मंजीत ठाकुर
आजादी की सालगिरह आई है, कुछ लोग इस मौके पर देशभक्ति प्रदर्शित कर रहे हैं, कोई डीपी में तिरंगा लगा रहा है तो कोई इससे जुड़ा कुछ और कर रहा है. और कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि देशभक्ति का भाव प्रदर्शित करने की चीज नहीं है. वह मन ही मन देशभक्त हैं.
बेशक, ऐसे ही लोग होंगे जो आजादी की लड़ाई के वक्त भी सड़क पर उतरने की बजाए यह तर्क देते होंगे कि अंग्रेजों के खिलाफ मन ही मन लड़ रहे हैं. जो लोग अपना, और परिजनों का ही नहीं, अपने घर के कुत्ते का जन्मदिन सेलिब्रेट करके उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया में लगाने में छाती चौड़ी करते हैं, उन्हें देशभक्ति प्रदर्शित करने में क्या हर्ज है!
🇮🇳15th August is Coming Soon! 🇮🇳
— ☆~ ASHTHA ~☆ (@DivyaKashy43898) August 12, 2026
The tricolour is ready to fly high, and the spirit of freedom is ready to fill every heart. ❤️🤍💚
Let’s celebrate the courage of our freedom fighters and the pride of being Indian.
Jai Hind! 🇮🇳 Vande Mataram!#IndependenceDay #15August pic.twitter.com/qXfMiUVGs3
खैर, आजादी के इस सालगिरह पर हमें क्या आत्मालोचन की जरूरत नहीं है? हमें क्या नया संकल्प नहीं लेना चाहिए? क्या 'जज्बाती', 'कम जज्बाती', 'गैर-जज्बाती' लोग या 'सेलेक्टिवली जज्बाती' लोग अब यहां से एक नई राह की तरफ नहीं बढ़ना चाहेंगे?
जब देश आजाद हुआ था तब साक्षरता करीबन 12 फीसद थी और लोगों की प्रजनन क्षमता असाधारण रूप से ऊंची थी. उस वक्त देश में प्रतिव्यक्ति आमदनी 150 डॉलर से भी कम थी और देश का नेतृत्व अमूमन राजनैतिक रूप से 'रूसी साम्यवाद' से चमत्कृत था.
लिहाजा, कृषि और औद्योगीकरण में तथा शासन पर राज्य के नियंत्रण के मामले में राज्य की व्यवस्था ने रूसी मॉडल का ही अनुकरण किया. बेशक, अतीत के उस हिस्से में हमारे सभी पुरखे कमोबेश एक साझा झुकाव के सहभागी थे.
यह झुकाव इतना अधिक था कि हमने अपने संविधान की प्रस्तावना तक में संशोधन कर दिया और उसमें 'समाजवादी' शब्द जोड़ दिया, साथ ही 'धर्मनिरपेक्ष' (या पंथनिरपेक्ष) शब्द जोड़ा ताकि हम इन दो शब्दों की पश्चिमी परिभाषा के खांचे में फिट बैठ जाएं.
उस वक्त--यानी प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ते वक्त--दुनियाभर में गरीबी के मामले में हम आठवें सबसे गरीब देश थे. हालांकि, 1950 में हम दुनिया के दूसरे सबसे अधिक गरीब देश थे. यानी तीस साल में हमने कुछ तो सुधार जरूर किया था.
उन दिनों हमारी आर्थिक वृद्धि दर 3.5 फीसद सालाना थी और अर्थशास्त्री मजाकिया लहजे में इसको 'हिंदू वृद्धि दर' कहते थे. अभी कुछ समय पहले हमलोगों ने एक लेख प्रतियोगिता का आयोजन किया था, जिसका विषय थाः हिंदुस्तान की वो खास बात, जिस पर है आपको नाज. अधिकतर लोगों ने भारत की 'समेकित संस्कृति' के बारे में लेख लिखे.
पर भारत की समीक्षा लोकतंत्र और राष्ट्रीयता के संदर्भों में करने पर यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि हमें कौन-सी चीज एकसाथ जोड़ती है? यह सवाल बहुत मुश्किल है.
एक और प्रश्न है,हमने 'वृद्धि' हासिल करने और 'गरीबी उन्मूलन' के दोहरे लक्ष्य को हासिल करने में कितनी कामयाबी पाई है? और इससे जुड़ा अनिवार्य प्रश्न चीन की कामयाबी के मॉडल के साथ हमारी तुलना का है.
