प्रमोद जोशी
अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक-समझौता हो गया है, जिसके तहत 60तक युद्धविराम लागू रहेगा और होर्मुज़ का रास्ता खुलेगा. समझौते पर दस्तखतों को लेकर अंतिम क्षण तक असमंजस बना रहा, पर अब बताया गया है कि दस्तखत 19जून को होंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अब हम ईरान की नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त कर देंगे, जो महीनों की बातचीत में सबसे बड़ी सफलता है.रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सरकारी टीवी का कहना है कि तेहरान ने अमेरिका को शांति समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया. दोनों पक्षों ने समझौते का विवरण तुरंत जारी नहीं किया है, पर मीडिया में दोनों तरफ से आई बातों में अंतर्विरोध हैं.
दस्तखतों पर संशय
अब शुक्रवार 19जून को जिनीवा में हस्ताक्षर समारोह होगा. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि मैं वहाँ मौजूद रहूँगा और ट्रंप भी इसमें शामिल हो सकते हैं.पहले कहा जा रहा था कि रविवार को ही दस्तखत हो जाएँगे. ट्रंप ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि अगले दिन समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं, जो उनका जन्मदिन भी होता है.
दूसरी तरफ ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा कि रविवार को किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे. अलबत्ता उन्होंने आने वाले दिनों में समझौते की संभावना को खुला रखा था.
समझौते का प्रारूप
हालाँकि दोनों ही पक्षों ने समझौते का लिखित प्रारूप जारी नहीं किया है, पर रायटर्स ने एक ईरानी अधिकारी के मार्फत इससे जुड़ा समाचार दिया है.वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने रायटर्स को बताया कि ईरान ने जिस मसौदे पर सहमति जताई है, उसमें नाभिकीय-अस्त्र बनाने और हासिल करने पर रोक लगाने की बात है. दोनों पक्ष इसपर औपचारिक दस्तखतों के बाद अगले 60दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर चर्चा करेंगे.
रायटर्स के अनुसार मसौदे में निम्नलिखित प्रावधान शामिल हैं:
परमाणु कार्यक्रम
• ईरान परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही हासिल करेगा।
• अंतिम समझौता होने तक ईरान अपना वर्तमान परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा, जिसमें यूरेनियम संवर्धन न करना और परमाणु सुविधाओं का विस्तार न करना शामिल है।
• अमेरिका ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को देश के भीतर कम करने के लिए तैयार है, और दोनों पक्ष 60दिनों के भीतर इस प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।
होर्मुज जलडमरूमध्य
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक ईंधन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण प्रमुख समुद्री मार्ग पर दोनों पक्ष निम्नलिखित बातों पर सहमत हुए हैं:
• ईरान तुरंत सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल देगा।
• ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकाबंदी अमेरिका हटा लेगा।
वित्तीय उपाय
• जब तक दोनों पक्ष अंतिम समझौते पर नहीं पहुँच जाते, अमेरिका, ईरान पर नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा।
• वाशिंगटन एक निश्चित अवधि के लिए तेल प्रतिबंधों में छूट देगा, जिससे ईरान को तेल बेचने और उससे प्राप्त आय तक पहुँच प्राप्त करने की अनुमति मिलेगी।
• अमेरिका प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण, क्षेत्रीय देशों के सहयोग और वित्तीय ऋण लाइनों के माध्यम से ईरान की 25अरब डॉलर की संपत्ति जारी करने में सहायता करेगा।
ईरानी विवरण
ईरान की अर्ध सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज़ के मुताबिक़ प्रस्तावित बिंदुओं में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर स्थायी युद्धविराम का मुद्दा शामिल है.इसके अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300अरब डॉलर की योजनाएं बनाएँगे. अंतिम वार्ता तभी शुरू होगी, जब ईरान की फ़्रीज़ संपत्तियों का कम से कम आधा हिस्सा रिलीज़ हो जाएगा, ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध निलंबित होंगे और नौसैनिक नाकाबंदी हट जाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव के ज़रिए मंज़ूरी दी जाएगी.
ईरान में विरोध
शनिवार को संकेत मिले थे कि ईरान के कुछ कट्टरपंथी समूह, समझौते के विरोध में हैं. दो रूढ़िवादी सांसदों ने इसकी आलोचना भी की. इनमें से एक, अमीर हुसैन साबेती ने सोशल मीडिया पर विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची के खिलाफ़ महाभियोग की माँग करते हुए पोस्ट किया.
