ग़ौस सिवानी
हिंदुस्तान की धरती ने अनेक महान सूफ़ी, संत, विचारक और विद्वान पैदा किए हैं, जिन्होंने दुनिया को शांति, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। उनमें गुरु नानक जी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने भेदभाव मिटाने के लिए सार्थक प्रयास किए और समाज में एक नई चेतना जगाई। उनके काम की हर दौर के विद्वानों ने सराहना की और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
अल्लामा इक़बाल भी गुरु नानक जी के प्रशंसकों में थे। उन्होंने गुरु नानक जी की महानता को सम्मान देने के लिए एक प्रसिद्ध कविता लिखी। यह कविता आज भी उतनी ही लोकप्रिय है और धार्मिक सद्भाव, समानता, भाईचारे और ऊँचे नैतिक मूल्यों का संदेश देती है। आइए, पहले जानें कि गुरु नानक जी कौन थे, जिनकी अल्लामा इक़बाल ने इतनी प्रशंसा की।

गुरुनानक जी कौन थे?
गुरु नानक जी हिंदुस्तान के महान आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक और कवि थे। उन्हें सिख धर्म का संस्थापक माना जाता है और वे पहले सिख गुरु हैं। उन्होंने दुनिया के अनेक क्षेत्रों की यात्राएँ कीं और लोगों को "एक ओंकार", यानी एक ईश्वर की उपासना का संदेश दिया।
इसी विचार के आधार पर उन्होंने ऐसा आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया, जो समानता, भाईचारे, भलाई और उच्च नैतिक मूल्यों पर आधारित था। उनकी शिक्षाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में सुरक्षित हैं।
गुरु नानक जी का जन्म पंजाब के ननकाना साहिब में हुआ, जो देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान में है। उनकी जन्मस्थली पर आज एक भव्य गुरुद्वारा है, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। उनकी जन्मतिथि 15अप्रैल 1469मानी जाती है और इसी दिन गुरु पर्व मनाया जाता है। सिख परंपरा के अनुसार 22सितंबर 1539को 70वर्ष, 5महीने और 7दिन की आयु में उनका निधन हुआ।
गुरु नानक जी के परिवार के मुसलमानों से अच्छे संबंध थे। उनके पिता कल्याण चंद दास बेदी (मेहता कालू) एक मुस्लिम ज़मींदार राय बुलार के अधीन काम करते थे। उनकी माता की देखभाल दौलत नाम की एक मुस्लिम दाई ने की थी। उनके बचपन के घनिष्ठ मित्र भाई मरदाना मुसलमान थे और रबाब बजाते थे। बाद में वे गुरु नानक जी की यात्राओं और प्रचार कार्यों में हमेशा उनके साथ रहे।
जब गुरु नानक जी नौ वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उन्हें मुस्लिम विद्वान मौलवी सैयद हसन के पास शिक्षा के लिए भेजा। वहाँ उन्होंने फ़ारसी, अरबी और इस्लामी साहित्य का अध्ययन किया। उनके बहनोई जय राम, लाहौर के गवर्नर दौलत ख़ान लोदी के यहाँ नौकरी करते थे। इन सभी बातों से पता चलता है कि उनके परिवार के मुसलमानों के साथ अच्छे और सम्मानजनक संबंध थे।
गुरु नानक जी बचपन से ही समाज सुधार की भावना रखते थे। लगभग आठ वर्ष की आयु में जब उनका मुंडन और जनेऊ संस्कार होना था, तब उन्होंने जनेऊ पहनने और मुंडन कराने से इनकार कर दिया।
इसी उम्र से उन्होंने कविताएँ भी लिखनी शुरू कर दी थीं। उनकी रचनाएँ आध्यात्मिक भाव से भरी हुई थीं, जिनमें से कुछ आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं।बड़े होने पर उनका विवाह माता सुलखनी से हुआ। उन्होंने अपने बहनोई के साथ सरकारी अनाज भंडार में नौकरी भी की। यहीं उनके दो पुत्रों का जन्म हुआ।
इक़बाल की कविता "नानक"
अल्लामा इक़बाल गुरु नानक जी के संदेश से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता "नानक" में गुरु नानक जी की महान सेवाओं को श्रद्धांजलि दी है। इस कविता में इक़बाल ने गुरु नानक जी को हिंदुस्तान की आध्यात्मिक जागृति और एकेश्वरवाद के महान प्रचारक के रूप में प्रस्तुत किया है।
कविता में वे गौतम बुद्ध, उस समय के भारतीय समाज, जाति व्यवस्था और गुरु नानक जी के सुधार आंदोलन का उल्लेख करते हैं। अंत में वे गुरु नानक जी की शिक्षाओं को ईश्वर की एकता का संदेश बताते हैं।
क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न की
क़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक दाना की
इक़बाल कहते हैं कि हिंदुस्तान के लोगों ने गौतम बुद्ध की महान शिक्षाओं का सम्मान नहीं किया। गौतम बुद्ध एक अनमोल रत्न की तरह थे, लेकिन लोग उनकी महानता को समझ नहीं सके। बुद्ध का संदेश इंसानियत, समानता, दया और अच्छे आचरण पर आधारित था। हालांकि बाद के समय में कई राजाओं ने बौद्ध धर्म अपनाया और उसका प्रचार भी किया, जिससे आम लोगों में भी उसका प्रभाव बढ़ा।
आह बदक़िस्मत रहे आवाज़-ए-हक़ से बेख़बर
ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर
इस शेर में इक़बाल अफसोस जताते हैं कि लोग सत्य की आवाज़ को पहचान नहीं सके। जैसे कोई पेड़ अपने फल की मिठास नहीं जानता, वैसे ही हिंदुस्तान अपने महान संतों और उनकी शिक्षाओं का सही मूल्य नहीं समझ पाया। यहाँ इक़बाल ने गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को सत्य की आवाज़ कहा है।
आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था
हिंद को लेकिन ख़याली फ़लसफ़ा पर नाज़ था
इक़बाल के अनुसार गौतम बुद्ध ने जीवन के असली रहस्यों और दुखों का समाधान लोगों के सामने रखा। उन्होंने बताया कि दुखों से मुक्ति कैसे मिल सकती है। लेकिन उस समय का समाज इन व्यावहारिक शिक्षाओं को अपनाने के बजाय कल्पनाओं और दार्शनिक बहसों में उलझा रहा। इसलिए बुद्ध की शिक्षाओं का पूरा लाभ समाज को नहीं मिल सका।
शम्अ-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी
बारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थी
इक़बाल कहते हैं कि गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ सत्य और प्रकाश का स्रोत थीं, लेकिन उस समय का समाज उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। वे इसे बारिश और ज़मीन की मिसाल देकर समझाते हैं कि कृपा तो बरसी, लेकिन ज़मीन इतनी उपजाऊ नहीं थी कि उसका लाभ उठा सके।
आह शूद्र के लिए हिंदोस्ताँ ग़मख़ाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है
इस शेर में इक़बाल जाति व्यवस्था की कठोर आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि शूद्रों और समाज के निचले वर्गों का जीवन दुख और अन्याय से भरा हुआ था। समाज में इंसानियत और सहानुभूति की कमी थी और कमजोर लोगों के दुख-दर्द की किसी को चिंता नहीं थी।
बरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार में
शम्अ-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़यार में
इक़बाल कहते हैं कि समाज का ऊँचा तबका आज भी घमंड और ऊँच-नीच की सोच में डूबा हुआ है, जबकि गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को दूसरे देशों ने ज़्यादा अपनाया। बौद्ध धर्म हिंदुस्तान से निकलकर चीन, जापान, श्रीलंका और कई दूसरे देशों में फैल गया, लेकिन अपने ही देश में उसे वह सम्मान नहीं मिला।
बुतकदा फिर बाद मुद्दत के मगर रोशन हुआ
नूर-ए-इब्राहीम से आज़र का घर रोशन हुआ
यहाँ इक़बाल ने "नूर-ए-इब्राहीम" का इस्तेमाल एक प्रतीक के रूप में किया है, जिसका मतलब है एक ईश्वर की सच्ची राह की रोशनी। इस शेर में वे गुरु नानक जी के जन्म की ओर इशारा करते हैं।
उनका कहना है कि भले ही गौतम बुद्ध के संदेश को लोगों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और हिंदुस्तान लंबे समय तक उस आध्यात्मिक रोशनी से दूर रहा, लेकिन बाद में इसी धरती पर फिर से एक ईश्वर का संदेश फैलने लगा। "आज़र का घर" मूर्ति पूजा का प्रतीक है, जिसे हज़रत इब्राहीम की एकेश्वरवाद की शिक्षा ने रोशन किया था। उसी तरह गुरु नानक जी के आने से हिंदुस्तान में फिर एक नई आध्यात्मिक जागृति पैदा हुई।
फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से
हिंद को इक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से
यह इस पूरी कविता का सबसे अहम शेर है। इक़बाल के अनुसार पंजाब की धरती से गुरु नानक जी ने एक ईश्वर, बराबरी, मोहब्बत और इंसानियत का संदेश दिया। उन्होंने हिंदुस्तान को जात-पात, धार्मिक कट्टरता और आध्यात्मिक बेख़बरी से बाहर निकालने की कोशिश की। इक़बाल गुरु नानक जी को "मर्द-ए-कामिल" यानी एक महान और पूर्ण इंसान कहकर उनकी आध्यात्मिक महानता और समाज सुधार के काम की तारीफ़ करते हैं।
इस कविता में अल्लामा इक़बाल ने दो महान समाज सुधारकों, गौतम बुद्ध और गुरु नानक जी का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार गौतम बुद्ध ने इंसानियत, अच्छे आचरण और आत्मिक पवित्रता का संदेश दिया, लेकिन हिंदुस्तान ने उनकी बात की सही कद्र नहीं की।
बाद में गुरु नानक जी ने पंजाब से एक ईश्वर, बराबरी, भाईचारे और इंसानियत का संदेश फैलाया। उन्होंने जात-पात, धार्मिक भेदभाव और समाज में हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई। इक़बाल के अनुसार गुरु नानक जी ने हिंदुस्तान की सोई हुई चेतना को जगाने की कोशिश की, इसलिए वे उन्हें "मर्द-ए-कामिल" कहते हैं।

गुरु नानक और इक़बाल
अल्लामा इक़बाल गुरु नानक जी के संदेश को एक ईश्वर का संदेश मानते हैं। यह सच है कि गुरु नानक जी और इक़बाल दो अलग-अलग धार्मिक और वैचारिक परंपराओं से जुड़े थे, लेकिन इसके बावजूद इक़बाल ने गुरु नानक जी के काम की अहमियत को समझा और उसका सम्मान किया। यह भी एक दिलचस्प बात है कि गुरु नानक जी और इक़बाल, दोनों का संबंध पंजाब से था। दोनों की मातृभाषा पंजाबी थी और दोनों का जन्म नवंबर महीने में हुआ था।
गुरु नानक जी और इक़बाल के विचारों में कई समान बातें भी मिलती हैं। दोनों ने लोगों को एक ईश्वर की ओर बुलाया और समाज की जमी हुई पुरानी सोच से बाहर निकलने की बात कही। गुरु नानक जी ने पंजाब में ऊँच-नीच और छुआछूत खत्म करने के लिए लंबे समय तक काम किया। वहीं, इक़बाल ने भी अपनी शायरी के ज़रिए बराबरी और इंसानियत का संदेश दिया। दोनों ने अच्छे चरित्र, इंसानियत और आध्यात्मिक जीवन पर ज़ोर दिया।
गुरु नानक जी ने एक ईश्वर की पूजा, उसका स्मरण और समाज की सेवा को जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बताया। इसी तरह इक़बाल ने भी इंसान की असली कामयाबी ईश्वर से जुड़ने, उसके प्रेम और उसकी इबादत में मानी।
गुरु नानक जी एक बड़े समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने समय की कई बुराइयों के खिलाफ संघर्ष किया। इक़बाल ने भी इन बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई और खास तौर पर मुसलमानों से कहा कि वे अपने अच्छे अतीत से सीख लें, इस्लामी नैतिकता को अपनाएँ और साथ ही आधुनिक शिक्षा भी हासिल करें।
दोनों पर सूफ़ी विचारों का भी असर था। गुरु नानक जी की शिक्षा में सूफ़ी सोच की साफ़ झलक मिलती है और उनके अनुयायियों ने भी उसे अपनाया। इसी वजह से अमृतसर के गोल्डन टेंपल की नींव रखने के लिए एक मुस्लिम फ़क़ीर को बुलाया गया था।
आज भी सिख समाज में लंगर और सेवा की परंपरा जारी है। दूसरी ओर, इक़बाल भी सूफ़ियों से बहुत प्रभावित थे। वे ख़ानक़ाहों में रहने वाले लोगों से कहते थे कि वे केवल एक जगह बैठकर न रहें, बल्कि समाज में उतरकर काम करें। वे दिल की सफ़ाई, सच्ची नीयत और अच्छे कर्म पर हमेशा ज़ोर देते रहे। हालांकि इन समानताओं के बावजूद, गुरु नानक जी और इक़बाल के धार्मिक विचारों में कई महत्वपूर्ण अंतर भी थे।