अधिकतर (भले ही सभी न हो) समाजों का लक्ष्य एक समतामूलक होने की राह में प्रावधान जुटाने का है. अधिकतर लोग सहमत होंगे कि समतामूलक समाज के लिए लोकतंत्र अपरिहार्य है.
पिछले साढ़े सात दशक मे भी भारत और भारतीयों के पास गर्व करने लायक बहुत कुछ है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती एकता और विविधता दोनों को बनाए रखने की है.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका सबसे पुराना. इससे पहले कि हम दोनों की तुलना करे, भारत के सामने एक सवाल है—भारत ने एक लोकतंत्र के तौर पर कैसा प्रदर्शन किया है.
सच कहा जाए तो भारतीय लोकतंत्र ज्यादा कामयाब इसलिए है क्योंकि यहां एक मजबूत मध्य वर्ग उपस्थित है. पर एक समीकरण और है. बैरिंगटन मूर ने 'सोशल ऑरिजिंस ऑफ डेमोक्रेसी एंड डिक्टेटरशिप, 1964' में लिखा है कि यह जादुई समीकरण 'नो बुर्जुआ, नो डेमोक्रेसी' है.
अर्थशास्त्री सुरजीत एस.भल्ला के मुताबिक, “1947 में अधिकतर परिभाषाओं के मुताबिक भी, कोई मध्य वर्ग मौजूद नहीं था. इसलिए 1947 में भारत द्वारा लोकतंत्र अपनाया जाना एक पहेली और अजूबा ही है.”
भारत द्वारा लोकतंत्र अपनाने को लेकर कई अलग तरह की व्याख्याएं हैं और यह भी यह लोकतांत्रिक क्यों और कैसे बना रहा? भारत ने एक लोकतंत्रात्मक शासन इसलिए अपनाया क्योंकि लोकतंत्र उसकी विरासत रही है. इस विरासत के दो पहलू हैः भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश तो था ही, यह नस्लीय और सांस्कृतिक रूप से वैविध्य भरा भी था.
एक अन्य कारक विकल्पहीनता भी है. लोकतंत्र शासन का एकमात्र तरीका है, जो विभिन्न नस्लीय और सांस्कृतिक समूहों की अहम भूमिका की गारंटी दे सकता है. यही वह विविधता है जो पारस्परिक हितों को जोड़कर रखती है.
अपने पड़ोसियों, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका को देखिए. उनमें काफी समांगता (होमोजेनिसिटी) है, बहुत कम विविधता है लेकिन वहां लोकतंत्र पर लगातार खतरा बना रहता है.
स्वतंत्रता के समय दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के प्रति प्रबल रुझान था. चार प्रमुख दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका, सभी ने अपने शासन के पहले रूप के रूप में लोकतंत्र को अपनाया. हालांकि, वे उस पर टिके नहीं रह सके, खासकर पाकिस्तान में.
पाकिस्तान को तो फौजी शासन और उसके बूट कुछ ज्यादा ही भाते हैं. भारत को छोड़कर दक्षिण एशिया के हमारे सभी पड़ोसी इन दिनों उथल-पुथल और अराजकता से जूझ रहे हैं.
दक्षिण एशिया में चीन और अमेरिकी प्रतिद्वंद्विता स्पष्ट नजर आ रही है और उन्होंने हमारे आस-पड़ोस को झकझोरने में अपनी कुटिल निरंतरता बरती है. हमारे पड़ोसी देश भी चीन या अमेरिका का बगलबच्चा बनने में काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
ऐसे में, भारत में लोकतंत्र को बनाए रखने में अन्य कारक महत्वपूर्ण हो सकते हैं. ऐसा ही एक कारक भारतीय राजनीति में विविधता की चरम प्रकृति की मौजूदगी हो सकती है.
आंकड़े एक बात की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिटिश उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण रुझान लोकतांत्रिक शासन पद्धति को अपनाने की ओर रहा है. संभवतया, यह कोई संयोग नहीं है कि दुनिया का सबसे समृद्ध लोकतंत्र और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दोनों पर ही ब्रिटिश शासन रहा था.
इसके उलट, बेहद कम फ्रांसीसी या जर्मन, या पुर्तगाली या स्पेनी उपनिवेशों ने लोकतंत्र के मोर्चे पर कोई अच्छा प्रदर्शन किया है. लेकिन, नस्लीय विविधता भी महत्वपूर्ण है, संभवतया यही वह गोंद है जो विभिन्न किस्म के लोगों को जोड़कर रखती है. नस्लीय विविधता जितनी अधिक होगी, लोकतंत्र को अपनाने की संभाव्यता भी उतनी अधिक होगी.
