आदि शंकराचार्य से क्यों प्रभावित थे अल्लामा इक़बाल?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-09-2026
Why was Allama Iqbal influenced by Adi Shankaracharya?
Why was Allama Iqbal influenced by Adi Shankaracharya?

 

ग़ौस सिवानी

इक़बाल का नाम सुनते ही उनकी मशहूर नज़्म "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा" याद आती है, लेकिन यह उनके विचारों का केवल एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि इक़बाल एक व्यापक दृष्टि वाले चिंतक थे। उन्होंने हर प्रकार की ज्ञान-परंपराओं और महान व्यक्तित्वों का सम्मान किया, चाहे उनका संबंध किसी भी धर्म से रहा हो।

अल्लामा इक़बाल मूलतः "शायर-ए-इस्लाम" के रूप में पहचाने जाते हैं, लेकिन उनकी वैचारिक दुनिया केवल इस्लामी परंपराओं तक सीमित नहीं थी। उन्होंने विभिन्न धर्मों, सभ्यताओं और दार्शनिक परंपराओं का गहन अध्ययन किया,जहाँ कहीं उन्हें मानवता, आध्यात्मिकता तथा सत्य की खोज दिखाई दी, वहाँ उन्होंने खुले दिल से उसकी सराहना की।

यही कारण है कि उन्होंने केवल इस्लामी हस्तियों ही नहीं, बल्कि हिंदू, बौद्ध, सिख और ईरानी धार्मिक एवं दार्शनिक नेताओं को भी अपनी कविता और गद्य में श्रद्धांजलि अर्पित की।इक़बाल जिन महान व्यक्तित्वों की प्रशंसा करते हैं, उनमें आदि शंकराचार्य भी शामिल हैं, जिन्होंने हिंदू धर्म को संगठित और सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया था।

इसके अतिरिक्त इक़बाल ने भगवान राम, गुरु नानक देव जी और स्वामी रामतीर्थ पर कविताएँ लिखीं, गौतम बुद्ध की शिक्षाओं की प्रशंसा की और अपनी प्रसिद्ध कृति "जावेदनामा" में जरथुस्त्र, ईसा मसीह और गौतम बुद्ध का आदरपूर्वक उल्लेख किया।

इसी प्रकार अपनी मसनवी "असरार-ए-ख़ुदी" की भूमिका में उन्होंने कृष्ण, आदि शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के विचारों पर चर्चा की। इन सभी अवसरों पर इक़बाल ने बौद्धिक ईमानदारी, उदार दृष्टिकोण और वैचारिक सम्मान का परिचय दिया।

उनकी अंग्रेज़ी पुस्तक "The Development of Metaphysics in Persia" (फ़लसफ़ा-ए-अजम) भी इस बात का प्रमाण है कि वे विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं को समझने और उनके सकारात्मक पक्षों को उजागर करने में गहरी रुचि रखते थे।

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शंकराचार्य का दार्शनिक योगदान

फिलहाल हम आदि शंकराचार्य के संबंध में इक़बाल के विचारों की चर्चा कर रहे हैं। इक़बाल ने शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को एक महान बौद्धिक उपलब्धि माना, लेकिन वे उससे पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनके अनुसार शंकराचार्य का अद्वैतवाद व्यक्ति की विशिष्टता और स्वतंत्र सत्ता को कमज़ोर कर देता है, जबकि इक़बाल का फ़लसफ़ा-ए-ख़ुदी व्यक्ति की स्वतंत्र, रचनात्मक और सक्रिय व्यक्तित्व-शक्ति पर बल देता है।

इसी कारण इक़बाल शंकराचार्य की बौद्धिक महानता के प्रशंसक हैं, लेकिन दार्शनिक दृष्टि से उनसे मतभेद भी रखते हैं। दूसरी ओर, वे इब्न अरबी के वहदत-उल-वजूद (अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत को अपेक्षाकृत सकारात्मक रूप से देखते हैं, जबकि अनेक विद्वानों का मानना है कि इब्न अरबी के वहदत-उल-वजूद और शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में काफी समानताएँ पाई जाती हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इब्न अरबी से कई शताब्दियों पहले शंकराचार्य का काल था।

आदि शंकराचार्य कौन थे?

