जन्माष्टमी पर वृंदावन से हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मुस्लिम हाथों से सजते हैं लड्डू गोपाल
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 03-09-2026
An example of Hindu-Muslim unity from Vrindavan on Janmashtami: Laddu Gopal is adorned by Muslim hands.
आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली
वृंदावन की गलियों में आस्था के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है, जो देश की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल पेश करती है। यहां लड्डू गोपाल की पोशाक, राधा रानी के लहंगे, चुनरी, ओढ़नी, पटका और ठाकुर जी के लिए मंदिरों में चढ़ाई जाने वाली कई पोशाकें मुस्लिम कारीगरों के हाथों से तैयार होती हैं। जन्माष्टमी के मौके पर जब देशभर में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां होती हैं, तब वृंदावन के मुस्लिम कारीगर दिन-रात मेहनत कर इन पोशाकों को तैयार करने में जुटे रहते हैं। उनके लिए यह उनका हुनर और रोजी-रोटी है, लेकिन इसी काम के जरिए हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की एक ऐसी कहानी भी सामने आती है, जिसमें मजहब की दीवारों से ऊपर मेहनत, मोहब्बत और इंसानियत दिखाई देती है।
उत्तर प्रदेश का मथुरा-वृंदावन क्षेत्र भगवान कृष्ण की जन्मभूमि और उनकी लीलाओं से जुड़ी आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां कृष्ण और लड्डू गोपाल की पोशाकों का कारोबार लंबे समय से स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है। इस कारोबार से बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर और उनके परिवार जुड़े हुए हैं। वृंदावन की गलियों में कई मुस्लिम घर ऐसे हैं जहां सुबह से शाम तक कपड़े, धागे, सितारे, नग, स्टोन और दूसरे सामान के बीच कारीगर ठाकुर जी और राधा रानी के श्रृंगार की पोशाक तैयार करते नजर आते हैं। इन कारीगरों का काम केवल कपड़े सिलना नहीं है। इसके पीछे डिजाइन तैयार करने से लेकर कपड़े का चयन, उसे अड्डे पर लगाना, छपाई, रेशम, कसब, सितारे, स्टोन, चैन और अन्य सजावटी सामग्री लगाने तक की लंबी प्रक्रिया होती है। एक पोशाक को तैयार करने में उसकी डिजाइन और काम की बारीकी के आधार पर कई घंटे से लेकर कई दिन तक लग सकते हैं। कई पोशाकों पर एक साथ कई कारीगर काम करते हैं।
बचपन से कृष्ण की पोशाक बना रहे हैं मुस्लिम कारीगर
वृंदावन के कारीगर आरिफ बताते हैं कि वह बचपन से इस काम से जुड़े हैं और करीब 25 वर्षों से ठाकुर जी, राधा रानी और लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार कर रहे हैं। उनके हाथों से बांके बिहारी की ड्रेस से लेकर लड्डू गोपाल की छोटी-छोटी पोशाकें और राधा रानी के लहंगे तैयार होते हैं। उनके मुताबिक इस काम से बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर जुड़े हैं। आरिफ बताते हैं कि इस काम से जुड़े कारीगरों का हिंदू दुकानदारों और ग्राहकों के साथ रोज का संपर्क है। वे दुकानों पर जाते हैं, ऑर्डर लेते हैं और पोशाकें तैयार करके पहुंचाते हैं। उनके मुताबिक यहां इस बात को लेकर कोई विवाद नहीं है कि पोशाक किस धर्म के व्यक्ति के हाथों से बन रही है। उनके शब्दों में, यहां हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं है और लोग आपस में मेलजोल के साथ रहते हैं।
यही नहीं, कारीगरों के मुताबिक वृंदावन में मंदिर और मस्जिद भी एक-दूसरे के करीब मौजूद हैं और स्थानीय लोग आपसी मेलजोल के साथ रहते हैं। यह तस्वीर बताती है कि जमीन पर रहने वाले आम लोगों के रिश्ते कई बार उन धारणाओं से बिल्कुल अलग होते हैं, जो दूर बैठकर समाज के बारे में बनाई जाती हैं।
