मुहर्रम क्यों आज भी प्रासंगिक है ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-06-2026
Why is Muharram still relevant today?
Why is Muharram still relevant today?

 

rrमौलाना जावेद हैदर ज़ैदी

इस्लामी कैलेंडर के पवित्र महीने मुहर्रम की शुरुआत होते ही दुनिया भर में करोड़ों लोग मानव इतिहास की एक बेहद दर्दनाक और क्रांतिकारी घटना को याद करने लगते हैं। यह मौका पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन इब्न अली और उनके साथियों की शहादत को याद करने का है। कर्बला की इस ऐतिहासिक जंग को सिर्फ एक समुदाय के शोक या मातम के तौर पर देखना इसे बेहद सीमित दायरे में बांधने जैसा होगा। असल में मुहर्रम का यह समय आत्मनिरीक्षण, नैतिक सुधार और न्याय के प्रति अपनी जिम्मेदारी को दोहराने का एक वैश्विक मंच है।

इस महान शहादत को गुजरे हुए तेरह सदियों से भी ज्यादा का लंबा वक्त बीत चुका है। इसके बावजूद इमाम हुसैन की आवाज आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली नजर आती है। आज की दुनिया जहां राजनीतिक उथल पुथल, सामाजिक असमानता, धार्मिक कट्टरता और नैतिक पतन के दौर से गुजर रही है, वहां कर्बला का मैदान पूरी इंसानियत को एक सही रास्ता दिखाता है। यह घटना दुनिया भर के विचारशील और जागरूक लोगों के लिए उम्मीद की एक ऐसी किरण है जो कभी धुंधली नहीं पड़ती।

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सत्ता की भूख नहीं सिद्धांतों की लड़ाई थी कर्बला

इमाम हुसैन के इस महान बलिदान का महत्व किसी खास भूगोल, इतिहास या मजहबी पहचान तक सीमित नहीं है। उनका यह संघर्ष किसी राजनीतिक सत्ता को हथियाने, अपनी सल्तनत बढ़ाने या व्यक्तिगत ताकत का प्रदर्शन करने के लिए नहीं था।

इसके विपरीत यह जंग दमन, भ्रष्टाचार और समाज में खत्म हो रहे मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए छेड़ा गया एक जागरूक आंदोलन था। अपने सर्वोच्च बलिदान के जरिए उन्होंने नैतिक नेतृत्व का एक ऐसा पैमाना स्थापित किया जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।

इमाम हुसैन का लालन पालन पैगंबर मोहम्मद, इमाम अली और बीबी फातिमा जैसी महान शख्सियतों की देखरेख में हुआ था। उन्हें विरासत में न्याय, करुणा, बुद्धिमत्ता और मानवता के प्रति समर्पण जैसे गुण मिले थे। जब उनके दौर में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था ने सिर उठाया जो धर्म की आड़ में तानाशाही और अन्याय को बढ़ावा दे रही थी, तो इमाम हुसैन ने अपने जमीर से समझौता करने से साफ इनकार कर दिया। उनका यह कदम कोई बगावत नहीं बल्कि समाज के प्रति एक बड़ी नैतिक जिम्मेदारी का निर्वाह था।

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हक और बातिल के बीच का सीधा मुकाबला

कर्बला की यात्रा कोई सैन्य अभियान नहीं थी बल्कि यह पूरी तरह से एक वैचारिक आंदोलन था। सन 680 ईस्वी में कर्बला के तपते हुए मैदान में जो कुछ भी घटा, उसने दुनिया के सामने ताकत और सिद्धांतों के बीच के अंतर को पूरी तरह साफ कर दिया। एक तरफ आधुनिक हथियारों, असीमित संसाधनों और राजकीय सत्ता से लैस एक विशाल फौज खड़ी थी। दूसरी तरफ इमाम हुसैन और उनके महज 72 साथियों का एक छोटा सा समूह था जिनके पास हथियार तो कम थे लेकिन उनका अटूट विश्वास और सच के प्रति निष्ठा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

