अर्सला खान/नई दिल्ली
राजस्थान के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे मोहम्मद इमरान खान मेवाती की कहानी सिर्फ एक शिक्षक की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस बच्चे की कहानी है, जिसने अपने गांव के स्कूल में संसाधनों की कमी देखी और ठान लिया कि वह एक दिन शिक्षा को उन बच्चों तक पहुंचाएगा, जिनके पास अच्छे स्कूल, किताबें और आधुनिक सुविधाएं नहीं हैं।
आज दो दशकों से अधिक के अपने शैक्षणिक सफर में इमरान खान ने पढ़ाई को सिर्फ किताब और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने तकनीक को गांवों के बच्चों तक पहुंचाया, 100 से अधिक शैक्षणिक ऐप विकसित किए, हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षित किया और लाखों बच्चों तक शिक्षा को आसान बनाने की कोशिश की।
राजस्थान के संस्कृत शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में कार्यरत मोहम्मद इमरान खान मेवाती का सफर इस बात की मिसाल है कि अगर इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधन भी बदलाव की राह में बाधा नहीं बनते।
नौवीं कक्षा में शुरू हुआ पढ़ाने का सफर
इमरान खान एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। ऐसे में उन्होंने बहुत कम उम्र में ही जिम्मेदारियों को समझ लिया था। नौवीं कक्षा में पढ़ते हुए उन्होंने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया, ताकि परिवार की आर्थिक मदद कर सकें।
यहीं से उनके भीतर शिक्षक बनने की इच्छा मजबूत हुई। अपने प्राथमिक विद्यालय में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई कमियां देखीं। संसाधनों की कमी, कमजोर बुनियादी ढांचा और आधुनिक शिक्षा सुविधाओं का अभाव उन्हें हमेशा परेशान करता था। उन्होंने तभी तय किया कि अगर उन्हें मौका मिला, तो वह शिक्षा की इन चुनौतियों को दूर करने के लिए काम करेंगे।
1999 से शुरू हुई बदलाव की यात्रा
साल 1999 से इमरान खान ने अंग्रेजी, गणित और विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ाना शुरू किया। लेकिन उनके लिए पढ़ाना केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं था। वह लगातार यह सोचते रहते थे कि बच्चों के लिए पढ़ाई को आसान, रोचक और उपयोगी कैसे बनाया जाए।
ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि उनके पास बेहतर शैक्षणिक सामग्री और आधुनिक संसाधनों तक सीमित पहुंच थी। इमरान खान ने इसी चुनौती को अपनी ताकत बनाने का फैसला किया।
जब पहली बार कंप्यूटर देखा, तब शुरू हुआ तकनीक का सफर
साल 2008 में इमरान खान ने पहली बार कंप्यूटर का इस्तेमाल किया। यहीं से उनकी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने खुद से तकनीक सीखनी शुरू की। वेब डेवलपमेंट सीखा और हिंदी में ऑफलाइन शैक्षणिक सामग्री तैयार करने लगे, ताकि इंटरनेट की सुविधा न होने पर भी ग्रामीण इलाकों के बच्चे पढ़ाई कर सकें।
धीरे-धीरे उनका यह छोटा प्रयास एक बड़े डिजिटल मिशन में बदल गया। उन्होंने 100 से अधिक शैक्षणिक ऐप विकसित किए, जो Google Play Store पर मुफ्त उपलब्ध कराए गए। इन ऐप्स को दुनिया के करीब 50 देशों में लाखों बार डाउनलोड किया गया।
पढ़ाई से लेकर स्वास्थ्य और सामाजिक विकास तक
इमरान खान के ऐप्स केवल स्कूल की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने प्राथमिक कक्षाओं की शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी डिजिटल सामग्री तैयार की। उनकी परियोजनाओं में Project Dishari, General Science, Math, History और Geography जैसे विषय शामिल रहे।
उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वास्थ्य से जुड़ा Maternal Care App भी विकसित किया। वहीं युवाओं और सामाजिक जागरूकता के लिए Yuva Shakti App और Digital Mewat App जैसी पहल भी की। उनका मानना रहा कि तकनीक का असली फायदा तभी है, जब वह समाज के उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसके पास संसाधन कम हैं।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने की सराहना
इमरान खान के काम को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। उनके शैक्षणिक ऐप्स और शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लंदन के वेम्बली स्टेडियम में उनके योगदान की सराहना की। इमरान खान ने अपने शैक्षणिक ऐप्स को भारत के शिक्षा मंत्रालय के लिए भी उपलब्ध कराया। यह एक ऐसे शिक्षक के लिए बड़ी उपलब्धि थी, जिसने कभी संसाधनों की कमी वाले एक ग्रामीण स्कूल से अपने बदलाव के सफर की शुरुआत की थी।
सम्मान मिले, लेकिन मिशन नहीं रुका
शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए इमरान खान को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार, राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कार और शिक्षा व ग्रामीण विकास में तकनीक के उपयोग के लिए जमनालाल बजाज पुरस्कार शामिल हैं।
लेकिन उनके लिए पुरस्कार कभी मंजिल नहीं बने। उनका असली लक्ष्य हमेशा यही रहा कि गांव का कोई बच्चा संसाधनों की कमी के कारण अच्छी शिक्षा से वंचित न रह जाए।
