डॉ. फ़िरदौस ख़ान
मुहर्रम सिर्फ़ शोक का ही महीना नहीं है, बल्कि यह संयम, साहस, समर्पण, धैर्य, विश्वास और नैतिक मूल्यों पर क़ायम रहने का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि जब पूरी दुनिया आपके ख़िलाफ़ खड़ी हो, तब भी सच की राह नहीं छोड़नी चाहिए। यह इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और हिजरी साल की शुरुआत संयम के इसी महीने से होती है। इसी महीने में कर्बला के मैदान में अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समेत 72लोगों को बेरहमी से शहीद कर दिया गया था। अगर दुनिया में संयम, साहस, धैर्य, विश्वास और समर्पण की पराकाष्ठा देखनी हो, तो कर्बला को देखना चाहिए।
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मदीना से अपने घरवालों और साथियों के साथ कूफ़ा के लिए रवाना हुए थे। उनके क़ाफ़िले में 123लोग थे, जिनमें दुधमुंहे बच्चे, औरतें, बुज़ुर्ग और बीमार भी शामिल थे। यज़ीद की फ़ौज ने उन्हें कर्बला के मैदान में रोक लिया और उन पर यज़ीद का समर्थन करने के लिए दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं मानी। इस पर यज़ीद ने दरिया-ए-फ़ुरात पर पहरा लगवा दिया और उनके पानी लेने पर सख़्ती से रोक लगा दी गई।

तीन दिन गुज़र जाने के बाद जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ख़ानदान के बच्चे प्यास से तड़पने लगे, तो उन्होंने यज़ीद की फ़ौज से पानी के लिए कहा। फ़ौज ने पानी देने से मना कर दिया, ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके। लेकिन बच्चों को भूख-प्यास से तड़पता देखकर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपनी बात पर क़ायम रहे।
आख़िरकार फ़ौज ने उनके ख़ेमों पर हमला कर दिया। इस हमले में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समेत उनके ख़ानदान के 72लोग शहीद हो गए। इनमें छह महीने से लेकर तेरह साल तक के बच्चे भी शामिल थे। दुश्मनों ने छह महीने के मासूम अली असग़र के गले पर तीन नोक वाला तीर मारकर उन्हें भी शहीद कर दिया।
उन्होंने सात साल आठ महीने के औन और मुहम्मद यानी आपकी बहन के बेटों के सिर पर तलवार से वार कर उन्हें भी शहीद कर दिया। उन्होंने तेरह साल के हज़रत क़ासिम को घोड़ों की टापों से कुचल कर शहीद कर दिया। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने ख़ानदान के लोगों और साथियों के साथ शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने सच का रास्ता नहीं छोड़ा।
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने दुश्मनों को भी माफ़ कर दिया करते थे। अल-हुर्र ने हज़रत इमाम हुसैन के ख़ानदान वालों को पानी देने से रोका था। जब उसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ, तो उसने उनसे माफ़ी मांगी और उन्होंने उसे माफ़ करके गले लगा लिया।
इसके बाद उसने यज़ीद की फ़ौज छोड़ दी और हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तरफ़ से लड़ते हुए शहीद हो गया। यह वाक़िया इस बात का प्रमाण है कि आले-रसूल ने हमेशा संयम और धैर्य का परिचय देते हुए अपने दुश्मनों को भी माफ़ किया है।
कर्बला के मैदान में अपने भाइयों, बेटों और पूरे ख़ानदान को खोने के बाद भी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत ज़ैनब सलाम उल्लाह अलैहा ने हिम्मत नहीं हारी। जब उन्हें हाथों और पैरों में जंजीरें पहनाकर क़ैद किया गया और यज़ीद के दरबार में ले जाया गया, तब भी उन्होंने संयम, साहस और धैर्य का परिचय देते हुए ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द की। यह वाक़िया उनके अप्रतिम साहस और विपरीत परिस्थितियों में मानसिक संतुलन व धैर्य बनाए रखने की सबसे बड़ी मिसाल है।
मुहर्रम जनमानस को सच के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने और दूसरों की मदद करने का संदेश देता है। यह गर्व की बात है कि मुसलमान मुसीबत के वक़्त पीड़ितों की दिल खोलकर मदद करते आए हैं, भले ही उनका कितना ही नुक़सान क्यों न हो जाए। हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में जब एक होटल में आग लग गई, तो गद्दा कारोबारी रियाज़ुद्दीन ने सड़क पर गद्दे बिछा दिए, ताकि लोग उन पर कूदकर अपनी जान बचा सकें।
उनकी इस कोशिश से बहुत से लोगों की जान बच गई। ऐसी हज़ारों-लाखों मिसालें हैं। लोग भूखे-प्यासों के लिए खाने और पानी का इंतज़ाम करते हैं। इससे समाज में इस्लाम का आपसी सद्भाव, प्रेम और भाईचारे का पैग़ाम पहुंचता है।
दरअसल, इस्लाम अमन का पैग़ाम देता है, संयम, साहस और धैर्य का पैग़ाम देता है। क्रोध हर बुराई की जड़ है। जिसने इस पर क़ाबू पा लिया, उसने ख़ुद को बुराई से बचा लिया। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने ग़ुस्से को क़ाबू करने की हिदायत दी है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “यही वे लोग हैं, जो ख़ुशहाली और तकलीफ़ दोनों ही हालात में अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं और ग़ुस्से को ज़ब्त करते हैं और लोगों की ख़ताओं को दरगुज़र करते हैं. और अल्लाह मोहसिनों से मुहब्बत करता है।“ (क़ुरआन 3:134)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है- “और मेहरबान अल्लाह के मुख़लिस बन्दे वे हैं, जो ज़मीन पर आहिस्ता से चलते हैं और जब जाहिल उनसे जिहालत की बात करते हैं, तो वे ग़ुस्सा करने की बजाय कहते हैं कि तुम पर सलाम हो।“ (क़ुरआन 65:63)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी लोगों को बार-बार ग़ुस्सा न करने की नसीहत दी है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- "अगर तुममें से किसी को ग़ुस्सा आए, तो उसे ख़ामोश रहना चाहिए।" (मुसनद अहमद 2137)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- "अगर तुममें से किसी को ग़ुस्सा आए और वह खड़ा हो, तो उसे बैठ जाना चाहिए, ताकि उसका ग़ुस्सा ख़त्म हो जाए; अगर ऐसा न हो, तो उसे लेट जाना चाहिए।" (सहीह इब्न हिब्बान 5688)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “ग़ुस्सा शैतान की तरफ़ से आता है और शैतान आग से बना है। आग पानी से बुझाई जाती है, इसलिए जब तुम्हें ग़ुस्सा आए, तो पानी से वुज़ू कर लो।" (सुनन अबू दाऊद 4784)
हज़रत इब्राहिम बिन अबू अब्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि मैंने हज़रत उम्मे दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु को हज़रत अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु के हवाले से बयान करते हुए सुना। उन्होंने कहा- मैंने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! मुझे कोई ऐसा अमल बताएं, जो मुझे जन्नत में ले जाए। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "ग़ुस्सा मत करो, तुम्हारे लिए जन्नत है। (तबरानी 2353)
क़ुरआन और हदीसों से सबक़ मिलता है कि संयम का दामन थामने वाले लोग अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों ही संवार लेते हैं। यही इस्लाम का संदेश भी है। सलाम है उन लोगों पर जो दूसरों की मदद करके इस्लाम के इस संदेश को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा रहे हैं।
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)