नसरीन शेख: गलियों से खो-खो के मैदान तक, संघर्ष के बीच बनीं अर्जुन अवॉर्डी

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 08-09-2026
Nasreen Shaikh: From the streets to the Kho-Kho arena—an Arjuna Awardee forged through struggle.
Nasreen Shaikh: From the streets to the Kho-Kho arena—an Arjuna Awardee forged through struggle.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

सुबह के पांच बजे दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती एक लड़की को कभी लोग सवालों की नजर से देखते थे। कोई पूछता था कि इतनी सुबह वह घर से बाहर क्यों निकलती है, तो कोई उसके खेल और पहनावे को लेकर परिवार से सवाल करता था। लेकिन शकूरपुर की नसरीन शेख ने इन आवाजों को अपनी मंजिल के बीच नहीं आने दिया। जिस खेल को कभी गंभीर करियर का विकल्प तक नहीं माना जाता था, उसी खो-खो ने उन्हें भारतीय महिला टीम की कप्तान बनाया, देश को अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक दिलाया और आखिरकार 2023 के अर्जुन अवॉर्ड तक पहुंचाया।

खिलाड़ी का परिचय

नसरीन शेख का जन्म 7 नवंबर 1998 को दिल्ली के शकूरपुर में हुआ। वह भारतीय महिला खो-खो टीम की पूर्व कप्तान हैं और देश की उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं जिन्होंने खो-खो को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें खो-खो में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 2023 का अर्जुन अवॉर्ड प्रदान किया गया। वह इस सम्मान को हासिल करने वाली खो-खो की दूसरी खिलाड़ी बनीं। नसरीन ने दिल्ली के कोहाट एन्क्लेव स्थित सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने शारीरिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा हासिल की।

शुरुआती जीवन और संघर्ष

नसरीन की खेल यात्रा बहुत छोटी उम्र में शुरू हो गई थी। वह तीसरी कक्षा में थीं, जब उनकी शिक्षिका ने उनकी तेज दौड़ने की क्षमता को पहचाना और उन्हें खो-खो खेलने के लिए प्रेरित किया। छठी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते वह स्कूल स्तर से आगे राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी थीं। लेकिन उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। उनके पिता मोहम्मद गफूर साप्ताहिक बाजारों में स्टील के बर्तन बेचते थे। परिवार बड़ा था और खेल के लिए जरूरी पोषण तथा प्रशिक्षण का खर्च जुटाना आसान नहीं था। नसरीन ने खुद बताया था कि उनके पिता उनकी डाइट का खर्च पूरा करने के लिए बेहद मेहनत करते थे।

नसरीन के लिए मुश्किल सिर्फ आर्थिक नहीं थी। एक लड़की के सुबह-सुबह खेल के लिए घर से निकलने और खेल की पोशाक पहनने को लेकर आसपास के लोगों की टिप्पणियां भी परिवार को सुननी पड़ती थीं। लेकिन उनके पिता ने बेटी का साथ दिया और नसरीन ने भी यह तय कर लिया कि लोगों की बातें उनकी रफ्तार को नहीं रोकेंगी।

खो-खो के मैदान से राष्ट्रीय टीम तक

नसरीन ने कठिन परिस्थितियों में अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। शुरुआती दिनों में वह मिट्टी के मैदानों पर लड़कों के साथ अभ्यास करती थीं। लड़कों की तुलना में शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण कई बार उन्हें चोटें भी लगती थीं, लेकिन इसी अभ्यास ने उनकी गति, फुर्ती और खेल की समझ को मजबूत किया। धीरे-धीरे वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगीं। उनके नाम करीब 40 राष्ट्रीय खिताब होने की जानकारी भी सामने आई है। खो-खो के साथ उन्होंने एथलेटिक्स में भी अपनी प्रतिभा दिखाई और स्कूल स्तर पर 100 मीटर तथा 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीते।

कप्तानी में भारत को मिला ऐतिहासिक स्वर्ण

नसरीन के करियर का सबसे बड़ा मोड़ 2019 दक्षिण एशियाई खेलों में आया। उन्होंने भारतीय महिला खो-खो टीम की कप्तानी की और भारत ने स्वर्ण पदक जीता। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी 2019 काठमांडू दक्षिण एशियाई खेलों में उनके स्वर्ण पदक का उल्लेख है। यह जीत नसरीन के लिए सिर्फ एक पदक नहीं थी। उनके परिवार के लिए यह वर्षों की मेहनत का परिणाम था और उनके लिए यह साबित करने का मौका भी कि खो-खो में भी एक खिलाड़ी देश के लिए बड़ा सम्मान हासिल कर सकता है।

अर्जुन अवॉर्डी नसरीन शेख बड़ी बहन का खो-खो सपना पूरा कर रही हैं

जब चैंपियन खिलाड़ी के घर में राशन की चिंता थी

नसरीन की कहानी का सबसे भावुक पक्ष यह है कि देश के लिए स्वर्ण जीतने के बाद भी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद मुश्किल रही। कोरोना महामारी के दौरान उनके पिता का बर्तन बेचने का काम लगभग बंद हो गया। परिवार के सामने राशन तक की समस्या आ गई थी। उस समय नसरीन ने अपनी डाइट और परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर मदद की गुहार लगाई थी। उस समय उन्हें खो-खो फेडरेशन, एक एनजीओ और अन्य स्तरों से आर्थिक मदद मिली। इससे यह सवाल भी सामने आया कि देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को अपने बुनियादी खर्चों के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है। नसरीन ने हालांकि मुश्किल समय में भी ट्रेनिंग नहीं छोड़ी। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने घर की छत और आसपास के पार्कों में अभ्यास किया। वह आसपास के बच्चों को इकट्ठा करके उनके साथ खो-खो खेलती थीं, ताकि अपनी गति और तालमेल को बनाए रख सकें।