वृंदावन से दिल्ली, जयपुर ही नहीं विदेशों तक पहुंचती हैं पोशाकें
इन मुस्लिम कारीगरों के हाथों तैयार होने वाली पोशाकें केवल वृंदावन या मथुरा तक सीमित नहीं हैं। इनके ऑर्डर दिल्ली, जयपुर और देश के दूसरे शहरों से आते हैं। रिपोर्ट में कारीगर बताते हैं कि उनकी तैयार की गई पोशाकें दुबई और अमेरिका तक भी पहुंचती हैं। यानी वृंदावन के छोटे-छोटे घरों और कार्यस्थलों में बैठकर तैयार किया गया यह पारंपरिक हुनर देश की सीमाओं से बाहर तक अपनी पहचान बना रहा है। लेकिन इस चमकदार काम के पीछे कारीगरों की आर्थिक मुश्किलें भी छिपी हैं। बेहद बारीकी और मेहनत वाले इस काम के लिए उन्हें अपेक्षाकृत कम मजदूरी मिलने की शिकायत है। आरिफ बताते हैं कि कई बार 12 घंटे तक काम करने के बावजूद कारीगरों की कमाई करीब 700 रुपये तक रहती है। दूसरे कारीगर इससे भी कम मजदूरी की बात करते हैं।
शाहरुख: 'अपनी रोजी-रोटी है, जितना काम करेंगे उतना बेहतर'
करीब 12-13 वर्षों से इस काम से जुड़े शाहरुख कहते हैं कि उनके लिए यह काम उनकी रोजी-रोटी का साधन है। उनसे जब पूछा गया कि हिंदू आस्था से जुड़ी पोशाक तैयार करते समय उन्हें कैसा महसूस होता है, तो उन्होंने इसे सहजता से लिया। उनके लिए यह उनका काम है और इसी से उनका परिवार चलता है। वह बताते हैं कि इस काम में महिलाएं भी जुड़ी हैं, हालांकि पुरुषों की संख्या अधिक है। यह सहजता इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। कारीगरों के लिए सामने वाले की धार्मिक पहचान से ज्यादा मायने काम, हुनर और रोजगार का है। वे अपने हाथों से जिस पोशाक को तैयार करते हैं, उसे हिंदू परिवार और मंदिर अपनी आस्था का हिस्सा बनाकर स्वीकार करते हैं।
जन्माष्टमी पर दिन-रात एक कर देते हैं कारीगर
जन्माष्टमी का समय इन कारीगरों के लिए बेहद व्यस्त होता है। यामीन बताते हैं कि जन्माष्टमी के दौरान लड्डू गोपाल और राधा रानी की पोशाकों की मांग बढ़ जाती है और कारीगर दिन-रात मेहनत करते हैं। लहंगा, चुनरी, ओढ़नी, धोती, पटका और मंदिरों में चढ़ावे के लिए इस्तेमाल होने वाली कई तरह की वस्तुएं यहां तैयार की जाती हैं। यामीन इस काम को अपना रोजगार बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें काम मिलने को वह लड्डू गोपाल की कृपा के रूप में भी देखते हैं। उनके लिए यह किसी धार्मिक विवाद का विषय नहीं बल्कि उनका हुनर और रोजी-रोटी है।
एक पोशाक के पीछे कई हाथों की मेहनत
लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करने की प्रक्रिया देखने में जितनी आसान लगती है, वास्तव में उतनी ही मेहनत भरी है। पहले डिजाइन तैयार की जाती है। इसके बाद कपड़ा लिया जाता है, डिजाइन को तैयार करके अड्डे पर लगाया जाता है और फिर कारीगर उस पर बारीकी से काम करते हैं। डिजाइन की जटिलता के आधार पर एक पोशाक को तैयार करने में 5, 10 या 12 घंटे तक लग सकते हैं। राधा रानी के बड़े लहंगे की बात करें तो एक सेट में लहंगा, पटका, ओढ़नी और दूसरे हिस्से शामिल हो सकते हैं। एक सेट को तैयार करने में करीब चार दिन तक लगने की बात कारीगर बताते हैं। इसमें सितारे, स्टोन, चैन, रेशम और अन्य सजावटी सामग्री का इस्तेमाल होता है। यही बारीक काम साधारण कपड़े को भगवान के श्रृंगार के लिए विशेष पोशाक में बदल देता है। इन पोशाकों की कीमत भी डिजाइन और काम के हिसाब से बदलती है। कारीगर बताते हैं कि चुनरी और दूसरी पोशाकें अलग-अलग कीमतों पर तैयार होती हैं और ग्राहक की मांग के मुताबिक डिजाइन बनाई जाती है। किसी एक डिजाइन तक सीमित रहने के बजाय यहां अलग-अलग तरह की दर्जनों डिजाइन पर काम किया जाता है।
