भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ता मानवीय संकट

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-06-2026
Escalating humanitarian crisis at the India-Bangladesh border
Escalating humanitarian crisis at the India-Bangladesh border

 

ddपल्लव भट्टाचार्य

भारत और बांग्लादेश के बीच की सीमा कुछ साल पहले तक कूटनीतिक सफलता की एक मिसाल मानी जाती थी। दोनों देशों ने ऐतिहासिक भूमि सीमा समझौता करके दुनिया के सबसे उलझे हुए सीमा विवादों में से एक को सुलझाया था। आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे थे और दोनों पक्षों के बीच एक मजबूत राजनीतिक भरोसा दिख रहा था। आज उसी सीमा के कुछ हिस्सों से बिलकुल अलग और चिंताजनक तस्वीरें सामने आ रही हैं।

सीमा पर कटीली बाड़ के बीच बने नो मैन्स लैंड में फंसे पुरुष, महिलाएं और बच्चे दोनों देशों के सुरक्षा बलों के बीच कूटनीतिक रस्साकशी का जरिया बन गए हैं। भारत के सीमा सुरक्षा बल और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के जवान कई जगहों पर आमने-सामने हैं।

सरकारों के बीच इन असहाय लोगों की राष्ट्रीयता को लेकर गंभीर विवाद चल रहा है। इसने एक ऐसा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है जिसे अब कोई भी पक्ष नजरअंदाज नहीं कर सकता।

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नो मैन्स लैंड में फंसा मानवीय संकट

पश्चिम बंगाल और मेघालय से सटे सीमाई इलाकों में हाल ही में कई ऐसे वाकये हुए हैं जिन्होंने इस समस्या को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। पश्चिम बंगाल के सीमा क्षेत्र में एक मामला सामने आया जहां भारतीय अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर सीमा पार भेजे गए एक व्यक्ति को बांग्लादेशी सुरक्षा बल ने अपनाने से मना कर दिया। बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना था कि बिना उचित राष्ट्रीयता सत्यापन के वे किसी को अपने क्षेत्र में नहीं आने देंगे। वह व्यक्ति दिनों तक दोनों देशों की बंदूकों के साए के बीच भूखा-प्यासा फंसा रहा।

इसी तरह जमालपुर सीमा के पास भी स्थानीय नागरिकों और बांग्लादेशी जवानों ने मिलकर कथित तौर पर जबरन सीमा पार कराने की कोशिशों का विरोध किया। ये घटनाएं किसी एक जगह की नहीं हैं बल्कि सीमा पर गहराते एक बड़े विवाद का हिस्सा बन चुकी हैं। इस गतिरोध के कारण सीमा पर रहने वाले आम लोगों के बीच भारी असुरक्षा और डर का माहौल है।

अवैध प्रवासन और बदली राजनीतिक परिस्थितियां

इस पूरे विवाद की जड़ में अवैध प्रवासन यानी गैर-दस्तावेजी प्रवासियों का मुद्दा है। भारत का यह पुराना रुख रहा है कि बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर होने वाली घुसपैठ ने असम और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों के जनसांख्यिकीय ढांचे को बदल दिया है। यह मुद्दा दशकों से भारत की आंतरिक राजनीति, चुनावी बहसों और सामाजिक तनावों को हवा देता रहा है। हालांकि इस घुसपैठ के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन यह चिंता भारत के राजनीतिक विमर्श में बहुत गहरे तक समाई हुई है।

लंबे समय तक विपक्षी दलों ने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकारों पर प्रवासियों के प्रति नरम रुख अपनाने के आरोप लगाए। राजनीति में यह धारणा बनी कि वोट बैंक के लालच में इन प्रवासियों को पहचान पत्र और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिल जाता है। अब राज्यों में बदली राजनीतिक स्थिति और केंद्र सरकार के कड़े रुख के बाद सीमा पर चौकसी और धरपकड़ की कार्रवाई काफी आक्रामक हो चुकी है। संदिग्ध प्रवासियों को पहचानने, उन्हें हिरासत में लेने और वापस भेजने के प्रयासों में तेजी आई है।

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संप्रभुता का अधिकार बनाम अंतरराष्ट्रीय नियम

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हर संप्रभु राष्ट्र को यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी सीमाओं की रक्षा करे और अपने देश में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों को बाहर निकाले। इस अधिकार पर कोई विवाद नहीं हो सकता। असली चुनौती तब शुरू होती है जब यह तय करना हो कि कोई व्यक्ति वाकई विदेशी है या नहीं और उसे वापस भेजने की कानूनी प्रक्रिया क्या हो।

नियमों के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को सीमा पर ले जाकर जबरन दूसरे देश में धकेल देना कोई कानूनी डिपोर्टेशन या देश निकाला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत इसके लिए सबसे पहले उस देश से मंजूरी और नागरिकता का सत्यापन जरूरी होता है जहां उस व्यक्ति को भेजा जा रहा है। केवल इस अनुमान पर कि कोई व्यक्ति अमुक भाषा बोलता है या वहां से आया होगा, उसे सीमा पार नहीं भेजा जा सकता। जब तक नागरिकता साबित नहीं होती, इस तरह की एकतरफा कार्रवाई केवल कानूनी उलझनें और इंसानी तकलीफें ही बढ़ाती हैं।

