ग़ौस सिवानी
उर्दू भाषा ने जिस तरह अलग-अलग भाषाओं के शब्द अपनाए हैं, उसी तरह उसने अलग-अलग संस्कृतियों को भी अपने अंदर जगह दी है। उर्दू की सबसे बड़ी खासियत उसकी उदार सोच, धार्मिक सहिष्णुता और इंसानी भाईचारा है। उर्दू के शायरों ने हर धर्म की महान हस्तियों पर कविताएँ लिखी हैं। इसकी सबसे अच्छी मिसाल अल्लामा इक़बाल हैं।
उनकी शायरी इस्लामी सोच से भरी हुई है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कई हिंदू महापुरुषों पर भी नज़्में लिखीं। इक़बाल जिन लोगों का सम्मान करते थे, उनमें स्वामी रामतीर्थ भी शामिल हैं। हालाँकि उन्होंने भगवान राम, गुरु नानक, गौतम बुद्ध और श्रीकृष्ण की भी तारीफ़ की है, लेकिन स्वामी रामतीर्थ की खास बात यह थी कि इक़बाल उनसे व्यक्तिगत रूप से भी परिचित थे।
स्वामी जी अपने समय के प्रसिद्ध हिंदू दार्शनिक और वेदांत के संत थे। इक़बाल ने उनके बारे में एक सुंदर नज़्म भी लिखी। आइए जानते हैं कि स्वामी रामतीर्थ कौन थे और क्यों उन्होंने इक़बाल को इतना प्रभावित किया।

स्वामी रामतीर्थ कौन थे?
स्वामी रामतीर्थ का जन्म 22अक्तूबर 1873को आज के पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम तीर्थराम था। बचपन से ही वे बहुत तेज़ बुद्धि के थे, लेकिन उनका जीवन आसान नहीं था। गरीबी और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और अपनी मेहनत से बड़ी सफलता हासिल की।
उच्च शिक्षा के लिए वे लाहौर गए। पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. में पूरे पंजाब में पहला स्थान हासिल किया। इसके लिए उन्हें हर महीने 90रुपये की छात्रवृत्ति मिली। बाद में उन्होंने गणित में एम.ए. किया और वहीं गणित के प्रोफेसर बन गए।
उनकी शुरुआती पढ़ाई एक मदरसे में हुई थी। उन्हें उर्दू और फ़ारसी अच्छी तरह आती थी और बाद में उन्होंने संस्कृत भी सीख ली। प्रोफेसर बनने के बाद भी वे बहुत सादा जीवन जीते थे। अपनी तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा वे गरीब लोगों और खासकर गरीब छात्रों की पढ़ाई पर खर्च कर देते थे।
लाहौर में उन्हें स्वामी विवेकानंद का भाषण सुनने का मौका मिला। इस भाषण का उनके जीवन और आध्यात्मिक सोच पर गहरा असर पड़ा। उस समय वे पंजाब की सनातन धर्म सभा से भी जुड़े हुए थे।
आध्यात्मिक जीवन की ओर
स्वामी रामतीर्थ ने सिर्फ़ हिंदू धर्मग्रंथ ही नहीं पढ़े, बल्कि तुलसीदास, सूरदास, गुरु नानक, शम्स तबरेज़ी, मौलाना जलालुद्दीन रूमी और दूसरे सूफ़ी संतों की शिक्षाओं का भी गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने गीता, वेद, उपनिषद और पश्चिमी दार्शनिकों की किताबें भी पढ़ीं।
उन्होंने उर्दू में "अलिफ़" नाम की एक मासिक पत्रिका भी निकाली, जिसमें वे अपने विचार लिखते थे। वर्ष 1901में उन्होंने प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी और अपने परिवार के साथ हिमालय चले गए। कुछ समय बाद द्वारका पीठ के शंकराचार्य की सलाह पर उन्होंने संन्यास ले लिया और सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया।
विदेशों की यात्रा
हिमालय में रहने के दौरान टिहरी (गढ़वाल) के महाराजा उनके भक्त बन गए। उन्हीं की मदद से स्वामी रामतीर्थ जापान में एक धार्मिक सम्मेलन में गए। वहाँ से वे अमेरिका और मिस्र भी गए। उन्होंने जापान में लगभग एक महीने और अमेरिका में दो साल तक कई जगहों पर भाषण दिए।
उनका सबसे बड़ा संदेश था: "अपने आप को पहचानो, तुम्हारा असली स्वरूप ईश्वर के प्रकाश से जुड़ा हुआ है।"उनकी बातों और व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि लोग उनके पास बैठकर शांति और सुकून महसूस करते थे। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई।
