द्युतिमय बनर्जी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में साल 1939 का त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन एक ऐसा मोड़ था जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। यह वह समय था जब कांग्रेस के भीतर दो सबसे बड़े नेताओं के बीच विचारों की लड़ाई खुलकर सामने आ गई थी। एक तरफ अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी थे और दूसरी तरफ आक्रामक राष्ट्रवाद के समर्थक नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव त्रिपुरी में हुए इस अधिवेशन ने कांग्रेस के भीतर समाजवाद और गांधीवाद के बीच की गहरी खाई को उजागर कर दिया था।

चुनावी जीत और गांधी गुट की बगावत
साल 1938 में हरिपुरा अधिवेशन के दौरान सुभाष चंद्र बोस को सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया था। लेकिन एक साल बाद जब 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन का समय आया तो हालात बदल चुके थे। सुभाष चंद्र बोस दोबारा अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहते थे। महात्मा गांधी इसके खिलाफ थे और उन्होंने अपने प्रतिनिधि के रूप में डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को मैदान में उतारा। चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले रहे। सुभाष चंद्र बोस ने लोकतांत्रिक तरीके से सीतारमैया को एक बड़े अंतर से हरा दिया।
यह जीत गांधी गुट को रास नहीं आई। चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस के भीतर का पुराना नेतृत्व बोस की जीत को बेअसर करने में जुट गया। कांग्रेस कार्यसमिति के 15 में से 13 सदस्यों ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने वाले इन नेताओं में सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे बड़े नाम शामिल थे। इन नेताओं ने तर्क दिया कि वे बोस को अपनी तरह से काम करने के लिए खुला मैदान दे रहे हैं। इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू ने भी एक धुंधला सा बयान जारी कर खुद को अलग कर लिया।
सीतारमैया की हार और गांधी का बयान
महात्मा गांधी उस समय राजकोट में उपवास पर थे। वे त्रिपुरी के मुख्य अधिवेशन में शामिल नहीं हुए। लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो गांधी जी ने एक बेहद कड़ा बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि पट्टाभि सीतारमैया की हार उनसे ज्यादा मेरी अपनी हार है। इस एक बयान ने सुभाष चंद्र बोस की लोकतांत्रिक जीत के महत्व को कम कर दिया। इतिहासकार मानते हैं कि गांधी जी के इस रुख के बाद कांग्रेस के पुराने नेताओं ने बोस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। वे बोस के उग्र राष्ट्रवाद और समाजवाद की तरफ झुकाव को कांग्रेस के लिए एक खतरा मान रहे थे।
अधिवेशन के दौरान गांधी समर्थकों ने एक नया प्रस्ताव पेश किया जिसे गोविंद वल्लभ पंत प्रस्ताव कहा जाता है। इस प्रस्ताव में मांग की गई कि अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस को अपनी नई कार्यसमिति का गठन पूरी तरह से महात्मा गांधी की इच्छा के अनुसार ही करना होगा। इस प्रस्ताव ने सीधे तौर पर गांधी जी को वीटो पावर दे दी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने इस पूरे विवाद में खुद को तटस्थ रखा। नतीजा यह हुआ कि पंत प्रस्ताव पास हो गया। इस प्रस्ताव के पास होते ही सुभाष चंद्र बोस के पास कांग्रेस के भीतर स्वतंत्र रूप से काम करने का कोई अधिकार नहीं बचा।

चिट्ठियों का दौर और बोस का इस्तीफा
त्रिपुरी में चल रही इस अंदरूनी राजनीति से सुभाष चंद्र बोस बेहद आहत थे। उन्होंने 31 मार्च 1939 को महात्मा गांधी को एक बहुत ही स्पष्ट चिट्ठी लिखी। बोस ने गांधी जी से सीधे शब्दों में पूछा कि क्या पंत प्रस्ताव को उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव माना जाए। उन्होंने लिखा कि अगर गांधी जी को लगता है कि कांग्रेस किसी दूसरे अध्यक्ष के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई ज़्यादा मज़बूती से लड़ सकती है तो वे तुरंत इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।
बोस ने देश की आज़ादी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने गांधी जी को सलाह दी कि दुनिया में दूसरे विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को ब्रिटिश सरकार को पूर्ण स्वराज के लिए छह महीने का अल्टीमेटम दे देना चाहिए। गांधी जी की तरफ से इस पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई। आखिरकार अप्रैल 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके तुरंत बाद उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से एक नए धड़े का गठन किया। बोस ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कुछ नेता गांधी जी के नाम का इस्तेमाल करके उन्हें जानबूझकर निशाना बना रहे हैं।