दूसरे सदस्य, महमूद नबीवियन ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा कि इस समझौते के तहत, ‘ईरान अमेरिका का उपनिवेश बन जाएगा.’ लेबनान में भी लड़ाई जारी है, जहाँ हिज़्बुल्ला के खिलाफ इसराइल का महीनों से अभियान चल रहा है. ईरानी चाहते हैं कि इस लड़ाई को भी खत्म करने का मसला समझौते में शामिल किया जाए.
इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर से संबद्ध अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स ने बताया कि मशहद में विदेश मंत्रालय के बाहर दर्जनों लोगों ने समझौते के खिलाफ प्रदर्शन किया और ईरान के अब्बास अराग़ची के खिलाफ नारे लगाए.
रुख पर कायम
इस लड़ाई से इतना साबित ज़रूर हुआ है कि अमेरिका अपनी वैश्विक-भूमिका पर अड़ा है. वहीं ईरान ने लड़ाई को लंबा खींचकर अपने हौसलों का प्रदर्शन ज़रूर किया है.अपने नाभिकीय-ऊर्जा कार्यक्रम को जारी रखने के संकल्प से वह अभी तक विचलित नहीं हुआ है. उसने बम बनाने का दावा कभी नहीं किया, पर अमेरिका और इसराइल मानते हैं कि वह बम बना रहा है.
अमेरिका और इसराइल ने ईरान में ‘रेजीम-चेंज’ के इरादे से युद्ध छेड़ा था. वहाँ सत्ता परिवर्तन तो हुआ, लेकिन वैसा नहीं जैसा वे चाहते थे. कुछ लोगों ने नई व्यवस्था को ‘इस्लामिक रिपब्लिक 3.0’ नाम दिया है.
रेजीम-चेंज की पहेली
कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि ईरान अब धार्मिक-व्यवस्था की तुलना में आईआरजीसी के प्रभुत्व वाली सैनिक-तानाशाही में तब्दील हो गया है. एक समय वह कमज़ोर नज़र आ रहा था, पर अब वह ताल ठोक रहा है.उसके नए शासकों में इस बात का आत्मविश्वास है कि अपने व्यापक क्षेत्रीय लक्ष्यों में बड़े बदलाव किए बिना, लड़ाई के फिर से भड़कने की स्थिति में भी वे टिके रहेंगे.
अमेरिका और इसराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने और उससे उत्पन्न खतरे को समाप्त करने के लक्ष्य से भी युद्ध छेड़ा था. वह लक्ष्य अब भी है, पर उसके बारे में बात अब आगे होगी.
ईरानी इरादे
ईरान न्यूनतम स्तर पर भी यूरेनियम संवर्धन का अधिकार अपने पास बनाए रखना चाहेगा. वह उस वैज्ञानिक ज्ञान और उपकरणों को भी अपने पास रखना चाहेगा, जो उसे नाभिकीय-राज्य बनाएँ.अमेरिका और इसराइल उसे किस तरीके से ऐसा करने से रोकेंगे, यह देखना होगा. संभवतः ईरानी-शासक आश्वस्त हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप का बड़े स्तर पर लड़ाई फिर से छेड़ने का कोई इरादा नहीं है.
वे मानते हैं कि उनके दबाव में ट्रंप ने इसराइल पर भी अंकुश लगाया है. शायद इसी वजह से पिछले हफ्ते, जब इसराइल ने लेबनान में हिज़्बुल्ला के गढ़ों पर बमबारी की, तब ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया.
आर्थिक लाभ
हालाँकि इसराइल सीधे तौर पर बातचीत में शामिल नहीं है, लेकिन बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने गुरुवार देर रात एक बयान में कहा कि उन्होंने ट्रंप से बात की थी, जिन्होंने आश्वासन दिया है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध ‘अंतिम समझौते’ का हिस्सा होंगे.
यह भी साफ है कि केवल समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से ईरान को आर्थिक लाभ नहीं मिल जाएँगे. अमेरिकी सूत्रों के अनुसार ऐसी अटकलें गलत हैं कि समझौते पर हस्ताक्षर होते ही तेहरान को अरबों डॉलर मिल जाएँगे.उनके अनुसार, आर्थिक लाभ तभी जारी किए जाएँगे जब ईरान समझौते के तहत अपने दायित्वों को पूरा करेगा. ईरानी संवर्धित यूरेनियम सौंप देंगे, तो उन्हें कुछ वित्तीय राहत मिलेगी. यदि वे परमाणु संयंत्रों को नष्ट कर देंगे, तो कुछ और मिलेगा.