अलग संप्रदाय बनाने के खिलाफ
स्वामी रामतीर्थ लोगों को जोड़ने में विश्वास रखते थे, तोड़ने में नहीं। जब वे 1904में भारत लौटे तो उनके अनुयायियों ने उनसे कहा कि वे अपना अलग संप्रदाय शुरू करें। लेकिन उन्होंने यह बात मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि लोगों में नए मतभेद पैदा करने के बजाय उन्हें एकजुट करना ज़्यादा ज़रूरी है। समाज को झगड़ों की नहीं, बल्कि एकता और अनुशासन की ज़रूरत है।
वेदांत के अनुयायी
स्वामी रामतीर्थ वेदांत दर्शन के मानने वाले थे। वे आदि शंकराचार्य के अद्वैत (एकत्व) के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। वे वेदांत और योग पर किताबें पढ़ते थे और इन्हीं विषयों पर भाषण भी देते थे।
उनका मानना था कि पूरी दुनिया एक ही आत्मा का रूप है। वे कहते थे कि इंसान को धर्म, जाति, परिवार और समाज की छोटी-छोटी सीमाओं से ऊपर उठकर पूरी मानवता को अपना मानना चाहिए। उनके अनुसार इंसान खुशी को कभी धन में, कभी चीज़ों में और कभी दूसरे लोगों में खोजता है, जबकि असली खुशी उसके अपने मन और आत्मा के भीतर होती है।
वे कहते थे कि संकीर्ण सोच तब पैदा होती है, जब इंसान खुद को केवल अपने छोटे-से दायरे तक सीमित कर लेता है। सच्ची इंसानियत इन सीमाओं से बाहर निकलकर सबको अपना मानने में है।
राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति
स्वामी रामतीर्थ सच्चे देशभक्त भी थे। उनका कहना था कि इस समय सबसे बड़ा धर्म "राष्ट्रधर्म", यानी देश की सेवा करना है। उनके अनुसार हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी योग्यता और मेहनत देश और समाज की उन्नति के लिए लगाए।
उन्होंने यह भी कहा था कि बीसवीं सदी के बीच तक भारत आज़ाद हो जाएगा। उन्होंने क्रांतिकारी विचारक लाला हरदयाल को एक पत्र में सलाह दी थी कि वे हिंदी भाषा में अपने विचार लोगों तक पहुँचाएँ, क्योंकि उनका मानना था कि आज़ाद भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी होगी।
अंतिम दिन
स्वामी रामतीर्थ का टिहरी (गढ़वाल) से गहरा आध्यात्मिक लगाव था। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे वहीं लौट आए। 1906की दीपावली के दिन उन्होंने मृत्यु के नाम एक संदेश लिखा और उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया। उसी वर्ष 27अक्तूबर 1906को उनका निधन हो गया। बहुत से लोगों का मानना है कि स्वामी जी ने अपनी इच्छा से स्वयं को नदी के हवाले कर दिया था। उनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे थे।
इक़बाल और स्वामी रामतीर्थ
अल्लामा इक़बाल का स्वामी रामतीर्थ से बहुत गहरा लगाव था। वे उनका बहुत सम्मान करते थे। इसका पता केवल उनकी नज़्मों से ही नहीं, बल्कि उनके पत्रों से भी चलता है। दोनों एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते थे।
इक़बाल और स्वामी जी एक ही कॉलेज में पढ़ाते थे और अच्छे मित्र भी थे। इक़बाल उन्हें इसलिए भी पसंद करते थे, क्योंकि स्वामी जी वेदांत दर्शन को मानते थे। यह वही दर्शन था जो प्राचीन भारत में बहुत प्रसिद्ध था और बाद में भी अनेक हिंदू विद्वानों ने अपनाया।
