यूएई और सऊदी का नया दांव, लाइफ साइंसेज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-06-2026
UAE and Saudi Arabia's new bet: Life Sciences.
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एलेक्स अब्राहम

दुनिया भर में हेल्थकेयर को हमेशा से एक सामाजिक जरूरत या सरकारी खर्च के हिस्से के रूप में देखा गया है। सरकारों का ध्यान अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने, मरीजों के इलाज और सार्वजनिक बजट के प्रबंधन पर ही केंद्रित रहता था। लेकिन आज मिडिल ईस्ट इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल रहा है। खाड़ी देश अब लाइफ साइंसेज को केवल इलाज का जरिया नहीं बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक मुख्य जरिया मान रहे हैं।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति, रिसर्च, दवा उत्पादन और नई टेक्नोलॉजी के दम पर यह पूरा क्षेत्र एक बड़े औद्योगिक बदलाव की तरफ बढ़ रहा है।

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बदलती सोच और नया आर्थिक मॉडल

लंबे समय तक मिडिल ईस्ट की पहचान तेल और गैस आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में रही है। लेकिन अब समय बदल चुका है। आर्थिक विविधीकरण यानी इकोनॉमिक डाइवर्सिफिकेशन आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।

यूएई और सऊदी अरब जैसे देश यह समझ चुके हैं कि भविष्य की स्थिरता के लिए सिर्फ पारंपरिक उद्योगों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। यही वजह है कि लाइफ साइंसेज को अब एक रणनीतिक स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है। यह क्षेत्र न केवल नए रोजगार पैदा कर रहा है बल्कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का काम भी कर रहा है।

कोरोना महामारी और हाल के वर्षों में उपजी वैश्विक सप्लाई चेन की दिक्कतों ने दुनिया को एक बड़ा सबक सिखाया। जब जरूरी दवाएं और मेडिकल उपकरण किसी एक देश या क्षेत्र में सीमित हो जाते हैं, तो संकट के समय दूसरे देशों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

खाड़ी देशों ने इस कमजोरी को बहुत जल्दी भांप लिया। उन्होंने महसूस किया कि स्वास्थ्य सुरक्षा तब तक अधूरी है जब तक कि लाइफ साइंसेज की पूरी वैल्यू चेन पर खुद का नियंत्रण न हो। अब यह पूरा इलाका दवाओं के आयात पर निर्भर रहने के बजाय खुद को एक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित कर रहा है।

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यूएई का ऑपरेशन 300बिलियन और विज़न 2031

इस बदलाव की अगुवाई संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई बहुत आक्रामक तरीके से कर रहा है। यूएई का 'ऑपरेशन 300बिलियन' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस महात्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य 2031तक देश की जीडीपी में औद्योगिक क्षेत्र के योगदान को 133अरब दिर्हम से बढ़ाकर 300अरब दिर्हम करना है।

इस योजना के तहत फार्मास्यूटिकल्स और मेडिकल डिवाइसेज को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में रखा गया है। यूएई अब केवल विदेशी कंपनियों के लिए एक बाजार नहीं है, बल्कि वह खुद एक निर्माता बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

इसके साथ ही यूएई का नेशनल जीनोम प्रोग्राम और एआई आधारित डायग्नोस्टिक्स इस रणनीति के केंद्र में हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके बीमारियों का पहले ही पता लगाना और व्यक्तिगत इलाज मुहैया कराना अब हकीकत बनता जा रहा है।

हाल ही में संपन्न हुए 'मेक इट इन द एमिरेट्स' कार्यक्रम में भी यही रुख देखने को मिला। इस आयोजन में एडवांस हेल्थ इनोवेशन, फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग और मेडिकल टेक्नोलॉजी को देश के औद्योगिक परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में प्रदर्शित किया गया।