'काम तो काम होता है, हिंदू हो या मुसलमान'
जब कारीगरों से पूछा गया कि वे मुसलमान होते हुए राधा रानी और लड्डू गोपाल की पोशाक बनाते समय क्या महसूस करते हैं, तो उनका जवाब इस पूरी कहानी का सार बन जाता है। उनका कहना है कि यह उनका काम है, उनकी मेहनत है और इससे उनकी रोजी-रोटी चलती है। इसमें अफसोस या संकोच जैसी कोई बात नहीं है। वे अपनी इच्छा और खुशी से यह काम करते हैं। कारीगरों का कहना है कि यहां माहौल अच्छा है। लोग एक-दूसरे से सहयोग करते हैं और प्रेम-मोहब्बत के साथ काम करते हैं। जिन ठेकेदारों और दुकानदारों के लिए वे काम करते हैं, उनके साथ भी उनका अच्छा संबंध है।
एक ही अड्डे पर हिंदू-मुस्लिम कारीगर
इस कहानी का एक और खूबसूरत पहलू यह है कि यह काम केवल मुस्लिम कारीगरों तक सीमित नहीं है। हिंदू कारीगर भी इस काम में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। एक ही अड्डे पर हिंदू और मुस्लिम कारीगर साथ बैठकर राधा रानी के लहंगे और लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करते हैं। कारीगर मोहन सिंह बताते हैं कि वह करीब 17 वर्षों से इस काम से जुड़े हैं। उनके सामने मुस्लिम कारीगर भी उसी अड्डे पर काम करते हैं। उनके मुताबिक वर्षों से साथ काम करते हुए कभी किसी विवाद की स्थिति नहीं आई। वे खुशी और आपसी सहयोग के साथ अपना काम करते हैं। मोहन सिंह के लिए भी यह काम हुनर और रोजगार दोनों है। वह कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम कारीगर मिलकर इस काम को करते हैं और उन्हें इसके साथ काम करते हुए अच्छा महसूस होता है। यह दृश्य उस सामाजिक ताने-बाने की झलक देता है, जिसमें रोजमर्रा की जिंदगी में साझेदारी किसी औपचारिक नारे से नहीं बल्कि साथ बैठकर मेहनत करने से बनती है।
आर्थिक संकट ने हुनर के भविष्य पर खड़ा किया सवाल
जहां यह कहानी हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की खूबसूरत तस्वीर सामने लाती है, वहीं इसके पीछे कारीगरों की आर्थिक परेशानी भी गंभीर सवाल खड़े करती है। मोहन सिंह बताते हैं कि मजदूरी कम होने के कारण आने वाली पीढ़ी इस काम को अपनाने में दिलचस्पी नहीं दिखा सकती। उनके मुताबिक करीब आठ घंटे काम करने पर लगभग 300 रुपये तक की मजदूरी मिलने की स्थिति में परिवार चलाना मुश्किल है। कारीगर बताते हैं कि इस काम में बैठकर लंबे समय तक बारीक काम करना पड़ता है। इसके बावजूद मजदूरी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है। रेशम की एक रील की कीमत पहले करीब 7 रुपये थी, जो अब बढ़कर करीब 18 रुपये बताई जाती है, लेकिन मजदूरी में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई। कारीगरों का कहना है कि यदि इस पारंपरिक काम को बचाना है तो मजदूरी और कारीगरों की आर्थिक स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है। उनका कहना है कि अगर इस काम के लिए उचित मजदूरी तय हो और कारीगर को सम्मानजनक आय मिले, तो नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक हुनर को आगे ले जा सकती है। फिलहाल कई कारीगर चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बेहतर अवसर हासिल करें और जीवन में आगे बढ़ें।
वृंदावन के हजारों कारीगरों की रोजी-रोटी