बांग्लादेश का रुख भी अब इस मामले में काफी सख्त हो चुका है। ढाका का साफ कहना है कि भारत जिन लोगों को बांग्लादेशी बता रहा है, पहले स्थापित प्रक्रियाओं के माध्यम से उनकी नागरिकता की जांच होनी चाहिए। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश का बिना दस्तावेजों के किसी को भी स्वीकार न करना इसी नीति का हिस्सा है। बांग्लादेश को डर है कि अगर उसने बिना जांच के लोगों को लेना शुरू कर दिया, तो यह एक गलत मिसाल बन जाएगा और भविष्य में किसी भी संदिग्ध नागरिक को उसकी सीमा में धकेल दिया जाएगा।

प्रत्यर्पण और देश निकाला में बड़ा अंतर

यह पूरा संकट तब खड़ा हुआ है जब भारत और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग के दर्जनों समझौते मौजूद हैं।साल 2013 में हुआ प्रत्यर्पण समझौता दोनों देशों के बीच एक बड़ी कामयाबी था।इसके जरिए कई अपराधियों और उग्रवादियों को एक-दूसरे को सौंपा गया।

महत्वपूर्ण अंतर:प्रत्यर्पण एक विशुद्ध न्यायिक प्रक्रिया है जो अदालती आदेशों और ठोस सबूतों के आधार पर अपराधियों के लिए होती है। इसके विपरीत, डिपोर्टेशन या प्रवासियों को वापस भेजना नागरिकता और आव्रजन कानूनों के तहत प्रशासनिक तालमेल पर निर्भर करता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच अपराधियों को सौंपने की व्यवस्था तो मजबूत है लेकिन आम प्रवासियों की पहचान और उनकी सम्मानजनक वापसी के लिए कोई मजबूत और पारदर्शी ढांचा मौजूद नहीं है। यह पूरी व्यवस्था केवल प्रशासनिक सद्भावना पर टिकी हुई है जो थोड़ा सा भी तनाव होने पर ढह जाती है। नागरिकता साबित न होने की स्थिति में ये लोग डि-फैक्टो स्टेटलेस यानी व्यावहारिक रूप से पहचान विहीन हो जाते हैं, जिन्हें कोई देश अपना नहीं मानता।

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वैश्विक अनुभव और समाधान का रास्ता

यह समस्या सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है। अमेरिका और मैक्सिको के बीच सीमा पर प्रवासियों को लेकर हमेशा विवाद रहता है। यूरोपीय देश भूमध्य सागर के रास्ते आने वाले प्रवासियों से परेशान हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया में भी नागरिकता और विस्थापन को लेकर टकराव होते रहे हैं। इन वैश्विक अनुभवों से एक बड़ा सबक मिलता है कि किसी भी प्रवासी को वापस भेजने से पहले संयुक्त सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए।

यूरोप के देशों के बीच हुए 'रीएडमिशन एग्रीमेंट' इस मामले में एक बेहतरीन उदाहरण हैं। इसके तहत देश मिलकर संदिग्ध नागरिकों की पहचान करते हैं, संयुक्त कमेटियां विवादों को सुलझाती हैं और इसके लिए समय सीमा तय होती है ताकि कोई भी इंसान अनिश्चितकाल के लिए अधर में न लटका रहे। भारत और बांग्लादेश को भी इसी तरह का एक समर्पित द्विपक्षीय ढांचा तैयार करने की जरूरत है।

  • दोनों देशों के अधिकारियों को मिलाकर संयुक्त सत्यापन टीमें बनाई जानी चाहिए।
  • डिजिटल डेटाबेस और बायोमेट्रिकतकनीक का उपयोग करके नागरिकता की पुष्टि तेज की जाए।
  • सीमा पर तैनात फील्ड कमांडरों के बीच रीयल-टाइम संवाद होना चाहिए ताकि हिंसक झड़पें न हों।
  • जब तक नागरिकता की जांच चल रही हो, इन लोगों को बाड़ पर छोड़ने के बजाय मानवीय सुविधाओं से लैस ट्रांजिट कैंपों में रखा जाए।

दोनों देशों के नेतृत्व को यह समझना होगा कि इस संवेदनशील और मानवीय मुद्दे को राजनीतिक नफा-नुकसान के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। प्रवासन के पीछे आर्थिक कारण, ऐतिहासिक संबंध और सामाजिक रिश्ते रहे हैं।

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कड़े पहरे के साथ-साथ आर्थिक विकास और वैध श्रम गतिशीलता पर भी बात होनी चाहिए। सीमाएं देशों को बांटती जरूर हैं, लेकिन उन्हें इंसानियत को नहीं मिटाना चाहिए। कूटनीतिक सूझबूझ और आपसी सहयोग से ही इस संकट को सुलझाया जा सकता है ताकि कोई भी इंसान पूरी दुनिया में बेघर और बेनाम न रह जाए।

भारत और बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था और नो मैन्स लैंड की चुनौतियों को समझने के लिए यह वीडियो देखें

यह वीडियो दिखाता है कि किस तरह अवैध रूप से सीमा पार करने की कोशिशों के बाद लोग नो मैन्स लैंड में फंस जाते हैं और दोनों देशों के सुरक्षा बलों के बीच किस तरह का कूटनीतिक और मैदानी गतिरोध पैदा होता है।