ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
हरियाणा के पलवल जिले से एक ऐसी भावनात्मक और अनोखी यात्रा सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द और मानवीय संवेदनाओं की चर्चा छेड़ दी है। आस्था, सेवा और रिश्तों की गहराई से जुड़ी यह कहानी एक बहू और उसकी बुजुर्ग सास के बीच उस समर्पण को दर्शाती है, जो आज के समय में बहुत कम देखने को मिलता है। यह यात्रा न केवल धार्मिक विश्वास से जुड़ी है, बल्कि इसमें गांव-गांव, रास्ते-रास्ते और अलग-अलग समुदायों के बीच ऐसा अपनापन देखने को मिला, जिसने इसे एक साधारण परिक्रमा से कहीं आगे बढ़ाकर गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारे की मिसाल बना दिया है। स्थानीय लोगों के सहयोग, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव ने इस पूरे घटनाक्रम को एक जीवंत सामाजिक संदेश में बदल दिया है, जिसकी चर्चा अब दूर-दूर तक हो रही है।
हरियाणा के पलवल जिले के होडल क्षेत्र के हताना गांव की लोक गायिका काजल चौधरी इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। सोशल मीडिया पर उन्हें “काजल तसला वाली” के नाम से भी जाना जा रहा है। उनकी यह यात्रा केवल एक धार्मिक परिक्रमा नहीं बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता, गंगा-जमुनी तहजीब और मानवीय संवेदनाओं की एक जीवंत मिसाल बन गई है।

जी हाँ हरियाणा की लोक गायिका काजल चौधरी ने अपनी सास के प्रति सेवा और समर्पण की एक अनोखी मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी बुजुर्ग सास को प्लास्टिक के तसले में बिठाकर सिर पर उठाते हुए 84 कोस ब्रज परिक्रमा कराई। इस दौरान जब काजल चौधरी मेवात क्षेत्र पहुंचीं तो वहां का माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल गया, जहां डीजे की धुनों के साथ स्थानीय हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। काजल चौधरी ने इस अवसर पर कहा कि उनके लिए चारों धाम अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरणों में ही हैं, और उनकी सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
परिक्रमा के दौरान काजल चौधरी मेवात क्षेत्र के बिछौर गांव पहुंचीं। यहां उनके स्वागत के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित हुए। डीजे बजाकर, फूलों की माला पहनाकर और फूलों की वर्षा कर उनका भव्य स्वागत किया। वहीं, लोगों ने नोटों की मालाएं पहनाकर उनको सम्मानित किया। खास बात यह रही कि स्वागत कार्यक्रम में सभी समुदायों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। हिंदू और मुस्लिम समाज के लोगों ने मिलकर काजल और उनकी सास का अभिनंदन किया ।
काजल बोलीं "सास नहीं, मां हैं वो": इस दौरान प्रीति उर्फ काजल चौधरी ने कहा कि, "मेरी सास मेरे लिए मां के समान हैं। उनकी इच्छा थी कि वह ब्रज 84 कोस परिक्रमा करें। जब वह स्वयं नहीं चल सकती थीं तो मैंने तय किया कि उनकी आस्था को अधूरा नहीं रहने दूंगी। यह मेरा कर्तव्य और सौभाग्य है।"
काजल चौधरी ने अपनी 85 वर्षीय बुजुर्ग सास चंद्रो देवी की धार्मिक आस्था को पूरा करने के लिए 84 कोस ब्रज परिक्रमा का संकल्प लिया। सास उम्र और शारीरिक असमर्थता के कारण स्वयं चलने में सक्षम नहीं थीं, लेकिन उनकी इच्छा को देखते हुए बहू ने उन्हें एक प्लास्टिक के टब (तसला) में बैठाकर अपने सिर पर उठाया और पूरी परिक्रमा कराने का निर्णय लिया। यह दृश्य लोगों के लिए भावनात्मक भी रहा और प्रेरणादायक भी।
