Who was Mohammad Ishaq, a trusted warrior of Tatya Tope? AI photo
साकिब सलीम
सन 1857 का साल भारत के इतिहास में एक ऐसा मोड़ था जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी। इस पहले स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे शूरवीर थे जिनकी गाथाएं आज भी इतिहास के पन्नों में कहीं दबी हुई हैं। एक ऐसा ही नाम है मोहम्मद इसहाक का जो नाना साहिब पेशवा के बेहद करीबी और भरोसेमंद सिपहसालार थे। इतिहासकार साकिब सलीम के शोध और राष्ट्रीय अभिलेखागार के दस्तावेजों से इस महान क्रांतिकारी की पूरी कहानी सामने आती है। मोहम्मद इसहाक ने हिंदू मुस्लिम एकता की जो मिसाल पेश की थी वह आज के समय में हर भारतवासी के लिए गर्व का विषय है।
बिठूर के थानेदार से क्रांतिकारी बनने का सफर
मोहम्मद इसहाक का शुरुआती जीवन ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर शुरू हुआ था। वह बिठूर में अंग्रेजों के अधीन एक कुशल थानेदार के रूप में काम कर रहे थे। इस नौकरी के दौरान उन्होंने बहुत करीब से देखा कि किस तरह औपनिवेशिक मशीनरी काम करती है और भारतीयों का शोषण करती है। जब 1857 की क्रांति की चिंगारी भड़की तो उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी को लात मार दी। उन्होंने विदेशी हुकूमत को अंदर से तोड़ने का फैसला किया और देश के राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों से हाथ मिला लिया।
ब्रिटिश हुकूमत के पुराने रिकॉर्ड्स में मोहम्मद इसहाक को बिठूर के नाना साहिब का मुख्य एजेंट यानी नायब बताया गया है। उन्हें कालपी और कानपुर के आसपास के कई गांवों का प्रशासनिक जिम्मा सौंपा गया था। दिसंबर 1857 में जब कानपुर की लड़ाई में क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा तब इसहाक ने ही कालपी में पूरी व्यवस्था को संभाला। उन्होंने नाना साहिब के वायसराय के रूप में नागरिक सरकार का संचालन किया। यह इतिहास का एक ऐसा पहलू है जिसके बारे में हमारी स्कूली किताबों में बहुत कम जानकारी मिलती है।
तात्या टोपे का भरोसा और बुंदेलखंड के राजाओं को पत्र
क्रांति के दौरान मोहम्मद इसहाक का कद कितना बड़ा था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महान सेनानायक तात्या टोपे उन पर अटूट विश्वास करते थे। 31 दिसंबर 1857 को तात्या टोपे ने बुंदेलखंड के प्रमुख शासकों को पत्र लिखे थे।
इन शासकों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई राजा बखत बली राजा नरपत सिंह राजा हिंदूपात राजा मर्दन सिंह कुंवर निरंजन सिंह और राजा रतन सिंह शामिल थे। इन सभी राजाओं को सूचित किया गया कि महाराजा पेशवा के अंगरक्षक सैयद मोहम्मद इसहाक को इस क्षेत्र का काम संभालने के लिए नियुक्त किया गया है।
तात्या टोपे ने सभी बुंदेला और राजपूत प्रमुखों को निर्देश दिया कि वे इसहाक द्वारा भेजे जाने वाले सर्कुलर का पूरी तरह पालन करें। मोहम्मद इसहाक ने खुद यह सर्कुलर तैयार किया था जो आज भी भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित रखा हुआ है।
इस पत्र में उन्होंने बहुत ही स्पष्ट और मजबूत राजनीतिक तर्क दिए थे। उन्होंने राजाओं को समझाया कि पेशवा की यह लड़ाई उनकी जमीनों को हड़पने या भारत पर अपना राज कायम करने के लिए नहीं है। इस लड़ाई का एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना है ताकि सभी राजा अपनी रियासतों में शांति और खुशहाली से रह सकें।
हिंदू मुस्लिम एकता और साझी मातृभूमि का संकल्प
2 जनवरी 1858 को मोहम्मद इसहाक ने एक ऐतिहासिक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने साफ किया कि उनके आका श्रीमंत महाराज पेशवा बहादुर हिंदू और मुसलमान दोनों के धर्मों की रक्षा के लिए मैदान में उतरे हैं। यह पत्र इस बात का पुख्ता सबूत है कि 1857 का संग्राम किसी एक धर्म का नहीं बल्कि पूरी मातृभूमि का साझा संघर्ष था। एक मुस्लिम अधिकारी का मराठा हिंदू शासक की तरफ से राजपूत और बुंदेला राजाओं को पत्र लिखना एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत थी।
