ग़ौस सिवानी
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर,
मर्द-ए-नादाँ पर कलाम-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक बे-असर।
अल्लामा इक़बाल ने इस बात को अपनी मशहूर किताब ‘बाल-ए-जिब्रील’में जगह दी है। उन्होंने यह भी लिखा है कि यह ख़याल संस्कृत के बड़े कवि भर्तृहरि की सोच से लिया गया है।उर्दू पढ़ने वाले ज़्यादातर लोग संस्कृत के कवियों के बारे में ज़्यादा नहीं जानते। लेकिन जो लोग इक़बाल को पढ़ते हैं, वे भर्तृहरि का नाम ज़रूर सुनते हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज भारत से ज़्यादा यूरोप और दूसरे पश्चिमी देशों में भर्तृहरि पर रिसर्च हो रही है और उनकी किताबों का कई भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है।
भर्तृहरि इक़बाल के बहुत पसंदीदा कवियों में थे। इक़बाल ने अपनी फ़ारसी किताबों में भी उनका बड़े सम्मान से ज़िक्र किया है। आज बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि भर्तृहरि कौन थे, कब हुए और उन्होंने क्या लिखा। यह भी सवाल उठता है कि आख़िर इक़बाल जैसे बड़े शायर को इतने पुराने ज़माने के इस कवि में ऐसी क्या बात नज़र आई कि उन्होंने बार-बार उनका ज़िक्र किया।
.jpg)
भर्तृहरि कौन थे?
भर्तृहरि संस्कृत के बहुत बड़े कवि माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ भारत की पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं। उनकी किताबों का दुनिया की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। माना जाता है कि इक़बाल ने भी उन्हें पढ़ा था और उनसे काफ़ी प्रभावित हुए थे।
विद्वानों के मुताबिक़ भर्तृहरि ने ज़िंदगी के कई अलग-अलग पहलुओं पर लिखा। उनके नाम से तीन मशहूर किताबें जुड़ी हुई हैं—नीति शतक, श्रृंगार शतक और वैराग्य शतक। इन तीनों को मिलाकर "शतकत्रयी" कहा जाता है।
नीति शतक में अच्छी ज़िंदगी कैसे जी जाए, सही-गलत की पहचान और इंसान के अच्छे बर्ताव की बातें हैं।श्रृंगार शतक में प्यार, ख़ूबसूरती, जवानी और इंसानी जज़्बात का ज़िक्र है।वैराग्य शतक में दुनिया की नाशवान ज़िंदगी, मोह-माया से दूर रहने और मन की शांति जैसी बातें कही गई हैं।
भर्तृहरि की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उन्होंने बहुत आसान और असरदार भाषा में लिखा। इसी वजह से सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी लोग आज उनकी रचनाएँ पढ़ते हैं। उनके जीवन के बारे में पक्की जानकारी बहुत कम मिलती है।
माना जाता है कि वे पाँचवीं से सातवीं सदी के बीच किसी समय हुए थे। कुछ लोग उन्हें एक राजा बताते हैं, जबकि कुछ का कहना है कि वे किसी राजा के दरबार के कवि थे। एक मशहूर कहानी यह भी है कि किसी स्त्री की बेवफ़ाई से दुखी होकर उन्होंने दुनिया छोड़ दी और आध्यात्मिक जीवन अपना लिया। हालांकि इन बातों के पक्के सबूत नहीं हैं।
उर्दू पर भी रहा असर
सिर्फ़ इक़बाल ही नहीं, उर्दू के कई शायर और विद्वान भी भर्तृहरि से प्रभावित रहे। मिर्ज़ा जाफ़र अली ख़ाँ असर लखनवी, बाबू गोरीशंकर लाल अख़्तर, रघुवेंद्र राव जज़्ब और हसन नईम जैसे लोगों ने उनकी रचनाओं का अनुवाद किया या उनसे प्रेरणा ली।भर्तृहरि के श्लोकों का अंग्रेज़ी समेत यूरोप की कई भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है और आज भी उन पर लगातार शोध हो रहा है।
इक़बाल और भर्तृहरि की कल्पना में मुलाक़ात
अपनी मशहूर फ़ारसी किताब "जावेद नामा" में इक़बाल ने एक कल्पना की है कि वे जन्नत में भर्तृहरि से मिलते हैं। इस पूरे प्रसंग में उन्होंने भर्तृहरि का बहुत सम्मान के साथ ज़िक्र किया है और उन्हें भारत का महान कवि बताया है।
मूल फ़ारसी पंक्तियाँ (देवनागरी में)
हूरियाँ रा दर क़ुसूर ओ दर ख़ियाम
नालए-ए-मन दावत-ए-सोज़-ए-तमाम
आँ यके अज़ ख़ैमा सर बेरूँ कशीद
वाँ दिगर अज़ ग़ुरफ़ा रुख़ बिनमूद ओ दीद
हर दिले रा दर बहिश्त-ए-जाविदाँ
दादम अज़ दर्द ओ ग़म-ए-आँ ख़ाकदाँ
ज़ेर-ए-लब ख़ंदीद पीर-ए-पाकज़ाद
गुफ़्त ऐ जादूगर-ए-हिन्दी-निज़ाद
आँ नवा-परदाज़-ए-हिन्दी रा निगर
शबनम अज़ फ़ैज़-ए-निगाह-ए-ऊ गुहर