80 years of freedom. 🇮🇳
— Indians (@voicesindians) August 12, 2026
Countless stories. 🇮🇳🇮🇳
One India. 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
From the 1st Independence Day to the 80th,
the spirit of India continues to inspire pic.twitter.com/WPxj5sbmwA
वास्तव में, भारत में लोकतंत्र इसलिए भी कामयाब रहा क्योंकि यह एकमात्र राजनैतिक व्यवस्था थी जो इसकी जातीय, नस्लीय, धार्मिक, भाषायी रूप से खिचड़ी आबादी के लिए माकूल थी.
लोकतांत्रिक व्यवस्था, कम से कम सैद्धांतिक रूप से ही, हरेक समूह और हरेक व्यक्ति को एक मौका देती है कि वह निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा ले सके. बेशक इसे एक छोटा मौका कहा जा सकता है लेकिन अगर व्यवस्था अलोकतांत्रिक हो, चाहे राजतंत्र हो या कम्युनिस्ट तानाशाही, तो इस छोटे मौके की बात के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता.
ऐसे में, सतहत्तर के हो चुके हमारे नवोन्मेषी लोकतंत्र (इस नवोन्मेषी शब्द पर गौर करिए, क्योंकि आधुनिक न सही पर, हम कई अर्थों में प्राचीन काल से लोकतांत्रित रवैए वाले देश रहे हैं) में हमें पीछे पलट कर देखने को मात्र संदर्भ बिंदु की तरह लेना चाहिए.
तो क्यों न इस बार 15 अगस्त 2026 को भी एक नया ‘प्रस्थान बिंदु’ मानें? पिछले एक साल के राजनीतिक घटनाक्रम ने हमें फिर याद दिलाया है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और हारने का नाम नहीं है.
मतदाता सूची से लेकर संसद की कार्यवाही तक, सत्ता और विपक्ष के बीच असहमति से लेकर सड़कों पर होने वाले आंदोलनों तक—हर जगह हमें यह तय करना होगा कि असहमति को लोकतंत्र की ताकत बनाए रखना है या उसे सामाजिक दरार में बदल देना है.
आज जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर को लेकर बहस चल रही है और उसके तौर-तरीकों पर राजनीतिक दलों तथा नागरिक समाज में सवाल उठ रहे हैं, तब सबसे जरूरी है कि हर पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे और चुनावी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना रहे.
संसद का हालिया सत्र भी हमें यही सबक देता है. सरकार और विपक्ष के बीच तीखी असहमति लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन यदि बहस की जगह लगातार गतिरोध ले ले, तो अंततः नुकसान संसद का नहीं, नागरिक का होता है.
वैश्विक मंच पर भारत की बदलती कूटनीति, अंतरिक्ष विज्ञान में नए मील के पत्थर और आंतरिक मोर्चे पर आर्थिक तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता के बीच आज देश एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है.
Come, celebrate the pride and unity of 🇮🇳 by joining the #HarGharTiranga movement. #IndependenceDay2026
— All India Radio News (@airnewsalerts) August 13, 2026
⚡️Don't forget to upload your selfie with Tiranga on https://t.co/iqxoBAhXUq
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हमारे पड़ोस में लगातार बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की चुनौती हमें याद दिलाती है कि सतर्कता ही स्वतंत्रता का मूल्य है.
मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में, जहाँ एक ओर डिजिटल क्रांति और युवा ऊर्जा देश को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है, वहीं दूसरी ओर वैचारिक ध्रुवीकरण और क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है.
इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम मजहब, संप्रदाय और छोटे-छोटे विभाजनों से ऊपर उठकर संविधान की मूल आत्मा और ‘हम भारत के लोग’ की भावना को और अधिक मजबूत बनाएंगे, क्योंकि आने वाला वक्त चुनौतियों से भरा है.
अमेरिकी ट्रेड घुड़कियों, कथित मुस्लिम नाटो के नाम पर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय गुटबंदियों, दुनिया में चल रहे 66 छोटे-बड़े युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नौकरियों और काम पर आ रहे खतरे के बीच में आगे बढ़ते रहने के रास्ते तलाशने होंगे. उन रास्तों में एक सबसे जरूरी और मजबूत रास्ता हैः सभी समुदायों का एकजुट बने रहना.
इसलिए 15 अगस्त 2026 को केवल तिरंगा फहराने का दिन न बनाएं. इसे उस भारत के लिए संकल्प का दिन बनाएं जिसमें पहचान से पहले नागरिकता, धर्म से पहले इंसानियत और राजनीति से पहले राष्ट्र हो.
नई शुरुआत हमेशा ताजादम करने वाली होती है.