गुलाम कादिर
दुनिया भर के मुसलमानों की निगाहें इन दिनों सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का पर टिकी हुई हैं। मंगलवार को एक ऐसी परंपरा निभाई जाएगी, जिसका संबंध सीधे इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल काबा से है। मुहर्रम की पहली तारीख को हर साल काबा को ढकने वाले विशेष काले कपड़े यानी किसवा को बदला जाता है। इस्लामी कैलेंडर में मुहर्रम नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और इसी दिन यह ऐतिहासिक रस्म अदा की जाती है।
काबा का किसवा केवल एक कपड़ा नहीं है। यह इस्लामी इतिहास, आस्था, कला और कारीगरी का अनमोल प्रतीक है। हर साल लाखों हाजी और उमराह करने वाले श्रद्धालु इस पवित्र चादर को देखकर भावुक हो जाते हैं। बहुत से लोग इसे छूने और इसके करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं।
काबा इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है। यह मक्का स्थित मस्जिद अल हराम के केंद्र में स्थित है। दुनिया भर के मुसलमान अपनी पांचों नमाज इसी दिशा की ओर मुंह करके पढ़ते हैं। इसी दिशा को किबला कहा जाता है।इस्लामी मान्यताओं के अनुसार काबा का निर्माण हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से किया था।
यह स्थान तौहीद यानी एक ईश्वर की उपासना का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।हर साल हज और उमराह के लिए करोड़ों लोग मक्का पहुंचते हैं। काबा उनकी इबादत और आध्यात्मिक यात्रा का केंद्र होता है।
किसवा वह विशेष काला रेशमी कपड़ा है जो पूरे काबा को ढकता है। अरबी भाषा में किसवा का अर्थ है ढकने वाला वस्त्र।आज का किसवा लगभग 14 मीटर ऊंचा होता है और इसे 47 बड़े हिस्सों को जोड़कर तैयार किया जाता है। इसके ऊपर सुनहरे और चांदी के धागों से कुरआन की आयतें कढ़ाई की जाती हैं।
काबा के चारों ओर दिखाई देने वाली सुनहरी पट्टी को हिजाम कहा जाता है। यह लगभग 95 सेंटीमीटर चौड़ी और 47 मीटर लंबी होती है। काबा के दरवाजे पर लगी विशेष सजावटी चादर को सितारा कहा जाता है, जिसे किसवा का सबसे सुंदर और आकर्षक हिस्सा माना जाता है।
इतिहासकारों का मानना है कि काबा को ढकने की परंपरा इस्लाम से पहले भी मौजूद थी। कई इतिहासकारों के अनुसार यमन के राजा तुब्बा असअद कामिल ने लगभग 400 ईस्वी में पहली बार काबा पर विशेष कपड़ा चढ़ाया था।इस्लाम के आगमन के बाद यह परंपरा और अधिक व्यवस्थित रूप में जारी रही। उमय्यद, अब्बासी, अय्यूबी, ममलूक और उस्मानी सल्तनतों के दौर में भी किसवा तैयार किया जाता रहा।
समय के साथ इसका रंग और डिजाइन बदलता रहा। इतिहास में सफेद, हरा, लाल और पीले रंग के किसवे भी इस्तेमाल किए गए। बाद में काला रंग इसकी स्थायी पहचान बन गया।
The sacred Kiswah replacement ceremony of the Holy Ka’bah for 1448 AH is scheduled for the night of Tuesday, June 16, 2026.