स्कूल की समस्याओं को जड़ से समझा
इमरान खान का काम केवल ऐप बनाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ग्रामीण स्कूलों की उन समस्याओं पर भी काम किया, जिनके कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी। स्कूलों में अनुपस्थिति, लड़कियों की शिक्षा में असमानता, कमजोर बुनियादी ढांचा और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों को उन्होंने करीब से समझा।
मल्टी-ग्रेड कक्षाओं में उन्होंने Peer Teaching यानी बच्चों द्वारा बच्चों को पढ़ाने की पद्धति को अपनाया। उन्होंने ग्रुप आधारित प्रोजेक्ट लर्निंग के जरिए छात्रों को केवल सुनने वाला नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया।
कोविड में हजारों शिक्षकों की मदद
कोविड-19 महामारी के दौरान जब स्कूल बंद हो गए और शिक्षा अचानक ऑनलाइन दुनिया में पहुंच गई, तब लाखों शिक्षक और छात्र नई चुनौतियों का सामना कर रहे थे। इमरान खान ने इस समय LetUsTalkEducation जैसी पहल के माध्यम से हजारों शिक्षकों को ऑनलाइन शिक्षण और डिजिटल टूल्स के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने में योगदान दिया।
उन्होंने संस्कृत के छात्रों और शिक्षकों के लिए Devvani App भी विकसित किया। वीडियो, ई-बुक और इंटरैक्टिव सामग्री से लैस यह ऐप आज 60 हजार से अधिक उपयोगकर्ताओं तक पहुंच चुका है।
स्कूल को बनाया प्रयोगशाला
इमरान खान का मानना है कि बच्चे केवल किताबों से नहीं सीखते। इसी सोच के साथ उन्होंने स्कूल में विज्ञान मॉडल तैयार करवाए, बच्चों को जलवायु परिवर्तन के बारे में सिखाया और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रोजेक्ट शुरू किए।
स्कूल परिसर में लगभग 200 पौधों के साथ मियावाकी गार्डन विकसित किया गया। स्कूल लाइब्रेरी को मजबूत करने के साथ-साथ उन्होंने जल संरक्षण को गणित की गतिविधियों से जोड़ने जैसे प्रयोग भी किए। यानी उनके लिए शिक्षा का मतलब केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाना नहीं, बल्कि बच्चों को वास्तविक दुनिया की समस्याओं को समझने के लिए तैयार करना था।
समुदाय को जोड़ा, स्कूल बदला
इमरान खान ने महसूस किया कि अकेला शिक्षक हर समस्या का समाधान नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने समुदाय को स्कूल के विकास से जोड़ा। स्थानीय संगठनों और लोगों को प्रेरित कर स्कूलों के सुधार और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सहयोग जुटाया।
इसका असर स्कूल की सुविधाओं और नामांकन, दोनों पर पड़ा। उन्होंने 'मस्ती की पाठशाला' जैसे कार्यक्रम भी शुरू किए, जहां बच्चों को केवल किताबों की शिक्षा नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास और करियर मार्गदर्शन भी दिया गया।
अमेरिका से मिला वैश्विक अनुभव
इमरान खान को Fulbright Distinguished Award Fellow के रूप में अमेरिका में आयोजित एक सेमेस्टर के विशेष कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। इस कार्यक्रम में 16 देशों के 51 शिक्षक शामिल थे।
यहां मिले वैश्विक अनुभव को उन्होंने अपनी शिक्षण पद्धति में शामिल किया। उन्होंने 21वीं सदी के कौशल, वैश्विक नागरिकता और पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उन्होंने शिक्षकों के लिए ICT प्रशिक्षण से जुड़ी ऐप विकसित करने के विषय पर भी शोध किया।
लाखों बच्चों तक पहुंचा समावेशी शिक्षा का प्रयास
इमरान खान ने शिक्षकों के लिए ICT Integration और Content Creation के क्षेत्र में मास्टर ट्रेनर के रूप में हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया। स्कूलों में दिव्यांग बच्चों की पहचान और उनकी जरूरतों को समझने के लिए विकसित PRASHAST App से भी उनका महत्वपूर्ण योगदान जुड़ा रहा। इस पहल ने लाखों बच्चों तक समावेशी शिक्षा के प्रयासों को मजबूत करने में मदद की।
एक शिक्षक, जिसने तकनीक को गांव तक पहुंचाया
मोहम्मद इमरान खान मेवाती की कहानी हमें बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़ी इमारत, करोड़ों रुपये या बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी बदलाव की शुरुआत एक शिक्षक से होती है... एक ऐसे शिक्षक से, जिसने नौवीं कक्षा में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया था। जिसने पहली बार कंप्यूटर चलाना सीखा और फिर खुद ही तकनीक सीखकर लाखों लोगों के लिए शैक्षणिक संसाधन तैयार कर दिए। जिसने गांव के बच्चों की समस्या को देखा और उसे अपना मिशन बना लिया।
आज उनकी कहानी सिर्फ एक शिक्षक की उपलब्धियों की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जो कहती है अगर शिक्षा को सही तकनीक, सही सोच और सच्चे इरादों से जोड़ा जाए, तो गांव की एक छोटी-सी कक्षा से भी पूरी दुनिया तक बदलाव पहुंचाया जा सकता है। मोहम्मद इमरान खान मेवाती ने साबित किया है कि एक शिक्षक केवल बच्चों को पढ़ाता नहीं... वह नई संभावनाएं पैदा करता है, समाज को जोड़ता है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल देता है।