इस नज़्म में भर्तृहरि के साथ एक लंबा संवाद है। इसमें भर्तृहरि के बारे में इक़बाल के विचार मौलाना जलालुद्दीन रूमी और ख़ुद इक़बाल की ज़बान से सामने आते हैं। उनका सीधा-सा मतलब कुछ इस तरह है: वह बड़े गहरे विचारों वाले कवि हैं, जिनका नाम भर्तृहरि है। उनका स्वभाव ऐसे बादल की तरह है जो सब पर बराबर कृपा बरसाता है।
उन्होंने दुनिया के बाग़ से सिर्फ़ ताज़ा खिली हुई कलियाँ ही चुनी हैं। तुम्हारे गीत ने उन्हें हमारी तरफ़ खींच लिया है।वह ऐसे बादशाह हैं जिनकी आवाज़ बहुत बुलंद है। फ़क़ीरी और वैराग्य में भी उनका दर्जा बहुत ऊँचा है।
वह अपनी गहरी सोच से ऐसे सुंदर विचार सामने रखते हैं कि केवल दो शब्दों में अर्थ की पूरी दुनिया समेट देते हैं।उन्हें ज़िंदगी के भेद अच्छी तरह मालूम हैं। वह मानो जमशेद हैं और उनका कलाम जाम-ए-जम की तरह है, जिसमें सारे राज़ दिखाई देते हैं। हम उनके सम्मान में खड़े हो गए और फिर उनसे बातचीत शुरू हुई।
इसके बाद इक़बाल ने भर्तृहरि से पूछा:"ऐ हिकमत की बातें कहने वाले! पूरब ने तुम्हारी वाणी से ज़िंदगी के राज़ पहचाने हैं। मुझे बताओ कि शायरी में यह दर्द और यह तड़प कहाँ से आती है? क्या यह इंसान की अपनी 'ख़ुदी' से पैदा होती है या फिर ख़ुदा की तरफ़ से मिली हुई नेमत है?"
इस पर भर्तृहरि जवाब देते हैं:"दुनिया में कोई नहीं जानता कि एक सच्चे शायर की असली मंज़िल क्या होती है। उसका राज़ तो उसके गीतों के सुर और लय में छिपा रहता है। उसके सीने में जो गर्म और बेचैन दिल होता है, वह ख़ुदा के सामने भी चैन से नहीं ठहरता।हमारी रूह की असली ख़ुशी लगातार तलाश करते रहने में है। शायरी का दर्द भी इसी चाह और खोज से पैदा होता है।
ऐ शायरी की मस्ती में डूबे रहने वाले! अगर तुझे भी यह ऊँचा मुक़ाम मिल जाए, तो तू सिर्फ़ दो शेरों से इस दुनिया में रहते हुए भी जन्नत की हूरों के दिल जीत सकता है।"
इसके बाद इक़बाल कहते हैं:"मैंने हिंदुस्तान के लोगों को बेचैन और परेशान देखा है। ऐसा लगता है कि अब सच को खुलकर कहने का समय आ गया है।"
फिर भर्तृहरि जवाब देते हैं:"पत्थर और ईंट से बने इन कमज़ोर देवताओं को छोड़ दो। एक ऐसी महान सच्चाई भी है, जो मंदिर और अग्नि-मंदिर, दोनों से कहीं ऊपर है।
दिल की लगन और सच्चे प्रेम के बिना किया गया सज्दा या पूजा बेजान होता है। वह अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ज़िंदगी का नाम ही कर्म है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा।मैं तुमसे एक ऐसी बात कहता हूँ, जिसे हर कोई नहीं जानता। भाग्यशाली है वह इंसान, जिसके दिल पर यह सच्चाई लिख दी गई हो।
यह दुनिया, जैसी तुम उसे देखते हो, सीधे-सीधे ईश्वर की बनाई हुई चीज़ नहीं है। यह आकाश भी तुम्हारा है और वह सूत भी, जिसे तुम अपनी तकली पर कातते हो।इसलिए कर्म के फल के नियम को स्वीकार करो। स्वर्ग, नरक और इनके बीच की अवस्थाएँ भी इंसान अपने कर्मों से ही बनाता है।"

भर्तृहरि के बारे में इक़बाल ने "जावेद नामा" में और भी बहुत कुछ लिखा है। यहाँ केवल संक्षेप में उसका उल्लेख किया गया हैI संस्कृत के इतने प्राचीन कवि के बारे में इक़बाल ने जिस सम्मान और आदर के साथ लिखा है, उससे साफ़ पता चलता है कि वे भारत की ज्ञान और सांस्कृतिक परंपरा के इस महान व्यक्तित्व को कितनी ऊँची नज़र से देखते थे।
इक़बाल की ये बातें उनके उस मूल दर्शन को भी सामने लाती हैं कि इंसान की असली महानता धन और सत्ता में नहीं, बल्कि अपने मन पर काबू पाने, इच्छाओं का त्याग करने और ख़ुद पर शासन करने में है। यही बात उन्होंने भर्तृहरि के माध्यम से कही है।
इक़बाल ने भर्तृहरि को एक ऐसे दार्शनिक, कवि और दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में पेश किया है, जिसकी कविता बहुत कम शब्दों में गहरे अर्थ समेट लेती है। उनके अनुसार भर्तृहरि का काव्य उसी तरह जीवन के रहस्यों को खोलता है, जैसे मान्यता है कि "जाम-ए-जम" में पूरी दुनिया का हाल दिखाई देता था।
इक़बाल ने भर्तृहरि का ज़िक्र करते हुए अपने समय के हिंदुस्तान की स्थिति की ओर भी संकेत किया है। उस समय देश अंग्रेज़ों के शासन में था। इसीलिए उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से हिंदुस्तान के लोगों को जागने, अपने भीतर की ताक़त पहचानने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का संदेश भी दिया।