आदि शंकराचार्य आठवीं शताब्दी के महान भारतीय दार्शनिक और आध्यात्मिक सुधारक थे, जिन्होंने अद्वैत वेदांत को संगठित और व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उनके अनुसार ब्रह्मांड की अंतिम और वास्तविक सत्ता केवल ब्रह्म है, जबकि दृश्य जगत की विविधता एक अस्थायी और मायिक अभिव्यक्ति है।

शंकराचार्य ने अपना जीवन भारत के विभिन्न भागों की यात्राओं, दार्शनिक वाद-विवादों, ग्रंथ-रचना और आध्यात्मिक केंद्रों की स्थापना में बिताया। उनकी यात्राओं का एक महत्वपूर्ण पड़ाव कश्मीर था, जो उस समय संस्कृत विद्या, तत्त्वमीमांसा और आध्यात्मिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र माना जाता था।

कश्मीर में शंकराचार्य की उपस्थिति आज भी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्मारकों के रूप में सुरक्षित है। कश्मीर की धरती पहले से ही शैव तंत्र और बाद में विकसित हुए कश्मीरी शैववाद की अद्वैत परंपरा का केंद्र थी। शंकराचार्य के आगमन ने वहाँ एक महत्वपूर्ण वैचारिक संवाद को जन्म दिया।

अद्वैत वेदांत और कश्मीरी शैववाद दोनों ही अद्वैत दर्शन हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण में अंतर है। शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म एक निराकार, निर्गुण और परम सत्य है, जबकि कश्मीरी शैववाद परम सत्य को शिव के रूप में देखता है, जो चेतना, सृजन और अभिव्यक्ति का स्रोत है।

आदि शंकराचार्य की व्यक्तित्व और दर्शन को अल्लामा इक़बाल ने इसी व्यापक संदर्भ में देखा। यद्यपि इक़बाल के फ़लसफ़ा-ए-ख़ुदी और इस्लामी तौहीद की अवधारणा में व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता, उसकी इच्छा-शक्ति और रचनात्मक क्षमता को मूल महत्व प्राप्त है, जबकि शंकराचार्य का दर्शन व्यक्ति और ब्रह्मांड को एक ही परम सत्य की अभिव्यक्ति मानता है, फिर भी इक़बाल ने शंकराचार्य की बौद्धिक उपलब्धि को स्वीकार किया। वे उन्हें भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा के प्रतिनिधि चिंतक के रूप में देखते हैं, जिन्होंने सत्य की एकता के विचार को दार्शनिक आधार प्रदान किया।

इक़बाल लिखते हैं:"जिस अरूस-ए-मआनी को श्रीकृष्ण और श्रीराम, रामानुज बेनक़ाब करना चाहते थे, श्री शंकर के मन्तिकी तिलिस्म ने उसे महजूब कर दिया और श्रीकृष्ण की क़ौम उनकी तजदीद के समर से महरूम रह गई।"(दीबाचा-ए-असरार-ए-ख़ुदी)

इक़बाल की इस टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि वे शंकराचार्य को एक महान तर्कशास्त्री मानते थे। उनकी अन्य रचनाओं से भी पता चलता है कि वे शंकराचार्य के विचारों को अत्यंत गहन और सूक्ष्म समझते थे। इक़बाल लिखते हैं:"

जिस नुक्ता-ए-ख़याल से श्री शंकर ने गीता की तफ़्सीर की, उसी नुक्ता-ए-ख़याल से शैख़ मुह्युद्दीन इब्न अरबी अंदलुसी ने क़ुरआन शरीफ़ की तफ़्सीर की, जिसने मुसलमानों के दिलो-दिमाग़ पर निहायत गहरा असर डाला है।"(दीबाचा-ए-असरार-ए-ख़ुदी)