एशियाई चैंपियनशिप में फिर लहराया तिरंगा

2023 में नसरीन ने भारतीय महिला खो-खो टीम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमुलपुर, असम में आयोजित एशियन खो-खो चैंपियनशिप में भारत ने स्वर्ण पदक जीता। भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में इस उपलब्धि को नसरीन के अर्जुन अवॉर्ड के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है। दक्षिण एशियाई खेलों के स्वर्ण और एशियन चैंपियनशिप के स्वर्ण ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को एक मजबूत पहचान दी। उनकी कप्तानी और लगातार प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय महिला खो-खो की प्रमुख खिलाड़ियों में स्थापित किया।

अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर

नसरीन के लिए वर्ष 2023 उनके करियर का बेहद खास साल रहा। एक तरफ उन्होंने एशियन खो-खो चैंपियनशिप में भारत को स्वर्ण दिलाया, वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार ने उन्हें 2023 के अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक प्रशस्ति विवरण में उनके 2019 दक्षिण एशियाई खेलों के स्वर्ण और 2023 एशियन खो-खो चैंपियनशिप के स्वर्ण का उल्लेख है। 9 जनवरी 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में अर्जुन अवॉर्ड प्रदान किया। नसरीन के लिए यह सम्मान व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं ज्यादा था। उन्होंने खुद कहा था कि यह उनके लिए और पूरे खो-खो खेल के लिए गर्व की बात है, क्योंकि जिस खेल को लंबे समय तक पर्याप्त पहचान नहीं मिली, उसे अब देश का प्रतिष्ठित खेल सम्मान मिल रहा था।

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उनकी सबसे बड़ी प्रेरक कहानी

नसरीन की सबसे बड़ी प्रेरणा उनके पिता रहे। आर्थिक परेशानियों के बावजूद मोहम्मद गफूर ने बेटी के खेल को रोकने के बजाय उसके सपने को पूरा करने के लिए खुद ज्यादा मेहनत की। वह अलग-अलग बाजारों में दुकान लगाकर देर रात तक काम करते थे ताकि परिवार की जरूरतें और बेटी की डाइट पूरी हो सके। नसरीन ने भी अपने पिता की मेहनत को अपनी ताकत बनाया। वह सुबह पांच बजे ट्रेनिंग शुरू करतीं और दिनभर की जिम्मेदारियों के बाद रात तक अभ्यास करती थीं। उनकी मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब वही लड़की भारतीय टीम की कप्तान बनी और देश के लिए स्वर्ण जीतकर लौटी। उनकी कहानी उन लड़कियों के लिए खास संदेश है जिन्हें खेल में आगे बढ़ने के लिए परिवार, समाज और आर्थिक परिस्थितियों—तीनों से लड़ना पड़ता है।

2025 में विश्व कप जीत के बाद लिया संन्यास

नसरीन के करियर का एक और ऐतिहासिक अध्याय पहले खो-खो विश्व कप 2025 में आया। दिल्ली में आयोजित इस टूर्नामेंट में भारतीय महिला टीम ने खिताब जीता। नसरीन टीम का हिस्सा थीं और इस ऐतिहासिक अभियान के बाद उन्होंने प्रतिस्पर्धी खो-खो से संन्यास लेने का फैसला किया। इस तरह उनका अंतरराष्ट्रीय खेल करियर उस समय एक बेहद यादगार मोड़ पर समाप्त हुआ, जब भारत ने खो-खो के पहले विश्व कप में महिला वर्ग का खिताब अपने नाम किया।

आज नसरीन शेख क्या कर रही हैं?

प्रतिस्पर्धी खो-खो से संन्यास लेने के बाद नसरीन का सफर खेल से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वह खेल और फिटनेस से जुड़ी अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाती रही हैं और शारीरिक शिक्षा में उच्च अध्ययन भी किया है। वह एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया से भी जुड़ी रही हैं। उनकी कहानी अब अगली पीढ़ी की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। जिस खेल को कभी उनके आसपास के लोग गंभीर करियर नहीं मानते थे, उसी खेल में उन्होंने राष्ट्रीय कप्तान, एशियाई चैंपियन और अर्जुन अवॉर्डी बनने का सफर तय किया।

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नसरीन शेख की कहानी का संदेश

नसरीन शेख की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है। यह उस लड़की की कहानी है जिसने आर्थिक परेशानियों, सामाजिक सवालों और सुविधाओं की कमी के बावजूद अपने खेल को नहीं छोड़ा। शकूरपुर की गलियों से निकलकर भारतीय टीम की कप्तानी, दक्षिण एशियाई खेलों और एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण, अर्जुन अवॉर्ड और फिर पहले खो-खो विश्व कप की ऐतिहासिक जीत तक पहुंचने वाली नसरीन ने साबित किया कि मंजिल तक पहुंचने के लिए रास्ता आसान होना जरूरी नहीं, बस कदम रुकने नहीं चाहिए। उनके लिए अर्जुन अवॉर्ड सिर्फ एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि उस पूरे खेल की पहचान की जीत है जिसे उन्होंने अपने संघर्ष और प्रदर्शन से देश के बड़े खेल मंच पर पहुंचाने में योगदान दिया।