अहसान फाजली
कश्मीर घाटी में इस्लाम धर्म के प्रसार और सूफी परंपरा की नींव रखने वाले चौदहवीं सदी के महान संत मीर सैयद अली हमदानी की मशहूर किताब का कश्मीरी अनुवाद बाजार में आ गया है।इस किताब का नाम जखीरत उल मुलुक है। इसका अनुवाद श्रीनगर के रहने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ वकील एडवोकेट अब्दुल रशीद हंजुरा ने किया है।
यह अनूठा साहित्यिक कार्य हाल ही में सूफी संत के सालाना उर्स के पवित्र मौके पर जारी किया गया। इस ऐतिहासिक आयोजन को इस्लामिक रिलीफ एंड रिसर्च ट्रस्ट और जम्मू कश्मीर उर्दू काउंसिल ने मिलकर आयोजित किया था।
अनुवादक अब्दुल रशीद हंजुरा इन दोनों ही संस्थाओं के प्रमुख हैं। ईद उल अजहा के ठीक पहले हुए इस कार्यक्रम में शाह ए हमदान के धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान को याद किया गया। जखीरत उल मुलुक का शाब्दिक अर्थ राजाओं का खजाना होता है। यह मूल रूप से फारसी भाषा में लिखी गई एक बेहद महत्वपूर्ण किताब है जो राजनीति, शासन व्यवस्था के तौर तरीकों और सूफी मत के सिद्धांतों पर आधारित है।
आम लोगों और शासकों के लिए नैतिक संहिता
शाह ए हमदान की यह रचना केवल राजाओं या प्रशासकों के लिए मार्गदर्शिका नहीं है। इसमें आम नागरिकों के सामाजिक कर्तव्यों और नैतिक जिम्मेदारियों का भी विस्तार से उल्लेख है। अनुवादक अब्दुल रशीद हंजुरा बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार इस किताब को पढ़ा तो इसके विचारों ने उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित किया। उन्हें महसूस हुआ कि सात सौ साल पुरानी यह अमूल्य धरोहर आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने दौर में थी। इसलिए यह किताब हर एक कश्मीरी नागरिक तक पहुंचनी चाहिए।
इस कठिन साहित्यिक कार्य को पूरा करने में उन्हें लगभग चार साल का लंबा समय लगा। वकालत के पेशे और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहने के कारण वे अपने खाली समय में ही यह अनुवाद कर पाते थे। शुरुआत में उन्होंने सीधे फारसी भाषा से कश्मीरी में अनुवाद करना शुरू किया था। फारसी के कुछ कठिन शब्दों और वाक्यों के कारण शुरुआती चरण में काफी मुश्किलें आईं। इस समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने किताब के उर्दू अनुवादों की मदद ली जिससे कश्मीरी संस्करण को अधिक सरल और सुबोध बनाया जा सका।
मातृभाषा के प्रति प्रेम और अगली पीढ़ी की चिंता
हंजुरा से जब यह पूछा गया कि उन्होंने इस किताब को कश्मीरी भाषा में ही अनुवाद करने का फैसला क्यों किया, तो उनका जवाब बेहद भावुक और तार्किक था। उन्होंने कहा कि वे एक सच्चे कश्मीरी हैं और उन्हें अपनी मातृभाषा से बेहद गहरा लगाव है। उन्हें न केवल कश्मीरी बोलने में बल्कि इसमें लिखने में भी गर्व महसूस होता है। इस अनुवाद के जरिए वे कश्मीरी भाषा और उसके समृद्ध साहित्य में अपना योगदान देना चाहते थे।
इसके पीछे उनका सबसे बड़ा मकसद कश्मीर की युवा और आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ना है। उनका मानना है कि जब युवा इस ऐतिहासिक किताब को अपनी जुबान में पढ़ेंगे तो वे ज्ञान हासिल करने के साथ अपनी जड़ों से भी जुड़ सकेंगे।
इस किताब की हस्तलिखित प्रतियों को बाद में कंप्यूटराइज्ड किया गया और फिर इसका प्रकाशन हुआ। हंजुरा इस अनमोल किताब को कश्मीरी भाषा और शाह ए हमदान के चाहने वालों के बीच पूरी तरह मुफ्त में बांट रहे हैं। अब तक वे सौ से अधिक प्रतियां लोगों को सौंप चुके हैं।
समाज सेवा और संस्कृति को बचाने की मुहिम
एडवोकेट अब्दुल रशीद हंजुरा का जीवन हमेशा से समाज सुधार और जरूरतमंदों की सेवा में बीता है। साल 1980 के दौरान वे जम्मू कश्मीर यतीम ट्रस्ट के संस्थापक अब्दुल खालिक तक के कार्यों से बहुत प्रभावित हुए थे। कश्मीर में उन्हें लोग तक जंगैरी के नाम से भी जानते हैं। उनके साथ जुड़कर हंजुरा ने अनाथ बच्चों और बेसहारा लोगों की सेवा का ककहरा सीखा। बाद में उन्होंने इस मिशन को आगे बढ़ाते हुए खुद 'इस्लामिक रिलीफ एंड रिसर्च ट्रस्ट' की स्थापना की।
ट्रस्ट के मुख्य सेवा कार्य:यह संस्था बडगाम जिले के क्रालपोरा में 'दारुल एहसान' नाम का लड़कों का अनाथालय और बारामूला के पट्टन इलाके में 'दारुल मोहसिनात' नाम का लड़कियों का अनाथालय चलाती है।
सामाजिक कार्यों के अलावा वे एक समर्पित सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं। वे समय समय पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं जिससे कश्मीरी संस्कृति, लोक कला और साहित्य को जिंदा रखा जा सके। शाह ए हमदान की इस किताब का कश्मीरी अनुवाद उसी सांस्कृतिक चेतना को जगाने का एक हिस्सा है।
मीर सैयद अली हमदानी ने अपने जीवन में तीन बार कश्मीर घाटी का दौरा किया था। उन्होंने यहां न केवल धर्म का प्रचार किया बल्कि स्थानीय लोगों को कालीन बुनाई, शॉल निर्माण और लकड़ी पर नक्काशी जैसी बेहतरीन कलाएं भी सिखाईं जिससे घाटी की अर्थव्यवस्था बदल गई।
यह वीडियो दिखाता है कि किस तरह मध्य एशिया से आए सूफी संतों ने कश्मीर के सामाजिक और आर्थिक ताने बाने को हमेशा के लिए बदल दिया।