इक़बाल और स्वामी जी की दोस्ती बहुत गहरी थी। दोनों छात्र जीवन से ही मित्र थे और यह दोस्ती स्वामी जी के जीवन के अंतिम समय तक बनी रही। उनके एक जीवनीकार ने लिखा है,"लाहौर में स्वामी राम की शायर-ए-मशरिक़ अल्लामा इक़बाल से गहरी मित्रता हो गई थी। दोनों ने साथ पढ़ाई की और साथ ही युवावस्था बिताई। दोनों कवि, दार्शनिक और विद्वान थे। दोनों दिल से लोगों की सेवा करना चाहते थे। दोनों ने लेखन के क्षेत्र में बड़ी पहचान बनाई। केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में उनका नाम हुआ। दोनों अपने पीछे कविता और गद्य का बड़ा ख़ज़ाना छोड़ गए।
कहा जाता है कि अगर कोई सर मोहम्मद इक़बाल से मिलने आता और वे अपने कमरे में न मिलते, तो लोग समझ जाते कि वे अपने मित्र तीर्थराम के घर गए होंगे। इसी तरह अगर किसी को तीर्थराम (जो बाद में स्वामी रामतीर्थ कहलाए) से मिलना होता, तो वे अक्सर इक़बाल के घर मिल जाते थे।
दोनों साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म और कविता जैसे विषयों पर घंटों चर्चा करते थे। जीवन के कई सवालों पर विचार करते थे। दोनों की बुद्धि बहुत तेज़ थी, इसलिए इन चर्चाओं से दोनों को नई सोच और नए विचार मिलते थे। दोनों एक-दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते थे, एक-दूसरे के सच्चे दोस्त थे और सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे।
एक रात स्वामी राम को पेट में बहुत तेज़ दर्द हुआ। उस समय अल्लामा इक़बाल उनके पास ही थे। उन्होंने दवा लेने की सलाह दी, लेकिन स्वामी राम ने दवा लेने से मना कर दिया। दर्द होने के बावजूद वे मुस्कुराते रहे और कहते रहे कि दवा की ज़रूरत नहीं है, दर्द अपने-आप ठीक हो जाएगा। पूरी रात दर्द बना रहा, लेकिन अगली सुबह उनकी तबीयत ठीक हो गई। इसके बाद भी उन्होंने दवा नहीं ली।"(स्रोत : स्वामी रामतीर्थ, लेखक – इंद्रजीत लाल, पृष्ठ 24–25)
स्वामी रामतीर्थ का जीवन बहुत छोटा था। उनका निधन केवल 32वर्ष की आयु में हो गया। इतने कम समय में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, कुछ समय तक कॉलेज में गणित पढ़ाया और फिर नौकरी छोड़कर संन्यासी बन गए। इसके बाद वे अपने विचारों का प्रचार करने के लिए दुनिया के कई देशों में गए।
इक़बाल को उनके विचार अपने विचारों के काफ़ी करीब लगते थे। वे स्वामी जी के सामाजिक कार्यों से भी बहुत प्रभावित थे। कई विद्वानों का मानना है कि इक़बाल के "ख़ुदी" के दर्शन के विकास में स्वामी रामतीर्थ की शिक्षाओं का भी कुछ प्रभाव रहा। स्वामी जी की कम उम्र में मृत्यु की खबर से इक़बाल भी बहुत दुखी हुए थे।
स्वामी रामतीर्थ के प्रति इक़बाल के सम्मान का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब स्वामी जी ने कॉलेज की नौकरी छोड़ दी, तो बहुत से लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया। कुछ लोगों ने तो यह भी कहना शुरू कर दिया कि उनका दिमाग़ ख़राब हो गया है और वे पागल हो गए हैं। उस समय इक़बाल ने खुलकर उनका साथ दिया और कहा,"अगर स्वामी रामतीर्थ पागल हैं, तो दुनिया में समझदारी और बुद्धि जैसी कोई चीज़ नहीं है। यह वही दीवानगी है जिसने स्पिनोज़ा जैसे महान दार्शनिक को ऊँचाई दी और पैग़म्बरों को महान बनाया।"(स्रोत : इक़बाल : शायर और सियासतदाँ, डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया, पृष्ठ 66)
इक़बाल की नज़्म "स्वामी रामतीर्थ"
स्वामी रामतीर्थ के जल समाधि लेने की खबर ने उनके भक्तों और मित्रों को गहरे दुख में डाल दिया। अल्लामा इक़बाल भी उनके बहुत क़रीबी मित्र थे। यह समाचार सुनकर उन्हें भी गहरा आघात पहुँचा। इसी दुख की अवस्था में उन्होंने "स्वामी रामतीर्थ" शीर्षक से एक नज़्म लिखी। इस नज़्म में उन्होंने केवल अपने दुख का ही नहीं, बल्कि स्वामी जी की आध्यात्मिक ऊँचाई का भी बहुत सुंदर ढंग से वर्णन किया है।
नज़्म इस प्रकार है:..