नाभिकीय-कार्यक्रम
अमेरिकी सूत्र अभी यह नहीं बता रहे हैं कि किन परमाणु स्थलों को नष्ट किया जाएगा या ईरान को कितने वर्षों के लिए यूरेनियम संवर्धन रोकना होगा. यह भी स्पष्ट नहीं है कि ईरानी अपने परमाणु ईंधन के भंडार को कैसे निकालेंगे और नष्ट करेंगे, जिसका काफी हिस्सा एक साल पहले अमेरिकी बमबारी में इस्फ़हान संयंत्र के मलबे में दब गया था.
अमेरिका मानता है कि यह समझौता एक व्यापक क्षेत्रीय शांति-संरचना को जन्म देगा, जिसमें इसराइल, लेबनान, फारस की खाड़ी के देश और ईरान शामिल होंगे. तेहरान अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की गारंटी के बदले में क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को वित्तपोषण बंद कर देगा.बदले ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिलेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी वापसी का रास्ता खुलेगा.
ईरानी स्वीकृति
ईरान के विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने देश को संबोधित करते हुए एक लाइव टेलीविजन भाषण में कहा कि समझौता, लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष को समाप्त कर देगा और 47वर्षों में पहली बार ईरान और अमेरिका दोनों लिखित रूप में यह कहेंगे कि वे एक-दूसरे की संप्रभुता और शासन का सम्मान करते हैं.
देश के भीतर विरोधी-स्वरों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ‘मीडिया को अटकलों से बचना चाहिए.’ हमारी टीम ने अमेरिका से कहा है कि हम लेबनान से इसराइल की वापसी और वहाँ हमलों को भी बंद होते देखना चाहते हैं.अमेरिकी अधिकारियों ने अपने बयानों में लेबनान का कोई जिक्र नहीं किया, और इसराइल सरकार ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि हम वाशिंगटन और तेहरान के प्रस्तावित समझौते में शामिल नहीं हैं.
ईरानी रणनीति
पिछले हफ्ते ईरान ने इसराइल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जो हिज़्बुल्ला पर हुए इसराइली हमलों के जवाब में थे. इससे संदेह पैदा हुआ कि क्या लड़ाई फिर से शुरू होने वाली है.आमतौर पर ईरान पलटवार तब करता है जब उसके हितों पर सीधे चोट लगती है, लेकिन इसबार उसने अपने सहयोगी हिज़्बुल्ला पर हमले के बाद कार्रवाई की.
यह भी लगता था कि जवाब में इसराइल फिर से फौजी कार्रवाई करेगा, और अमेरिका के साथ चल रही वार्ता में व्यवधान पड़ेगा. पर शायद ईरान संदेश देना चाहता था कि हम हिज़्बुल्ला के साथ पूरी तरह खड़े हैं.
नया दौर, नई चुनौतियाँ
ईरान जानता है कि अमेरिका अब सीधी लड़ाई नहीं चाहता, इसलिए वह अपने आत्मविश्वास को व्यक्त कर रहा है. कुछ हद तक इसलिए भी कि उसके समर्थकों को लगे कि वे जीत रहे हैं.लड़ाई के दीर्घकालीन निष्कर्ष अभी नहीं निकाले जा सकते हैं, पर यह भी सच है कि ईरान कुछ मामलों में कमज़ोर हुआ है. बेशक मुश्किल हालात में भी लड़ने की उसकी जिजीविषा व्यक्त हुई है, पर उसके सामने बड़ी आर्थिक और सामरिक चुनौतियाँ हैं.
ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध हैं, वह समुद्री नाकाबंदी से घिरा है, फिर भी डिगा नहीं. वहाँ की सरकार का व्यवस्था पर नियंत्रण है, और रक्षा-संरचना कायम है. अमेरिकी भविष्यवाणियों के बावजूद सरकार-विरोधी कोई जनांदोलन वहाँ खड़ा नहीं हुआ.
उसे लगता है कि वह मुश्किल दौर को पार कर चुका है और अब नया दौर शुरू होगा.

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