वैचारिक मतभेद और गांधी का अड़ियल रुख
त्रिपुरी संकट के बाद महात्मा गांधी के रुख में काफी कड़ाई देखी गई। उन्होंने बोस के साथ मिलकर काम करने से साफ मना कर दिया। 10 अप्रैल 1939 को बोस को लिखी एक चिट्ठी में गांधी जी ने स्वीकार किया कि दोनों के बीच की खाई अब बहुत चौड़ी हो चुकी है। उन्होंने लिखा कि आपसी संदेह इतने गहरे हैं कि दोनों गुटों को एक साथ लाना अब मुमकिन नहीं है। गांधी जी ने कहा कि वे इस मतभेद को सुलझाने में खुद को पूरी तरह असमर्थ पा रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि दोनों पक्षों को गरिमा के साथ अलग-अलग रहकर अपनी नीतियों पर काम करना चाहिए।
जब बोस ने गांधी जी के सुझाव पर कार्यसमिति के लिए कुछ नाम मांगे तो गांधी जी ने नाम देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वैचारिक मतभेदों को देखते हुए उनकी तरफ से कोई भी नाम थोपना ठीक नहीं होगा। गांधी जी ने बोस से कहा कि वे अपनी पसंद की समिति चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। अप्रैल के अंत में दोनों नेताओं के बीच मुलाकात भी हुई लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। गांधी जी ने साफ किया कि बातचीत से उनके विचारों में कोई बदलाव नहीं आया है।

समकालीन नेताओं की प्रतिक्रिया और कांग्रेस से निष्कासन
सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरत चंद्र बोस ने इस पूरे घटनाक्रम की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने त्रिपुरी अधिवेशन को एक दिखावा करार दिया था। उन्होंने लिखा था कि जो लोग खुद को गांधी का शिष्य बताते हैं उन्होंने त्रिपुरी में सत्य और अहिंसा का मज़ाक बनाकर रख दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पटेल, नेहरू और आज़ाद जैसे नेताओं ने सुभाष के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण प्रचार किया। यहाँ तक कि सुभाष चंद्र बोस की खराब सेहत को भी एक राजनीतिक हथकंडा बताया गया जबकि डॉक्टरों की रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि की थी कि बोस वाकई बहुत बीमार थे।
विवाद यहीं नहीं थमा। जून 1939 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में एक और नया नियम लाने पर बहस हुई। इसके तहत कांग्रेस के सदस्यों को किसी दूसरे संगठन की दोहरी सदस्यता लेने से रोकने की कोशिश की गई। यह सीधे तौर पर कांग्रेस के भीतर मौजूद वामपंथी और समाजवादी विचार के लोगों को बाहर रखने की रणनीति थी। अगस्त 1939 आते-आते सुभाष चंद्र बोस को बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। साथ ही उन पर अगले तीन साल तक कांग्रेस में कोई भी पद लेने पर पाबंदी लगा दी गई। इस तरह नेताजी को कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

गांधीवाद बनाम समाजवाद की जंग
यह पूरा विवाद सिर्फ दो बड़े नेताओं की आपसी लड़ाई नहीं थी। यह असल में दो अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव था। 1930 के दशक के अंत तक कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक तरफ सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाला वामपंथी और समाजवादी धड़ा था। दूसरी तरफ महात्मा गांधी और सरदार पटेल के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी और पारंपरिक गांधीवादी धड़ा था। जवाहरलाल नेहरू दिल से समाजवादी थे लेकिन वे हमेशा गांधी जी के फैसलों के साथ ही खड़े रहे।
महात्मा गांधी का समाजवाद पूरी तरह से नैतिक बदलाव और अहिंसा पर आधारित था। वे औद्योगिक ताकतों और सरकारी नियंत्रण के बजाय ग्रामीण व्यवस्था और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना चाहते थे। इसके विपरीत सुभाष चंद्र बोस आधुनिक औद्योगिकीकरण, राज्य नियोजन और अंग्रेजों पर चौतरफा सैन्य दबाव बनाने के पक्षधर थे। गांधी जी को लगता था कि बोस का रास्ता कांग्रेस के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। वे बोस के कम्युनिस्टों के साथ जुड़ाव और आज़ादी के लिए किसी भी हद तक जाने की नीति को सही नहीं मानते थे। इसी वैचारिक मतभेद के कारण गांधी जी ने लोकतांत्रिक फैसले को दरकिनार करते हुए भी अपनी बात मनवाई।
इतिहास के झरोखे से देखें तो त्रिपुरी अधिवेशन ने कांग्रेस के उस बड़े मंच को तोड़ दिया जहाँ हर विचारधारा के लोग एक साथ मिलकर लड़ रहे थे। समाजवादियों और उग्र राष्ट्रवादियों के अलग होने से पार्टी के भीतर गांधी जी का एकाधिकार और मजबूत हो गया। सुभाष चंद्र बोस ने भी बाद में लिखा था कि गांधी जी कांग्रेस के वास्तविक तानाशाह बन चुके थे जहाँ अध्यक्ष का चुनाव सिर्फ लोकतांत्रिक दिखावे के लिए होता था लेकिन अंतिम फैसला हमेशा महात्मा गांधी की मर्जी से ही तय होता था।
(लेखक सेंट ज़ेवियर्स कॉलेजए कोलकाता में पॉलिटिकल साइंस के छात्र हैं)