बशीर परवाज़ का निधन, सोलापुर ने खोया उर्दू अदब का सितारा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-09-2026
Why Iqbal Admired Bhartrihari: Discover Their Unique Bond
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अल्फिया शेख, सोलापूर

उर्दू ज़बान-ओ-अदब के मोतबर नाम, मारूफ़ शायर, नक़्क़ाद और उस्ताद-ए-मुहतरम बशीर परवाज़ 82बरस की उम्र में इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए। सोलापुर के नोबल हॉस्पिटल में उन्होंने आख़िरी सांस ली। उनके इंतेक़ाल की ख़बर मिलते ही पूरे महाराष्ट्र समेत मुल्क के अदबी और तअलीमी हल्क़ों में रंज-ओ-ग़म की लहर दौड़ गई। सोलापुर के जडे साहब क़ब्रिस्तान में नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद उन्हें ख़ाक-ए-सुपुर्द किया गया। पसमांदगान में उनकी अहलिया मुमताज़ बेगम, दो बेटे और दो बेटियां शामिल हैं।

ggइब्तिदाई ज़िंदगी और अदबी विरसा

20दिसंबर 1944को सोलापुर के एक संजीदा ख़ानदान में बशीर अहमद अब्दुल क़ादिर दौलताबादी की पैदाइश हुई। अदबी दुनिया में वे 'बशीर परवाज़' के क़लमी नाम से जाने गए। शायरी और अदब का ज़ौक़ उन्हें अपने वालिद-ए-मोहतरम अब्दुल क़ादिर लाडले साहब दौलताबादी यानी मशहूर शायर क़दीर शोलापुरी से विरसे में मिला था। घर का माहौल इल्म-ओ-अदब का गहवारा था, जहां लफ़्ज़ों की नज़ाकत और बहर-ओ-औज़ान की बारीकियों पर रोज़ाना गुफ़्तगू हुआ करती थी। इस इल्मी माहौल ने उनके ज़ेहन को बचपन से ही संवारा।

एम.ए., बी.एड. की डिग्रियां हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी पहली तख़्लीक़ 1971में मारूफ़ माहनामे 'सब रस' में शाया करवाई। यहीं से उनके उस बा-क़ायदा अदबी सफ़र का आग़ाज़ हुआ, जिसने आगे चलकर महाराष्ट्र में उर्दू शायरी को एक नया वक़ार बख़्शा।

तदरीस का पाकीज़ा पेशा और नई नस्ल की तरबियत

बशीर परवाज़ ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा दर्स-ओ-तदरीस के पाकीज़ा पेशे के लिए वक़्फ़ कर दिया। उन्होंने पहले श्रीवर्धन में पांच साल और फिर सिटिज़न उर्दू हाईस्कूल में अपनी ख़िदमात अंजाम दीं। इसके बाद उन्होंने प्रोग्रेसिव उर्दू हाईस्कूल में तवील मुद्दत तक बतौर उर्दू मुअल्लिम खिदमत अंजाम दी और 2002में वहीं से बा-इज़्ज़त सुबुकदोश हुए। वे रियासती निसाब की तशकील करने वाले इदारे बालभारती, पुणे से भी जुड़े रहे, जहां उन्होंने उर्दू दरसी कुतुब की तदवीन में नुमाया किरदार अदा किया।

उन्हें तदरीस और शायरी दोनों में रूहानी सुकून मिलता था। वे मानते थे कि इंसान का असल सहारा और रहनुमा सिर्फ़ रब्बे-क़दीर है। अपनी एक मक़बूल ग़ज़ल में वे इसी फ़िक्री अहसास को यूं बयान करते हैं:

नया सफ़र भी नया हौसला भी देता है

सजा के मंज़िलें रस्ता दिखा भी देता है

ज़बान-ओ-दिल में वही राब्ता भी देता है

असर के वास्ते हर्फ़-ए-दुआ भी देता है

हमारा कुछ भी नहीं है तमाम उसका है

वही मिटाता है सब कुछ, बना भी दता है

बज़्म-ए-ग़ालिब की तहरीक और सोलापुर का अदबी माहौल

बशीर परवाज़ महज़ एक क़लमकार नहीं थे, बल्कि वे अपने आप में एक अंजुमन थे। सोलापुर की नामवर अदबी तंज़ीम 'बज़्म-ए-ग़ालिब' के सदर की हैसियत से उन्होंने इस इदारे को महज़ एक रस्मी अंजुमन नहीं रहने दिया, बल्कि एक मुस्तक़िल अदबी तहरीक बना दिया। उन्होंने लगभग बीस बरसों तक बिला-नाग़ा हर इतवार को 'अदबी नशिस्त' का सिलसिला जारी रखा, जहां नौजवान क़लमकारों की तरबियत होती थी और नए शे'रों की इस्लाह की जाती थी।