कारीगरों के अनुसार वृंदावन में इस काम से करीब 3,000 मुस्लिम कारीगर जुड़े हुए हैं। यह आंकड़ा इस कारोबार के आकार और स्थानीय मुस्लिम परिवारों की आजीविका में इसकी भूमिका को दिखाता है। वृंदावन को मंदिरों का शहर कहा जाता है और रिपोर्ट में यहां करीब 4,000 से 5,000 मंदिर होने की जानकारी दी गई है। बांके बिहारी मंदिर सहित अनेक धार्मिक स्थलों के कारण यहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। केसी घाट भी कृष्ण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण के बीच मुस्लिम कारीगरों का यह हुनर एक अनोखी सामाजिक कहानी लिख रहा है। मंदिरों में भगवान का श्रृंगार जिस पोशाक से होता है, उसके पीछे किसी एक धर्म के हाथ नहीं बल्कि अलग-अलग समुदायों के साझा श्रम की कहानी है।
जन्माष्टमी पर मुस्लिम कारीगरों का संदेश: एकता और भाईचारा बना रहे'
जन्माष्टमी के मौके पर कारीगरों ने देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए एकता और भाईचारे का संदेश दिया। यामीन ने कहा कि सभी लोग प्रेम से रहें, एक-दूसरे का सहयोग करें और समाज में एकता बनी रहे। उनके लिए राधा रानी और लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करना केवल रोजगार नहीं, बल्कि ऐसा काम है जिसे वह पूरे मन से करते हैं। वहीं आने वाली पीढ़ी के लिए कारीगरों का संदेश भी बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि नई पीढ़ी अपने बुजुर्गों से सीखे हुनर को आगे बढ़ाए, लेकिन उससे भी बेहतर करने और अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करे। यह बात इस पारंपरिक कला के साथ-साथ कारीगर परिवारों की आकांक्षाओं को भी सामने रखती है।
कृष्ण की नगरी से देश के लिए बड़ा संदेश
मथुरा और वृंदावन की यह कहानी केवल लड्डू गोपाल की खूबसूरत पोशाकों की कहानी नहीं है। यह उन हाथों की कहानी है जो अपने हुनर से आस्था को सजाते हैं। यह उन परिवारों की कहानी है जिनकी रोजी-रोटी मंदिरों और श्रद्धालुओं से जुड़े इस कारोबार से चलती है। और सबसे बढ़कर यह उस हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की कहानी है, जो किसी मंच पर भाषण देकर नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में साथ काम करके दिखाई देता है। एक मुस्लिम कारीगर के हाथों तैयार लड्डू गोपाल की पोशाक जब किसी हिंदू परिवार के घर पहुंचती है, तो उसके साथ केवल कपड़ा और कढ़ाई नहीं जाती—उसमें उस कारीगर की मेहनत, उसका हुनर और उसकी उम्मीद भी शामिल होती है। इसी तरह जब हिंदू और मुस्लिम कारीगर एक ही अड्डे पर बैठकर राधा रानी का लहंगा तैयार करते हैं, तो वह केवल एक पोशाक नहीं रहती, बल्कि साझा मेहनत और सामाजिक सौहार्द की तस्वीर बन जाती है।
वृंदावन की गलियों में दिखाई देने वाली यह तस्वीर बताती है कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब केवल किताबों या इतिहास के पन्नों में नहीं है। वह आज भी उन छोटे-छोटे कामकाजी रिश्तों में जिंदा है, जहां एक का हुनर दूसरे की आस्था का हिस्सा बनता है और दोनों मिलकर अपनी जिंदगी आगे बढ़ाते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण की नगरी से निकलने वाला यह संदेश बेहद सरल है आस्था अपनी जगह है, मजहब अपनी जगह है, लेकिन मेहनत, मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारा वह साझा धागा है जो समाज को जोड़कर रखता है। लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करने वाले मुस्लिम कारीगरों और उनके साथ काम करने वाले हिंदू कारीगरों की यह कहानी इसी कौमी एकता की ऐसी मिसाल है, जिसे वृंदावन की गलियां हर दिन अपने भीतर संजोए हुए हैं।
आवाज़ द वॉइस के संवाददाता रियाज़ मलिक की इस खास वीडियो रिपोर्ट में देखिए जन्माष्टमी के मौके पर वृंदावन से हिंदू-मुस्लिम एकता, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक दिल छू लेने वाली तस्वीर:-