसकी धार्मिक विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता के बीच एक-दूसरे के लिए खड़े होने की क्षमता में भी है। जब समाज के अलग-अलग वर्ग किसी धार्मिक स्थल की सुरक्षा और संरक्षण के लिए साथ आते हैं, तो वह केवल एक इमारत की मरम्मत नहीं होती, बल्कि आपसी विश्वास, भाईचारे और सामाजिक एकता की नींव को भी मजबूत करती है।
 
मस्जिद की दीवारों और छत को बरसात से बचाने की जरूरत के बीच वहां जुटे विभिन्न समुदायों के लोगों ने एक बड़ी बात कही। देश और समाज का विकास तभी संभव है, जब हर धर्म का सम्मान हो और हर समुदाय खुद को सुरक्षित, सम्मानित और समाज का बराबर हिस्सा महसूस करे। यही भावना इस पूरे घटनाक्रम को एक सकारात्मक और उम्मीद से भरी कहानी बनाती है।