वे अवाम को किताबों से जोड़ने के लिए हमेशा बेचैन रहते थे। सोलापुर में क़ौमी सतह के दस रोज़ा 'उर्दू किताब मेले' और तीन रोज़ा बैनुल-अक़वामी 'उर्दू मेले' के वे रूह-ए-रवां और मुंतज़िम रहे। तुलबा के अंदर ज़बान की मिठास पैदा करने के लिए उन्होंने उर्दू ड्रामों के मुक़ाबले करवाए और मुशायरों की रिवायत को ज़िंदा रखा।

ज़िंदगी के सफ़र, ग़म-ए-दौरा और तन्हाई के अहसास को उन्होंने बेहद नफ़ीस पैरहन में ढाला था:

जब दिल-ए-शोरिदा सर से बेकली जाती रही

ज़िंदगी से ज़िंदगी की दिलकशी जाती रही

सहरा सहरा उम्र गुज़री क्या करें दरिया का अब

क़तरा क़तरा धूप पी कर तिश्नगी जाती रही

क़ाफ़ियों के शोरो-ग़ुल में बुझ गई फ़िक्र-ए-रसा

फिर हुआ यूं शायरी से शायरी जाती रही

शेरी मिज़ाज, तख़्लीक़ी वुसअत और इंसानी अक़दार

बशीर परवाज़ की शायरी संजीदा फ़िक्र, दिलकश तराकीब और सामाजिक शऊर का बेहतरीन मुरक़्क़ा है। उनका शेरी मजमूआ 'ख़याल' और ज़बान-ओ-अदब की मालूमात पर मबनी किताब 'आमोज़गार' ख़ासी मक़बूल हुईं।

उनकी लिखी हम्द, नातें और नज़्में रियासत के उर्दू मदारिस और स्कूलों में बहुत अक़ीदत-ओ-शौक़ से पढ़ी जाती हैं। औरंगाबाद के मशहूर शायर बशर नवाज़ ने उनके फ़न का एतराफ़ करते हुए लिखा था कि बशीर परवाज़ का उस्लूब ताज़ा-कार लफ़्ज़ों, ख़ूबसूरत पैकरों और शफ़्फ़ाफ़ इस्तिआरों से इबारत है।

वे दौर-ए-हाज़िर की नफ़रतों और सियासी चालबाज़ियों से बेहद मुतअस्सिर थे। उनका मानना था कि अदीब और शायर का सबसे बड़ा मज़हब इंसानियत और अमन है। अपने इस नज़रिए को उन्होंने बड़ी बेबाकी से पेश किया:

शे'र सच्चा हो तो लहजा नहीं देखा जाता

अपने महबूब का शजरा नहीं देखा जाता

इन दिनों अहले-सियासत हैं धरम के रक्षक

गंदे हाथों में नगीना नहीं देखा जाता

नाम पर धरम के, ईमान के, ख़ून-ए-इंसां

साफ़ चादर पे ये धब्बा नहीं देखा जाता

हम ग़ज़ल वाले, मोहब्बत है हमारा मज़हब

हम से ये ख़ून ख़राबा नहीं देखा जाता

उनकी नज़्में भी फ़िक्री गहराई की हामिल थीं। छोटी नज़्मों में वे बड़ी बात कहने का हुनर जानते थे। उनकी मुख़्तसर नज़्म 'डर' इसी फ़ल्सफ़ियाना सोच की मिसाल है:

मुझे ये डर नहीं कि मेरा बच्चा

मेरी बातें कभी सुनता नहीं है, टाल देता है

मुझे डर है तो बस ये है

मेरे हर फ़ेल को वो देखता है

एक अहद का ख़ात्मा

अदब और तालीम के मैदान में बे-मिसाल ख़िदमात के बदले उन्हें महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी की जानिब से रियासती एज़ाज़, कुल हिंद उर्दू अदबी कान्फ्रेंस से तालीमी एवार्ड और लायंस क्लब ऑफ़ सोलापुर से अदबी एवार्ड से नवाज़ा गया।

बशीर परवाज़ के जाने से सोलापुर की ज़मीन ही नहीं, बल्कि पूरी उर्दू दुनिया एक मुश्फ़िक़ उस्ताद, संजीदा नक़्क़ाद और मुख़लिस अदीब से महरूम हो गई है। उन्होंने जो अदबी चराग़ रौशन किए थे, उनकी रोशनी हमेशा आने वाली नस्लों की रहनुमाई करती रहेगी। अल्लाह तआला मरहूम को जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और पसमांदगान को सब्र-ए-जमील दे। आमीन।