वास्तव में इक़बाल का आशय यह था कि जिस प्रकार शंकराचार्य ने गीता की व्याख्या के माध्यम से अद्वैत अथवा समस्त सृष्टि में ईश्वर की उपस्थिति का बोध कराने का प्रयास किया, उसी प्रकार बाद के युग में इब्न अरबी ने वहदत-उल-वजूद (अस्तित्व की एकता) का दर्शन प्रस्तुत किया। इन दोनों विचारधाराओं में एक समानता यह है कि दोनों ही सृष्टि के कण-कण में ईश्वर के प्रकाश का दर्शन करती हैं।

अल्लामा इक़बाल प्रारंभ से ही शंकराचार्य के दर्शन का अध्ययन करते रहे थे। साथ ही उन्होंने इब्न अरबी के विचारों का भी गहन अध्ययन किया। शोधकर्ताओं के अनुसार प्रारंभिक दौर में उन्हें दोनों के विचार लगभग एक जैसे प्रतीत होते थे, लेकिन बाद में उन्होंने इनके बीच का अंतर समझा।

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इस विषय पर विद्वान मैकश अकबराबादी लिखते हैं:"इक़बाल ने अपने आरंभिक काल में कहा था कि ‘तसव्वुफ़ नव-अफलातूनियत (Neo-Platonism) से प्रभावित है और इब्न अरबी तथा शंकराचार्य समान विचारधारा रखते हैं।’

इसका अर्थ यह था कि वे वहदत-उल-वजूद के संबंध में इन तीनों विचारधाराओं को एक ही दिशा का मानते थे। किंतु बाद में जब उन्हें अनुभव हुआ कि शंकर का दर्शन ‘नफ़ी-ए-ख़ुदी’ (स्वत्व के निषेध) की ओर ले जाता है, जबकि शैख़ अकबर (इब्न अरबी) संसार को भ्रम नहीं बल्कि ‘मज़हर-ए-हक़’ (ईश्वर की अभिव्यक्ति) मानते हैं, तब वहदत-उल-वजूद के प्रति उनकी प्रतिक्रिया में परिवर्तन आ गया।"(नक़्द-ए-इक़बाल, मक्तबा जामिआ लिमिटेड, नई दिल्ली, 1964, पृष्ठ 78)

इक़बाल कहीं शंकराचार्य से सहमति व्यक्त करते हैं तो कहीं सम्मानपूर्वक असहमति भी जताते हैं। वास्तव में उनके अनुसार विभिन्न धर्मों और दर्शन-परंपराओं का अध्ययन पूर्वाग्रह के बजाय समझ और संवाद का माध्यम होना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने शंकराचार्य सहित अनेक गैर-मुस्लिम चिंतकों का उल्लेख अत्यंत सम्मान के साथ किया।

इक़बाल के यहाँ किसी विशेष धार्मिक पहचान से अधिक महत्व मनुष्य की आध्यात्मिक खोज, सत्य की तलाश और नैतिक उन्नति को प्राप्त है। शंकराचार्य के जीवन और चिंतन में उन्हें यही तत्व विशेष रूप से दिखाई देते हैं।

समग्र रूप से देखा जाए तो इक़बाल और आदि शंकराचार्य, भले ही दो भिन्न धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं के प्रतिनिधि हों, फिर भी वे एक साझा धरातल पर मिलते हैं—परम सत्य की खोज, मनुष्य के आंतरिक विकास और आध्यात्मिक चेतना के जागरण के धरातल पर।

जहाँ इक़बाल ने इस्लामी चिंतन की रोशनी में ख़ुदी, गति और सृजनशीलता का दर्शन प्रस्तुत किया, वहीं शंकराचार्य ने अद्वैत और परम एकत्व की व्याख्या की। इन दोनों महान चिंतकों का अध्ययन भारतीय उपमहाद्वीप की बौद्धिक परंपरा में संवाद, सहिष्णुता और वैचारिक व्यापकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।