मुहर्रम के दसवें दिन जिसे आशुरा कहा जाता है, यह ऐतिहासिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। यजीदी सेना ने इमाम हुसैन के खेमे पर जुल्म की तमाम हदें पार कर दीं। बच्चों और महिलाओं तक के लिए कई दिनों तक पानी बंद कर दिया गया।

भयंकर गर्मी और प्यास की शिद्दत के बावजूद सच के रास्ते पर चलने वाले इन लोगों के कदम जरा भी नहीं डगमगाए। इमाम हुसैन की शहादत को उनके मिशन का अंत समझना सबसे बड़ी भूल होगी। असल में यह एक ऐसी वैचारिक क्रांति की शुरुआत थी जिसने आने वाली सदियों का रुख हमेशा के लिए बदल दिया।

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मानवीय गरिमा और नैतिक जिम्मेदारी का पाठ

कर्बला के पूरे वाकये में छिपा हुआ मानवीय संदेश बेहद गहरा है। बेकसूर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर हुए जुल्म ने इस त्रासदी को मानवीय गरिमा का एक वैश्विक प्रतीक बना दिया। इस घटना ने दुनिया को यह सिखाया कि बिना नैतिकता के मिली हुई ताकत हमेशा विनाश और उत्पीड़न की तरफ ही ले जाती है। कर्बला हमें याद दिलाता है कि समाज के हर नागरिक की देश और दुनिया के प्रति एक जवाबदेही होती है। आप चाहे पत्रकार हों, शिक्षक हों, नेता हों या आम नागरिक, अन्याय के खिलाफ खड़े होना सबका समान कर्तव्य है।

आज की आधुनिक दुनिया में भी अन्याय के रूप भले ही बदल गए हों लेकिन उसकी फितरत वही है। गरीबी, नस्लीय भेदभाव, भ्रष्टाचार, हिंसा और झूठी जानकारियों का प्रसार आज के दौर के नए जुल्म हैं। ऐसे में इमाम हुसैन का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक सफलता केवल भौतिक सुख-सुविधाओं या सत्ता को हासिल करने में नहीं है। असली कामयाबी इस बात में है कि आप विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और इंसानियत को जिंदा रखें।

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बीबी जैनब का साहस और मुहर्रम की असली सीख

इमाम हुसैन की शहादत के बाद कर्बला के इस संदेश को जिंदा रखने में उनकी बहन बीबी जैनब बिन्त अली की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। कर्बला के मैदान में सब कुछ लुटा देने के बाद बीबी जैनब ने अपने शोक और दर्द को एक मजबूत प्रतिरोध में बदल दिया।

उन्होंने यजीद के भरे दरबार में अपनी वाकपटुता, निडरता और गहरे विश्वास के जरिए उस सच को सबके सामने रखा जिसे राजनीतिक प्रोपेगैंडा के नीचे दबाने की कोशिश की जा रही थी। उनका यह नेतृत्व आज भी महिलाओं के बौद्धिक साहस और मानसिक दृढ़ता की सबसे बड़ी मिसाल है।

एक अनमोल सीख:मुहर्रम को सिर्फ आंसू बहाने या विलाप करने के दिनों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह हकीकत में नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी की एक चलती-फिरती पाठशाला है।

मुहर्रम की मजलिसों और सभाओं का असली मकसद इंसानों के भीतर से अज्ञानता को मिटाकर ज्ञान का उजाला फैलाना होना चाहिए। यह समय नफरत को करुणा से, आपसी मतभेदों को एकता से और सामाजिक अन्याय को सामूहिक प्रयासों से बदलने की प्रेरणा देता है। इमाम हुसैन को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए रास्ते पर चलें। आज पूरी दुनिया को ऐसे नेताओं और नागरिकों की जरूरत है जो सत्ता के ऊपर नैतिकता को और निजी फायदे के ऊपर सच को तरजीह दें।

कर्बला के ऐतिहासिक संदर्भ और इमाम हुसैन के संदेश की गहराई को समझने के लिए इस ज्ञानवर्धक चर्चा को देखें

यह वीडियो मुहर्रम के इतिहास के साथ-साथ उसके आध्यात्मिक और मानवीय पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डालता है जिससे इस विषय को समझने में मदद मिलती है।