गौर के पिराना पीर: बंगाल में चिश्ती सूफी परंपरा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-08-2026
The Pirana Pir of Gaur: The Chishti Sufi Tradition in Bengal
The Pirana Pir of Gaur: The Chishti Sufi Tradition in Bengal

 

शम्पी चक्रवर्ती पुरकायस्थ/मालदा

 बंगाल का प्राचीन शहर गौर केवल राजाओं, महलों और मस्जिदों के इतिहास तक सीमित नहीं है। इस ऐतिहासिक भूमि का नाता सदियों पुरानी सूफी परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। मालदा के गौर क्षेत्र में सागर दिग्घी के पास स्थित शेख अखी सिराजुद्दीन उस्मान (रह.) का मजार और दरगाह आजपिराना पीर दरगाहके नाम से विख्यात है।

जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक यह पावन स्थल मालदा शहर से लगभग साढ़े छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है। अखी सिराजुद्दीन उस्मान ने बंगाल में चिश्ती सिलसिले को स्थापित करने और उसे संगठित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।

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दिल्ली से बंगाल तक का आध्यात्मिक सफर

अखी सिराजुद्दीन उस्मान (रह.) प्रसिद्ध दिल्ली के सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) के प्रमुख शिष्यों में शामिल थे।उन्होंने दिल्ली में रहकर इस्लामिक शास्त्रों की उच्च शिक्षा प्राप्त की और हजरत निजामुद्दीन औलिया से आध्यात्मिक दीक्षा व खिलाफत हासिल की।ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार उनकी विद्वत्ता और उच्च आध्यात्मिक पद, जिसे रुहानी बुलंदी भी कहा जाता है, को देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया उन्हें प्यार से'आइना-ए-हिंदुस्तान' यानी हिंदुस्तान का आईना कहकर पुकारते थे।

हजरत निजामुद्दीन औलिया के विसाल के बाद अखी सिराज बंगाल लौट आए। उन्होंने गौर और पांडुआ क्षेत्र में सूफी शिक्षाओं का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया।बंगाल में चिश्ती परंपरा को मजबूत करने में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है।

उनके खास शिष्यों में मखदूम शेख अला-उल-हक (रह.) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिनकी बदौलत पांडुआ में यह सिलसिला और अधिक सशक्त हुआ।यही वजह है कि अखी सिराज की खानकाह केवल इबादत और आध्यात्मिक साधना का केंद्र नहीं रही, बल्कि वह शिक्षा, नैतिक अनुशासन और मानवीय मूल्यों का एक बड़ा अध्ययन केंद्र भी बन गई थी।

जन्मस्थान को लेकर ऐतिहासिक शोध

अखी सिराजुद्दीन उस्मान के जीवन को लेकर इतिहास में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि वह बदायूं के रहने वाले थे। हालांकि आधुनिक शोध और इतिहासकार अब्दुल हक देहलवी की प्रसिद्ध कृति'अखबार-उल-अखियार' में उन्हें'अखी सिराज गूरी' कहकर संबोधित किया गया है।इससे यह ऐतिहासिक प्रमाण मिलता है कि उनका मूल संबंध बंगाल के प्राचीन गौर से ही था।

उनका विसाल (निधन) वर्ष 758 हिजरी यानी 1357 ईस्वी बताया जाता है। ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार उन्होंने अपनी इच्छा जताई थी कि उनकी पवित्र मजार उसी जगह के पास बनाई जाए जहां उनके पवित्र खिरका (चोगा या वस्त्र) को दफनाया गया था।

गौर में सागर दिग्घी के उत्तर-पश्चिम छोर पर उनकी मख्सूस इच्छा के अनुसार उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।बाद में उनकी कब्र के ऊपर एक भव्य मकबरे का निर्माण कराया गया, जो आज पिराना पीर दरगाह के रूप में मौजूद है।

 

पीर' नाम के पीछे का इतिहास

इस दरगाह के नाम को लेकर भी एक रोचक तथ्य है। स्थानीय लोगों के बीच अखी सिराजुद्दीन को पारंपरिक रूप से'पुरानी पीर' या'पिराना पीर' कहा जाता है। 'पुरानी पीर' का अर्थ प्राचीन पीर होता है, जबकि 'पिराना पीर' का मतलब पीरों के पीर से है।

हालांकि भारतीय मुस्लिम समाज में 'पीरान-ए-पीर' की उपाधि आमतौर पर हजरत अब्दुल कादिर जिलानी के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसलिए ऐतिहासिक स्रोतों और तथ्यात्मक सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें'गौर के पुराने पीर' के रूप में उल्लेख करना अधिक सटीक माना जाता है।

दरगाह की वर्तमान वास्तुकला भी इसके समृद्ध इतिहास की गवाही देती है। इस मकबरे के प्रवेश द्वार पर दो शिलालेख मौजूद हैं, जो बताते हैं कि इसके दोनों गेटों का निर्माण बाद के काल में सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह और सुल्तान नासिरुद्दीन नुसरत शाह के शासनकाल के दौरान हुआ था।ऐतिहासिक साक्ष्यों में यह भी दर्ज है कि हुसैन शाह ने दरगाह परिसर में यात्रियों और अकीदतमंदों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था हेतु एक छतरी या सिकाया का निर्माण करवाया था।यह इस बात का प्रमाण है कि सल्तनत काल के शासकों के मन में सूफी संतों के प्रति कितना गहरा आदर भाव था।

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परंपरा और वर्तमान प्रासंगिकता

आज भी देश के कोने-कोने से जायरीन और पर्यटक पिराना पीर दरगाह पर जियारत के लिए आते हैं।हर साल ईद-उल-फितर के मौके पर अखी सिराजुद्दीन की याद में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।

इस अवसर पर पांडुआ से मखदूम जहानिया जहांगश्त का झंडा और नूर कुतुब-उल-आलम का पंजा इस दरगाह पर लाने की पुरानी परंपरा आज भी निभाई जाती है। यह परंपरा गौर और पांडुआ के सूफी केंद्रों के बीच के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक रिश्तों को आज भी जीवंत रखे हुए है।

सागर दिग्घी के तट पर खड़ी पिराना पीर दरगाह केवल एक मजार नहीं है, बल्कि बंगाल में चिश्ती सूफी परंपरा के विकास, गौर के मध्यकालीन इतिहास और यहां के लोगों की गहरी आस्था का एक जीवंत प्रतीक है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा भी पिराना पीर को मालदा के प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थलों की सूची में शामिल किया गया है।