हम बगल दरिया से है ऐ क़तरा बे-ताब तू
पहले गौहर था, बना अब गौहर-ए-नायाब तू
आह खोला किस अदा से तू ने राज़-ए-रंग-ओ-बू
मैं अभी तक हूँ असीर-ए-इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-बू
मिट के ग़ौगा ज़िंदगी का शोरिश-ए-महशर बना
ये शरारा बुझ के आतिश-ख़ाना-ए-आज़र बना
नफ़ी-ए-हस्ती इक करिश्मा है दिल-ए-आगाह का
'ला' के दरिया में निहाँ मोती है 'इल्लल्लाह' का
चश्मे-नाबीना से मख़्फ़ी मानी-ए-अंजाम है
थम गई जिस दम तड़प, सीमाब सीमे-ख़ाम है
तोड़ देता है बुत-ए-हस्ती को इबराहीम इश्क़
होश का दारू है गोया मस्ती-ए-तस्नीम इश्क़

इस नज़्म के पहले ही शेर में इक़बाल सीधे स्वामी रामतीर्थ से बात करते हैं। "क़तरा" यानी पानी की एक बूँद, स्वामी जी के व्यक्तिगत जीवन का प्रतीक है और "दरिया" ईश्वर या परम सत्य का प्रतीक है। अपने जीवन के अंतिम दिनों में स्वामी रामतीर्थ ने गंगा में जल समाधि ली थी।
इक़बाल बहुत सुंदर ढंग से कहते हैं कि हे बेचैन बूँद! अब तुम दरिया से मिल गए हो, यानी अपनी असली मंज़िल तक पहुँच गए हो। जीवन में तुम एक अनमोल मोती थे, लेकिन मृत्यु के बाद तुम्हारी महानता और भी बढ़ गई और तुम एक दुर्लभ रत्न बन गए।
दूसरे शेर में इक़बाल स्वामी रामतीर्थ की आध्यात्मिक ऊँचाई की प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि तुमने दुनिया के रंग, जाति, धर्म और दूसरे बाहरी भेदभाव की असलियत को समझ लिया था। तुम्हारी नज़र में पूरी मानवता एक थी। लेकिन मैं आज भी इन्हीं बाहरी भेदों और अलग-अलग पहचान में उलझा हुआ हूँ। इस शेर में इक़बाल स्वामी रामतीर्थ की मानवता, समानता और सबको एक मानने की भावना को सम्मान देते हैं।
अगर पूरी नज़्म को देखें, तो यह केवल स्वामी रामतीर्थ की मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत नहीं है। यह उनकी आध्यात्मिक महानता को भी स्वीकार करने वाली रचना है। एक मुसलमान शायर होने के बावजूद इक़बाल ने एक हिंदू संन्यासी को इसलिए श्रद्धांजलि दी, क्योंकि उनकी नज़र में स्वामी रामतीर्थ ने धर्म के संकीर्ण भेदभाव से ऊपर उठकर ईश्वर की पहचान, मानव सेवा, अहंकार का त्याग और सच्चे प्रेम का मार्ग अपनाया था।
इस नज़्म की एक और खास बात यह है कि इक़बाल ने स्वामी रामतीर्थ की महानता को समझाने के लिए इस्लामी प्रतीकों का सहारा लिया है। "ला इलाहा इल्लल्लाह", हज़रत इबराहीम, आज़र और तस्नीम जैसे प्रतीकों के माध्यम से उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि सच्ची आध्यात्मिकता किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं होती, बल्कि वह पूरी मानवता की साझा धरोहर है। इसी कारण यह नज़्म अलग-अलग धर्मों के बीच सम्मान, आध्यात्मिक एकता और मानव महानता का एक सुंदर उदाहरण मानी जाती है।