सऊदी विज़न 2030और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा

दूसरी तरफ सऊदी अरब अपने 'विज़न 2030' के माध्यम से लाइफ साइंसेज के क्षेत्र में अभूतपूर्व निवेश कर रहा है। सऊदी अरब का लक्ष्य पूरे मध्य पूर्व में सबसे बड़ा बायोटेक और फार्मास्यूटिकल हब बनना है। इसके लिए देश में बड़े पैमाने पर रिसर्च सेंटर और अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित की जा रही हैं। सऊदी अरब न केवल अपने नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर कर रहा है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर चिकित्सा अनुसंधान में भी अग्रणी भूमिका निभाना चाहता है।

इस प्रकार यूएई और सऊदी अरब के बीच की यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पूरे मिडिल ईस्ट को लाइफ साइंसेज के एक ग्लोबल डेस्टिनेशन में बदल रही है। पहले जहां खाड़ी देश पश्चिमी देशों से तकनीक और प्रतिभाओं का आयात करते थे, वहीं अब वे खुद वैश्विक स्तर पर पेटेंट और नई खोजें दर्ज करा रहे हैं।

प्राइवेट सेक्टर की भूमिका और रोजगार के अवसर

सरकारी नीतियों और विज़न ने जो मजबूत नींव तैयार की है, उसका असली फायदा अब दिखने लगा है। लेकिन इस पूरी यात्रा में निजी क्षेत्र यानी प्राइवेट सेक्टर की भूमिका केवल सरकारी फायदों का लाभ उठाने तक सीमित नहीं है। प्राइवेट कंपनियों को अब सक्रिय रूप से ऐसी काबिलियत और इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना होगा जो इस क्षेत्र के वैज्ञानिक और व्यावसायिक उद्देश्यों को पूरा कर सके।

इस औद्योगिक क्रांति का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय युवाओं को मिल रहा है। खाड़ी देशों में लाइफ साइंसेज प्रोफेशनल्स की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है। अब यहां के वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और रिसर्चर्स को करियर बनाने के लिए यूरोप या अमेरिका जाने की जरूरत नहीं है। उनके लिए अपने ही देश में विश्वस्तरीय प्रयोगशालाएं और अवसर मौजूद हैं। विश्वविद्यालय और उद्योग जगत आपस में मिलकर काम कर रहे हैं ताकि अकादमिक रिसर्च को सीधे बाजार की जरूरतों से जोड़ा जा सके।

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वैश्विक साझेदारी और भविष्य की राह

मिडिल ईस्ट की यह रणनीति केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। कंपनियां और सरकारें मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थानों, नीति निर्माताओं, स्वास्थ्य पेशेवरों और अनुसंधानकर्ताओं के साथ मजबूत नेटवर्क बना रही हैं। नवाचार, विनिर्माण और प्रतिभाओं में निवेश बढ़ने से वैश्विक स्तर की बड़ी फार्मा कंपनियां अब इस क्षेत्र की तरफ आकर्षित हो रही हैं। वे यहां अपने रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर खोल रही हैं।

सहायक सरकारी नीतियां, बढ़ती वैज्ञानिक विशेषज्ञता, आधुनिक बुनियादी ढांचा और दीर्घकालिक निजी निवेश मिलकर एक टिकाऊ भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। जैसे-जैसे यह पूरा इकोसिस्टम परिपक्व हो रहा है, मिडिल ईस्ट लाइफ साइंसेज के क्षेत्र में दुनिया का नया पावरहाउस बनकर उभर रहा है।

अब कोई भी देश इस क्षेत्र में लीडरशिप का दावा सिर्फ इस आधार पर नहीं कर सकता कि उसके पास कितने अस्पताल हैं। असली लीडरशिप इस बात से तय होगी कि वह देश क्या रिसर्च करता है, क्या मैन्युफैक्चर करता है और किस स्तर की प्रतिभाओं को दुनिया के सामने पेश करता है। मिडिल ईस्ट ने इस खेल के नियम पूरी तरह बदल दिए हैं।

(साभारः लेखक गल्फ न्यूज के सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं)