हरजिंदर
पिछले तकरीबन एक साल से चल रही तैयारियां इस बार सिरे चढ़ गईं। शुक्रवार को मक्का में सउदी अरब के प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति टी एर्डोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने एक रक्षा समझौते पर दस्तखत किए। इसे मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट का नाम दिया गया है।
पिछले साल सिंतबर में जब समझौते की दिशा में पहले कदम उठाए गए थे तब से मुस्लिम नाॅटो का नाम दिया गया था। नाटो जैसा मुस्लिम देशों का रक्षा संगठन। वैसे दिलचस्प बात यह है कि तुर्की पहले से ही नाटो का सक्रिय सदस्य है। यह बात अलग है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद नाटो की हालत काफी खराब हो चुकी है और सभी सदस्य देशों पर अपनी सुरक्षा खुद देखने के दबाव हैं।
सउदी अरब नाटो में शामिल नहीं है लेकिन अमेरिका के साथ उसका रक्षा सहयोग जरूर है। अमेरिकी सेना ने वहां अपने अड्डे कायम किए हुए हैं जिन से इन दिनों वह ईरान पर हमलों में मददे भी लेता रहता है।
मक्का समझौते की भाषा वही है जो आमतौर पर से समझौतों की होती है। जैसे- इन तीनों में अगर किसी देश पर हमला होता है तो बाकी देश उसे अपने पर हमला मानेंगे वगैरह।

इससे कई समीकरणों का गड़बड़ाना तय लग रहा है। यह सच है कि ताजा अमेरिका-ईरान जंग में सउदी अरब का इस्तेमाल सीधे तौर पर किसी हमले के लिए नहीं किया गया। लेकिन अमेरिकी जंगी जहाजों में तेल भरने से
लेकर तकनीकी सूचनाएं पाने तक के लिए अमेरिका अपने सउदी अड्डो का इस्तेमाल लगतार कर रहा है। इसलिए ईरान मानता है कि सउदी भी इस जंग का ही हिस्सा है।
पाकिस्तान और तुर्की अभी तक अपने आप को इस जंग से दूर रखे हुए थे लेकिन मक्का समझौते के बाद उन्हें लेकर ईरान की धारणा बदल सकती है। सबसे बड़ी दिक्कत पाकिस्तान के लिए आ सकती है जो अभी तक
अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कराने की कोशिश कर सकता है, अब शायद ईरान उस पर पहले की तरह भरोसा न करे।हालांकि ईरान की तरफ से कहा यही गया है कि उसे मक्का समझौते से कोई दिक्कत नहीं है। उसकी दिक्कत सउदी और अमेरिकी सैनिक सहयोग को लेकर है।
WATCH: Türkiye, Saudi Arabia, and Pakistan sign Mecca trilateral Defense Agreement. pic.twitter.com/ffL2jIpXC5
— Clash Report (@clashreport) August 7, 2026
समझौते की खूबियां गिनाने वाले विश्लेषक कह रहे हैं कि इसमें मूल रूप से सउदी की पूंजी लगेगी, तुर्की की तकनीक क्षमता काम करेगी और पाकिस्तान के पास दो चीजे हैं एक तो वहां के जवान तो इस समझौते के लिए अपनी सेवाएं देंगे और दूसरे उसे पास परमाणु बम है।
वैसे इस बात को भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि ये तीनों ही देश एक दूसरे से बहुत दूर हैं। तीनों की सीमाएं कीं आपस में नहीं मिलतीं। पाकिस्तान और सउदी के बीच सीधा समुद्री रास्ता जरूर है लेकिन वह होर्मुज से होकर गुजरता है। तीनों का भूगोल अलग है और हर भूगोल की अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं।
हालांकि विश्लेषक किसी भी तरह से इसकी तुलना नाटो से नहीं कर पा रहे। एक तो यह एक समझौता भर है जबकि नाटो एक संगठन है जिसकी एक अपनी यूनीफाइड कमांड है। दशकों से रूस नाटो का एक तय दुशमन रहा है और इसी के लिए यह संगठन बना भी है। जबकि इन तीनों देशाों का पहले से तय कोई दुशमन नहीं है।

पहले यह दावे किए जा रहे थे कि ऐसा रक्षा समझौता सभी मुस्लिम देशों की रक्षा का आधार बनेगा लेकिन अब यह लगभग कह दिया गया है कि ऐसी कोई बात नहीं। अगर हम ईरान को अलग भी रख दें तो फिलहाल सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच जो रिश्ते हैं वे बता रहे हैं कि यह मुमकिन नहीं है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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