Following the Asr prayer, preparations will begin with the installation of the Shadharawan support rings at the base of the Ka’bah, along with the removal… pic.twitter.com/9GAQOe4huH— Motivation with Faith (@MWFaithOfficial) June 14, 2026
किसवा कैसे तैयार होता है
आज का किसवा पूरी तरह प्राकृतिक रेशम से बनाया जाता है। इसके निर्माण में लगभग 670 किलोग्राम रेशम का उपयोग किया जाता है।इस पर करीब 120 किलोग्राम 24 कैरेट सोने के धागे और 100 से 120 किलोग्राम चांदी के धागों से कढ़ाई की जाती है।
मक्का स्थित किसवा फैक्ट्री में 240 से अधिक विशेषज्ञ कारीगर इस काम में जुटे रहते हैं। आधुनिक तकनीक के साथ पारंपरिक अरबी सुलेख और हस्तकला का उपयोग किया जाता है।रेशम को पहले विशेष साबुन और पानी से साफ किया जाता है। इसके बाद कई चरणों में धोकर उसे काला रंग दिया जाता है। फिर महीनों तक कढ़ाई और सिलाई का काम चलता है।
किसवा पर कुरआन की कई महत्वपूर्ण आयतें लिखी जाती हैं। इसमें शाहादा यानी इस्लामी आस्था का घोषणापत्र भी शामिल होता है।इसके अलावा हज, तौहीद, अल्लाह की महानता और काबा की पवित्रता से जुड़ी आयतें भी सुनहरे धागों से उकेरी जाती हैं।यही वजह है कि किसवा केवल एक सजावटी वस्त्र नहीं बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखने वाला प्रतीक माना जाता है।
ستقام مراسم استبدال كسوة الكعبة المشرفة للعام الهجري 1448 هـ في غرة شهر محرم.
حيث ستتولى الهيئة العامة للعناية بشؤون المسجد الحرام والمسجد النبوي استبدال الكسوة القديمة بالجديدة 🕋#كسوة_الكعبة pic.twitter.com/1MjTXJ5RJ7— أخبار الحج والعمرة (@Hajj_news) June 14, 2026
किसवा बदलने की प्रक्रिया कैसे होती है
हर साल एक विशेष टीम पुराने किसवा को हटाकर नया किसवा लगाती है। यह प्रक्रिया बेहद सावधानी और धार्मिक सम्मान के साथ पूरी की जाती है।पुराना किसवा हटाने के बाद उसे सुरक्षित रखा जाता है। इसके सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों को संरक्षित किया जाता है। जिन हिस्सों पर सोने और चांदी की कढ़ाई होती है, उन्हें संग्रहालयों और प्रतिष्ठित संस्थानों को भेंट किया जाता है।
कुछ छोटे टुकड़े विशेष मेहमानों, सरकारी प्रतिनिधियों और विदेशी दूतावासों को भी दिए जाते हैं।इसी वजह से पुराने किसवा के कुछ हिस्से बाद में निजी संग्रहों और नीलामी बाजारों तक भी पहुंच जाते हैं।
किसवा दुनिया के सबसे महंगे धार्मिक वस्त्रों में गिना जाता है। इसके निर्माण पर हर साल 2.5 करोड़ सऊदी रियाल से अधिक खर्च आता है।भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत 55 करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठती है।इतनी बड़ी लागत केवल रेशम और कीमती धागों के कारण नहीं होती बल्कि इसमें शामिल महीनों की मेहनत, विशेष कारीगरी और धार्मिक महत्व भी इसकी कीमत बढ़ाते हैं।

काबा का किसवा केवल एक कपड़ा नहीं है। यह इस्लामी सभ्यता, कला, सुलेख, कारीगरी और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।हर साल जब नया किसवा काबा पर चढ़ाया जाता है तो यह सिर्फ एक रस्म नहीं होती। यह उस ऐतिहासिक परंपरा की याद दिलाती है जो सदियों से चली आ रही है और आज भी दुनिया भर के मुसलमानों के दिलों में उसी सम्मान के साथ जीवित है।
काबा का किसवा कब बदला जाता है?
मुहर्रम की पहली तारीख को हर साल नया किसवा चढ़ाया जाता है।
किसवा किस चीज से बनता है?
प्राकृतिक रेशम, सोने और चांदी के धागों से।
किसवा की कीमत कितनी होती है?
करीब 2.5 करोड़ सऊदी रियाल से अधिक।
किसवा पर क्या लिखा होता है?
कुरआन की आयतें और इस्लामी आस्था से जुड़े संदेश।
पुराने किसवा का क्या होता है?
इसे संरक्षित किया जाता है और इसके हिस्से संग्रहालयों तथा संस्थानों को दिए जाते हैं।