इसहाक का मानना था कि यह लड़ाई एक मजहब की दूसरे मजहब के खिलाफ नहीं है। यह सभी धर्मों के लोगों का एक साझा दुश्मन के खिलाफ विद्रोह था। उन्होंने साफ किया कि अंग्रेजों के कब्जे वाले प्रांतों को जीत के बाद उन लोगों में बांट दिया जाएगा जो इस आजादी की जंग में आगे आएंगे। इस स्पष्ट विजन की वजह से ही अलग अलग विचारधाराओं के राजा एक झंडे के नीचे आने को तैयार हुए थे।
खुफिया तंत्र के माहिर और सैन्य रणनीतिकार
मोहम्मद इसहाक सिर्फ पत्र लिखने वाले मुंशी या सलाहकार नहीं थे बल्कि वह एक बेहतरीन सैन्य रणनीतिकार भी थे। जब ब्रिटिश सेना ने कालपी पर दोबारा कब्जा किया तो उन्हें इसहाक के कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले। इन कागजात से पता चला कि इसहाक ने पूरे इलाके में एक बहुत ही मजबूत खुफिया नेटवर्क तैयार किया था। उन्होंने नदियों के घाटों और रास्तों पर नजर रखने के लिए करीब 100 डाक हरकारों की नियुक्ति की थी।
यह हरकारे ब्रिटिश सेना की हर छोटी बड़ी हरकत पर नजर रखते थे और उसकी जानकारी क्रांतिकारी कमांडरों तक पहुंचाते थे। इसहाक ने चिल्ला तारा घाट पर बकायदा समाचार लेखकों को तैनात किया था जिन्हें नियमित वेतन दिया जाता था।
इन लेखकों का काम अंग्रेजी फौज की ताकत और उनकी नावों की आवाजाही को ट्रैक करना था। इस तरह वह नाना साहिब की क्रांतिकारी सरकार के लिए एक बेहतरीन इंटेलिजेंस विंग चला रहे थे। ब्रिटिश कानून की बारीकियों को जानने के कारण ही वह अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में मात देने में सफल रहे।
कालपी का ऐतिहासिक मोर्चा और अंतिम सांस तक संघर्ष
मई 1858 तक आते आते जब अंग्रेजों का दबाव बढ़ने लगा तो मोहम्मद इसहाक बांदा के नवाब के साथ मिलकर कालपी पहुंचे। वह अपने साथ दो से तीन हजार लड़ाके और भारी तोपें लेकर आए थे। ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक इसहाक के आने से कालपी में मौजूद विद्रोहियों के हौसले बुलंद हो गए थे। उस समय कालपी में झांसी की रानी और तात्या टोपे जैसे महान नेता मौजूद थे और इसहाक ने इस पूरी ताकत को एक साथ जोड़ने में मदद की थी।
कालपी और उसके बाद ग्वालियर के पतन के बाद भी इसहाक ने हार नहीं मानी। महोना में जब क्रांतिकारियों की एक गुप्त युद्ध परिषद की बैठक हुई तो देश के भविष्य को लेकर बड़ा फैसला लिया जाना था। उस मेज पर पेशवा के उत्तराधिकारी राव साहिब सैन्य मामलों के प्रमुख तात्या टोपे और नागरिक मामलों के प्रबंधक के तौर पर मोहम्मद इसहाक मौजूद थे।
झांसी की रानी भी उस बैठक का हिस्सा थीं। जब कई सिपाही हिम्मत हार चुके थे तब अंतिम निर्णय लेने वाले तीन प्रमुख नेताओं में राव साहिब तात्या टोपे के साथ मोहम्मद इसहाक का नाम शामिल था। इन तीनों ने ही मिलकर ग्वालियर की तरफ कूच करने का आखिरी ऐतिहासिक आदेश जारी किया था।
इतिहास के पन्नों में खो गया एक महान देशभक्त
भारत को आजादी मिलने के बाद भी मोहम्मद इसहाक जैसे नायकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। हम 1857 की क्रांति को राष्ट्रीय चेतना का पहला प्रतीक मानते हैं लेकिन उन चेहरों को भूल जाते हैं जिन्होंने इसकी असली बुनियाद रखी थी। हिंदू और मुसलमान उस दौर में केवल रणनीतिक साझेदार नहीं थे बल्कि वे एक ही मिट्टी के सपूत थे जो अपनी धरती मां के लिए लड़ रहे थे।
एक सैयद मुस्लिम का मराठा पेशवा की सेवा करना और राजपूत राजाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना यह दर्शाता है कि उस समय देश का धर्म सबसे बड़ा था। मोहम्मद इसहाक की कहानी हमें याद दिलाती है कि भारत की आजादी की नींव में हर वर्ग का खून शामिल है। आज के समय में इस गुमनाम क्रांतिकारी के योगदान को रेखांकित करना और उसे इतिहास में सही स्थान देना बेहद जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां देश की इस साझी विरासत को समझ सकें।