वहीं, जल अभिषेक यात्रा कमेटी के अध्यक्ष नाथूराम ने कहा कि, "मेवात की पहचान हमेशा भाईचारे और सामाजिक सद्भाव की रही है। काजल चौधरी का स्वागत इसी एकता का प्रतीक है। उन्होंने सेवा और संस्कारों की ऐसी मिसाल पेश की है, जो पूरे समाज को प्रेरित करती है।" इसके अलावा प्रधान इस्माइल ने कहा कि, "आज के समय में ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है। काजल चौधरी ने जिस तरह अपनी सास की सेवा की है, वह सभी के लिए प्रेरणा है।" वहीं ग्रामीण जुनेद ने कहा कि, "यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि इंसानियत, सम्मान और पारिवारिक मूल्यों का संदेश है। ऐसे कार्य समाज को सकारात्मक दिशा देते हैं।"

यह यात्रा 31 मई को पलवल जिले के बंजारी गांव से शुरू हुई थी और लगभग एक महीने तक लगातार कई गांवों, क्षेत्रों और धार्मिक स्थलों से होती हुई आगे बढ़ी। हर पड़ाव पर लोगों ने काजल चौधरी और उनकी सास का स्वागत किया और इस यात्रा को सेवा, श्रद्धा और संस्कार का प्रतीक माना।
यात्रा के दौरान जब यह परिक्रमा मेवात क्षेत्र के बिछोर गांव पहुंची, तो वहां का माहौल पूरी तरह बदल गया। 36 बिरादरी के लोगों ने फूल-मालाओं, डीजे और जयघोष के साथ उनका भव्य स्वागत किया। बड़ी संख्या में लोग इस दृश्य को देखने पहुंचे और कई लोगों की आंखें इस भावनात्मक क्षण को देखकर नम हो गईं। स्थानीय लोगों ने इसे केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि सामाजिक एकता और इंसानियत की मिसाल बताया।
सबसे खास बात यह रही कि इस पूरे सफर में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी खुलकर काजल चौधरी का स्वागत किया। कहीं रास्ते में पानी, भोजन और विश्राम की व्यवस्था की गई तो कहीं उनके लिए सम्मानपूर्वक सेवा भाव दिखाया गया। कई स्थानों पर लोगों ने उनके पैर धोकर, फूल बरसाकर और आदरपूर्वक स्वागत कर यह संदेश दिया कि इंसानियत किसी धर्म की मोहताज नहीं होती। स्थानीय लोगों ने इसे गंगा-जमुनी तहजीब की असली तस्वीर बताया, जहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय मिलकर भाईचारे के साथ रहते हैं।
बिछोर गांव में हुए स्वागत के दौरान स्थानीय लोगों ने कहा कि यह धरती हमेशा से श्रीकृष्ण भक्ति और सांस्कृतिक एकता की पहचान रही है, जहां 36 बिरादरी का सौहार्द देखने को मिलता है। लोगों ने काजल चौधरी की इस सेवा भावना की तुलना पौराणिक श्रवण कुमार से करते हुए कहा कि आज के समय में ऐसा समर्पण दुर्लभ है।
काजल चौधरी ने इस पूरी यात्रा के दौरान भावुक होकर कहा कि सास भी मां के समान होती है और उनकी सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चा तीर्थ अपने घर से शुरू होता है और माता-पिता व बुजुर्गों की सेवा ही असली पूजा है। उनके अनुसार मंदिरों में भगवान को खोजने से पहले अपने घर के बुजुर्गों में भगवान को देखना चाहिए।
पूरे मार्ग में प्रशासन की ओर से भी सहयोग और व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई गईं, जिससे यह परिक्रमा सुचारू रूप से आगे बढ़ती रही। स्थानीय लोगों ने भी लगातार सहयोग कर इस यात्रा को सफल बनाया। मेवात क्षेत्र के लोगों ने इस अवसर पर कहा कि यहां हमेशा से गंगा-जमुनी तहजीब की परंपरा रही है, जहां हिंदू-मुस्लिम एकता केवल शब्द नहीं बल्कि व्यवहार में दिखाई देती है। इस यात्रा ने उस परंपरा को और मजबूत किया।
यह पूरी घटना अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और लोग इसे “सेवा, संस्कार और सद्भाव” की अनोखी मिसाल बता रहे हैं। काजल चौधरी की यह परिक्रमा न केवल धार्मिक आस्था, सामाजिक सौहार्द, हिन्दू-मुस्लिम प्रेम का प्रतीक बनी है बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि जब समाज में प्रेम, सम्मान और भाईचारा होता है, तो हर यात्रा एक उत्सव बन जाती है।